विधानसभा चुनाव : यूपी में आसानी से बाहरियों की नहीं गलती दाल


-इस बार आप और एआईएमआईएम भी जोरआजमाइश की तैयारी
-पिछले चुनावों मे कई क्षेत्रीय दलों का खाता तक नहीं खुला
-एनसीपी,आरजेडी और जेडीयू भी मार चुकी है हांथ-पांव
-तृणमूल कांग्रेस का एक बार ख्ुाल चुका है खाता

योगेश श्रीवास्तव
लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का अभी सवा साल बाकी है लेकिन चुनाव में बाजी मारने के के लिए यूपी के अलावा दूसरे राज्यों के सियासी दल भी सक्रिय हो गए है। एक ओर जहां सपा-बसपा और कांग्रेस समेत दूसरे अन्य दल गठबंधन की राजनीति का सहारा लेकर सत्तारूढ़ भाजपा से आगे निकलने की होड़ मेंं है वहीं यूपी से बाहर के छुटभैय्येदल यहां के कुछेक दलों के साथ मिलकर दलों के साथ मिलकर गठबंधन कर भाजपा का विकल्प बनने की जद्दोजेहद में लगे है। हाल ही में दिल्ली में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के अलावा आल इंडिया इत्तेहादुल मुसलमीन (एआईएमआईएम) ने यूपी के चुनाव में मैंदान में उतरने का एलान किया है।

हालांकि २०१७ के विधानसभा चुनाव में प्रदेश में तीन सौ दो पार्टियों ने अपने उम्मीदवार उतारे थे जिनमें छह राष्टï्रीय पार्टियां दो राज्य स्तर की मान्यता प्राप्त,पांच अन्य राज्यों में मान्यता प्राप्त और २८९ पंजीकृत गैर मान्यता प्राप्त पार्टियां चुनाव मैंदान में उतरी थी। 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव में उतरने के लिए कुछ इसी तरह के दल खासे उतावले दिख रहे है। यूपी में सत्तारूढ़ भाजपा गठबंधन से दोचार होने के लिए यहां सपा-बसपा से ज्यादा दूसरे राज्यों के दल सक्रिय है। यह बात दीगर है कि इन दलों को भले यूपी में कामयाबी न मिले लेकिन हमेशा से उनकी जोरआजमाइश में कमी नहीं है।

पिछले डेढ़ दो साल में जिस तरह आम आदमी ने अपनी सक्रियता बढ़ाई है। उसने एनसीआर समेत प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर चुनाव लडऩे की रूपरेखा तैयार की है। आमआदमी पार्टी की देखादेखी असुद्दीन ओवैशी भी यहां पर सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) से गठबन्धन कर चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहे हैं। यूपी में दूसरे राज्यों के राजनीतिक दखंलदाजी कोई नई नहीं है। गुजरे मांझी पर निगाह डाले तो स्थिति साफ हो जाती है कि बिहार महाराष्टï्र दिल्ली समेत अन्य राज्यों के जिन राजनीतिक दलों और उसके नेताओं ने यहां अपनी दाल गलाने की कोशिश की लेकिन बात नहीं नहीं बनी। भाजपा में जाने और उसका सांसद बनने से पहले इंडियन जस्टिस पार्टी के अध्यक्ष डा उदित राज ने दलित राजनीति में स्थापित होने और बसपा का विकल्प बनने की गरज से 2007 के विधानसभा चुनाव में अपने प्रत्याशी उतारे लेकिन उनके सभी 121 प्रत्याशी चुनाव हार गए।

साल २००७ में ही बसपा की प्रदेश में पहली बार पूर्णबहुमत की सरकार बनी थी। २००७ के चुनाव के बाद भी इंजपा ने हार नहीं मानी और 2012 के चुनाव में भी उसने 92 उम्मीदवार उतारे लेकिन 2 सीटों पर ही पार्टी प्रत्याशी दूसरे नम्बर पर आ सके। साल 2007 के विधानसभा चुनाव में मौलाना बुखारी और हाजी याकूब कुरैशी ने यूनाईटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ ) का गठन किया था। चुनाव प्रचार के दौरान रामविलास पासवान और वीपी सिंह भी इस फं्रट का हिस्सा बने। पर जब चुनाव परिणाम आए तो इस फं्रट की हवा निकल चुकी थी । यूडीएफ के 54 प्रत्याशियों में से 53 लोग बुरी तरह चुनाव हारे।

केवल हाजी याकूब चुनाव जीते लेकिन एक अन्य सीट से वह चुनाव हार गए। 2007 के विधानसभा चुनाव में रामविलास पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी ने भी बिहार से निकलकर यूपी में हाथ आजमाने की कोशिश की। उस समय वह केन्द्र सरकार में मंत्री भी थें। पासवान की पार्टी के 71 प्रत्याशी चुनाव मे उतारे लेकिन जब परिणाम आए तो उनकी पार्टी चारो खाने चित दिखाई दी। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने भी अपने राष्ट्रीय जनता दल को यूपी में स्थापित कराने में कोई कोशिश नहीं छोड़ी। उनकी पार्टी ने 2007 का चुनाव लड़ा। इस चुनाव में राजद क 65 उम्मीदवार उतरे। लेकिन मतदाताओं ने लालू के प्रत्याशियों को स्वीकार नहीं किया तो फिर निराश होकर उन्होंने 2012 के विधानसभा चुनाव में केवल 4 प्रत्याशी ही उतरे थे । जिसमें उनके दल का केवल एक प्रत्याशी ही चौथे नम्बर पर आ सका। साल २००७ की तर्ज पर 2012 के विधानसभा चुनाव में जनता दल यूद्ध ने अपने दम पर 219 प्रत्याषी उतारे पर अधिकतर सीटों पर जनता दल (यू) को 100 से 1000 तक ही मत मिल सके।

जनता दल (यू) को मात्र 0.36 प्रतिशत मत ही मिल सके थें। कहीं कहीं तो प्रत्याशियों की हालत निर्दलीय प्रत्याषियों से भी बदत्तर रही थी। आंवला में पार्टी उम्मीदवार नेपाल सिंह को को मात्र 191 मत ही मिले थे। इस चुनाव में रामविलास पासवान की लोकजनशक्ति पार्टी (लोजपा) भी भी 212 प्रत्याशियों के साथ मैदान में उतरी लेकिन उसके सभी प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गयी। इसके अलावा राज्य में 200 से ज्यादा ऐसे भी दल थे जिनके सभी प्रत्याशियों की जमानत जब्त करनी पड़ी थी। इसे विधानसभा चुनाव मे ममता बनर्जी की टीएमसी के 200 उम्मीदवार मैदान में उतरे थें जिनमें पूर्व नौकरशाह राय सिंह और किसान नेता वीएम सिंह भी शामिल थें पर इस चुनाव में उनके दल का सूपड़ा साफ हो गया। इसके बाद फि र अगले चुनाव में ममता बनर्जी की अपने प्रत्याषियों को उतारने की हिम्मत नहीं पड़ सकी।

इसी चुनाव में सीपीआई के सभी 51 उम्मीदवार जमानत जब्त हो गयी थी जबकि एनसीपी ने 127 सीटों पर कैंडिडेट उतारें। इसी तरह सीपीएम ने 17 सीटों पर प्रत्याशी उतारे पर एक को छोडकर सभी की जमानत जब्त हो गई।

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