
नई दिल्ली: पिछले 13 वर्षों से बिस्तर पर पत्थर बनकर पड़े हरीश राणा अब अपनी जिंदगी के सबसे कठिन लेकिन ‘सुकून भरे’ सफर पर निकल चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद, हरीश को पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) के लिए एम्स (AIIMS) दिल्ली में शिफ्ट कर दिया गया है। डॉक्टरों की टीम ने धीरे-धीरे उनका लाइफ सपोर्ट हटाना शुरू कर दिया है। इस संवेदनशील मोड़ पर एम्स की पूर्व दिग्गज विशेषज्ञ डॉ. सुषमा भटनागर ने बताया है कि एक डॉक्टर के लिए यह प्रक्रिया कितनी चुनौतीपूर्ण और मानवीय संवेदनाओं से भरी होती है।
अंत को खींचना इलाज नहीं, पीड़ा है- डॉ. सुषमा
एम्स दिल्ली के ऑन्को-एनेस्थीसिया और पैलिएटिव केयर विभाग की पूर्व प्रमुख डॉ. सुषमा भटनागर का कहना है कि जब मौत निश्चित हो, तो इलाज से ज्यादा जरूरी मरीज की पीड़ा को कम करना होता है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा, “एक अच्छे चिकित्सक का काम अंत को लंबा खींचना नहीं होता। अगर हमें पता है कि मरीज नहीं बचेगा, तो मशीनों और दवाइयों के जरिए उसकी मृत्यु को टालना उसे और कष्ट देना है। हमारा उद्देश्य उसे ‘कंफर्ट केयर’ देना है ताकि उसका अंत गरिमापूर्ण हो।”
#WATCH | Delhi: On the Supreme Court allows first Passive Euthanasia, Dr Sushma Bhatnagar, Former Head Department of Onco-Anaesthesia, Pain and Palliative care of AIIMS Delhi, says, "… Now, in this case, it's an advanced stage where it seems the end is inevitable, meaning the… pic.twitter.com/xqVYGdPegr
— ANI (@ANI) March 16, 2026
हत्या नहीं, यह संतुलित विदाई की प्रक्रिया

पैसिव यूथेनेशिया की जटिलता पर बात करते हुए डॉ. सुषमा ने कहा कि भारत सरकार के पास ‘विथहोल्डिंग और विथड्रॉल’ (देखभाल रोकने और हटाने) के स्पष्ट दिशानिर्देश हैं। उन्होंने बताया कि हरीश के मामले में यह प्रक्रिया बहुत ही संतुलित तरीके से अपनाई जा रही है। डॉ. सुषमा के मुताबिक, “यह बताना नामुमकिन है कि इस प्रक्रिया में कितने दिन लगेंगे, क्योंकि जीवन और मृत्यु किसी के हाथ में नहीं है। हम बस यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि उसे लगातार देखभाल मिले और यह प्रक्रिया ऐसी हो कि किसी को यह न लगे कि हमने जानबूझकर किसी की हत्या की है।”
2013 का वो मंजर: कैसे पत्थर बन गया एक हंसता-खेलता छात्र?
हरीश राणा की यह दर्दनाक दास्तां साल 2013 में शुरू हुई थी। चंडीगढ़ में पीजी की चौथी मंजिल से गिरने के कारण हरीश के सिर और शरीर में ऐसी चोटें आईं कि वह 100% क्वाड्रिप्लेजिया (चारों अंगों का लकवा) का शिकार हो गए। एक होनहार छात्र अचानक मशीनों के सहारे सांस लेने को मजबूर हो गया। पिछले 13 सालों से वह न बोल सकते थे, न हिल सकते थे। एम्स की मेडिकल टीम ने जब यह साफ कर दिया कि अब सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है, तब टूट चुके माता-पिता ने भारी मन से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सम्मानजनक मौत की ओर बढ़ते कदम
हरीश के माता-पिता के लिए अपने ही बेटे के लिए ‘मौत’ मांगना दुनिया का सबसे मुश्किल फैसला था, लेकिन उसकी तड़प उनसे देखी नहीं जा रही थी। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी गुहार सुनी और देश में पहली बार इस तरह पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी। अब हरीश राणा डॉक्टरों की निगरानी में एक ऐसी यात्रा पर हैं, जहाँ दर्द खत्म होगा और उन्हें 13 साल की लंबी जंग से मुक्ति मिलेगी।













