
नई दिल्ली। भारत में उद्यमिता तेज़ी से बढ़ रही है। मार्च 2026 तक देश में 78 मिलियन से अधिक MSMEs सक्रिय हैं। ये सेक्टर देश के GDP में करीब 31% योगदान देता है, कुल निर्यात का लगभग 48% हिस्सा है, और 35 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देता है।
ये आंकड़े इस सेक्टर की ताकत को दिखाते हैं। लेकिन अब चर्चा एक नए सवाल पर आकर टिक गई है । इस संदर्भ में मिली जानकारी के मुताबिक मैन्युफैक्चरिंग, ट्रेडिंग, रिटेल और सर्विस सेक्टर में हर दिन नए व्यवसाय शुरू हो रहे हैं। लेकिन बड़ी संख्या में उद्यम एक स्तर के बाद रुक जाते हैं। यह तस्वीर उन प्लेटफॉर्म्स पर भी साफ दिखती है, जो सीधे MSME उद्यमियों के साथ काम करते हैं।
हाल ही में Bada Business के एक बड़े एंटरप्रेन्योरशिप प्रोग्राम में 2,500 से अधिक उद्यमियों ने हिस्सा लिया। इसमें दिल्ली NCR, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और कर्नाटक से प्रतिभागी शामिल हुए। Dr Vivek Bindra, जो लगातार MSME उद्यमियों के साथ काम करते हैं इस संवाददाता से बातचीत करते हुए बताया कि“चुनौती बिज़नेस शुरू करने में नहीं है। असली चुनौती ऐसे सिस्टम और लीडरशिप बनाने में है, जिससे बिज़नेस फाउंडर से आगे बढ़ सके।”
बदलती सोच, नया फोकस
अब MSME उद्यमियों की सोच भी बदल रही है।
वे सिर्फ बिज़नेस चलाने नहीं, बल्कि उसे बेहतर बनाने के लिए सीखना चाहते हैं:
सही बिज़नेस सिस्टम
फाइनेंशियल प्लानिंग
लीडरशिप स्किल्स
और स्केलेबल मॉडल्स
यह बदलाव खासकर छोटे शहरों और पहली पीढ़ी के उद्यमियों में ज्यादा दिख रहा है। भारत में MSMEs की भूमिका आगे भी अहम रहेगी। लेकिन आने वाले समय में असली फर्क इस बात से पड़ेगा कि कितने व्यवसाय मजबूत और स्केलेबल बन पाते हैं। भारत अब सिर्फ नए बिज़नेस नहीं बना रहा, बल्कि ऐसे बिज़नेस बनाने की दिशा में बढ़ रहा है जो लंबे समय तक टिक सकें और बढ़ सकें। इनमें माइक्रो से लेकर मीडियम स्तर तक के व्यवसाय और मैन्युफैक्चरिंग, ट्रेडिंग, कंस्ट्रक्शन, रिटेल और सर्विस जैसे कई सेक्टर शामिल थे।
अलग-अलग व्यवसाय, एक जैसी समस्या
भले ही व्यवसाय और शहर अलग थे, लेकिन एक बात लगभग हर जगह समान रही कि व्यवसाय शुरू करना आसान हो गया है, लेकिन उसे बढ़ाना अभी भी मुश्किल है। कई MSMEs अब भी पूरी तरह फाउंडर पर निर्भर हैं। हर बड़ा फैसला, क्लाइंट हैंडलिंग और ऑपरेशन एक ही व्यक्ति पर टिके होते हैं। शुरुआत में यह मॉडल काम करता है, लेकिन जैसे-जैसे व्यवसाय बढ़ता है, यही चीज़ उसकी ग्रोथ को रोकने लगती है। उद्यमियों ने एक और बड़ी चुनौती बताई – कैश फ्लो।
मैन्युफैक्चरिंग और ट्रेडिंग सेक्टर में पेमेंट साइकिल लंबी होती है। पैसे की देरी से ग्रोथ पर सीधा असर पड़ता है।
इसके साथ ही प्रतिस्पर्धा भी बदल रही है। अब MSMEs को सिर्फ लोकल मार्केट से नहीं, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और बड़े ब्रांड्स से भी मुकाबला करना पड़ रहा है।
सबसे बड़ी कमी: सिस्टम और मार्गदर्शन
एक और अहम बात जो सामने आई, वह है
संरचित बिज़नेस गाइडेंस की कमी।
जहां स्टार्टअप्स को मेंटर, इनक्यूबेटर और नेटवर्क का सपोर्ट मिलता है, वहीं कई पारंपरिक MSMEs अब भी अपने अनुभव के भरोसे ही आगे बढ़ते हैं। यहीं पर सबसे बड़ी चुनौती सामने आती है – स्केलिंग।














