ओडिशा‑आंध्र प्रदेश के समुदाय प्रकृति पुनर्स्थापन में कैसे मिसाल बन रहे हैं

नई दिल्ली. शोधकर्ताओं और क्षेत्र के विशेषज्ञों (प्रैक्टिशनर्स) ने एक नया नीति पत्र जारी किया है। ज़मीनी सबूतों के आधार पर यह पत्र तर्क देता है कि “क्षेत्र-आधारित दृष्टिकोण” को भारत में प्राकृतिक संसाधनों (जमीन, पानी, जंगल) के शासन और प्रबंधन का केंद्र बिंदु बनाया जाना चाहिए।सामाजिक विज्ञान के मुक्त अभिलेख (SocArXiv) में प्रकाशित एक नए नीति-पत्र में ओडिशा और आंध्र प्रदेश के अनेक समुदायों की गाथाएँ प्रस्तुत की गई हैं, जो मूक-भाव से एक अद्भुत कार्य में संलग्न हैं: भूमि, जल और वनों को एक अंतर्संबद्ध प्रणाली के रूप में प्रबंधित करना, और फलस्वरूप अपने परिदृश्यों एवं अपने जीवनों में आमूल-परिवर्तन देखना।”

“मई 2026 में जारी एक नीति पत्र, जिसका नाम है ‘सतत विकास में क्षेत्र-आधारित दृष्टिकोणों की केंद्रीयता’, इन ज़मीनी अनुभवों और विशेषज्ञों की चर्चाओं पर आधारित है। ये चर्चाएँ 2024 में नई दिल्ली में ‘कॉमन्सकन्वीनिंग’ और 2025 में अहमदाबाद में ‘इंडिया लैंड एंड डेवलपमेंट कॉन्फ्रेंस’ में हुई थीं। यह पत्र कहता है कि इन समुदायों ने जो तरीका (क्षेत्र-आधारित दृष्टिकोण) दिखाया है, उसे दूसरी जगहों पर भी सफलतापूर्वक अपनाया जा सकता है। इन उदाहरणों और विशेषज्ञों की राय के आधार पर, पत्र एक बेहतरीन मॉडल पेश करता है कि भारत अपने सबसे ज़्यादा दबाव वाले प्राकृतिक संसाधनों (जैसे ज़मीन, पानी, जंगल) का प्रबंधन और शासन कैसे कर सकता है।”

 एक संकट जो इंतज़ार नहीं कर सकता

 भारत में दुनिया के 16% लोग रहते हैं, लेकिन यहाँ दुनिया की ज़मीन का सिर्फ 2.4% हिस्सा है। इसी वजह से भारत के प्राकृतिक संसाधनों पर बहुत ज़्यादा और लगातार बढ़ता दबाव है। 2018-19 तक, लगभग 9.8 करोड़ हेक्टेयर ज़मीन (जो भारत की कुल ज़मीन का 30% है) पहले ही खराब (बंजर/नष्ट) हो चुकी थी। भारत अपने चार जैव विविधता वाले इलाकों (हॉटस्पॉट) में से लगभग 90% क्षेत्र खो चुका है। और भारत का लगभग आधा कृषि योग्य इलाका छोटे और सीमांत किसानों के पास है, जो जलवायु परिवर्तन की मार से सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं।

ओडिशा के केओंझर और कोरापुट के समुदाय और आंध्र प्रदेश के लोग इन्हीं मुश्किलों के बीच जी रहे हैं। यह पत्र उन तरीकों को बताता है जिनसे ये समुदाय इन चुनौतियों से लड़ रहे हैं, साथ ही इन समुदायों से हम क्या सीख सकते हैं, यह भी समझाता है।

 ये समुदाय क्या अलग कर रहे हैं?”

 “इन समुदायों को लचीला (अडिग) बनाने वाले बदलाव का मूल यह है कि वे टुकड़ों में, योजना-दर-योजना (scheme-by-scheme) वाले हस्तक्षेपों से हटकर पूरे भूदृश्य (लैंडस्केप) — उसकी मिट्टी, पानी, जंगल, फसलें और लोग — को एक जुड़ी हुई प्रणाली के रूप में देखने लगे।

केओंझर में, महिला संगठन फॉरसोशियो-कल्चरल अवेयरनेस (WOSCA) नामक एक गैर-सरकारी संगठन ने स्थानीय सरकारी निकायों, नागरिक समाज समूहों और समुदायों को एक साझा भूदृश्य योजना के आसपास एकजुट किया। डिजिटल मैपिंग उपकरण समुदायों को उनके अपने पारंपरिक भूमि ज्ञान के साथ थमा दिए गए। परिणाम था: बढ़ा हुआ जलस्तर, बेहतर मिट्टी की नमी और बेहतर पैदावार। गाँव अब सूखे के कारण अपनी फसलें नहीं खो रहे थे।

WOSCA से मानसिंह दुर्गा प्रसाद नायक कहते हैं, ‘केओंझर में महिला स्वयं सहायता समूह की सदस्यें संरक्षक (स्टीवर्ड) की तरह बन रही हैं; वे परिवर्तन लाने वाली एजेंट (change agents) की तरह काम कर रही हैं।’ इन समूहों के साथ अपने काम पर विचार करते हुए वे कहते हैं, ‘जब समुदाय को डेटा के साथ, इरादे के साथ सशक्त बनाया जाएगा और जब उन्हें सभी नागरिक समाज संगठनों और समुदाय-आधारित संगठनों के साथ जोड़ा जाएगा, तो कुछ बदलाव होगा, पूरा पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) बदल जाएगा।’

कोरापुट में, एक अन्य गैर-सरकारी संगठन, वाटरशेड सपोर्ट सर्विसेज एंड एक्टिविटीज नेटवर्क (WASSAN) ने एक भूदृश्य के आसपास बहु-हितधारक मंच (मल्टी-एक्टर प्लेटफॉर्म) बनाने पर काम किया — एक संरचित स्थान जहाँ किसान, महिला समूह, सरकारी विभाग और नागरिक समाज संगठन नियमित रूप से मिलते हैं, डेटा साझा करते हैं और साथ मिलकर योजना बनाते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात, उन्होंने एक मिश्रित वित्तपोषण (ब्लेंडेड फाइनेंस) मॉडल भी तैयार किया, जो सरकारी योजनाओं, परोपकारी पूंजी और सामुदायिक स्तर के ऋण का उपयोग करता है, क्योंकि कोई एक फंडिंग लाइन व्यापक रूप से भूदृश्य बहाली को समायोजित नहीं कर सकती है।

आंध्र प्रदेश में, सामुदायिक प्रबंधित प्राकृतिक खेती कार्यक्रम (community-managed natural farming programme) ने इन सिद्धांतों को बहुत बड़े पैमाने पर ले जाया है — 10 लाख से अधिक किसानों और लगभग 5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में — जो इसे दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक खेती कार्यक्रम बनाता है। कोरापुट और केओंझर की तरह, यह कार्यक्रम भी कई हितधारकों को एक साथ लाता है। यह महिला स्वयं सहायता समूहों के एक नेटवर्क पर आधारित है जो किसानों के बीच सहकर्मी-से-सहकर्मी सीखने (पीयर-टू-पीयर लर्निंग) और स्थानीय जवाबदेही को बढ़ावा देता है।

इस बात पर जोर देते हुए कि क्षेत्र-आधारित दृष्टिकोण पूर्व-निर्धारित ब्लूप्रिंट या योजनाओं पर निर्भर नहीं हो सकता, बल्कि एक प्रगतिशील और अनुकूली रणनीति की आवश्यकता होती है, आंध्र प्रदेश के रयतु साधिकार संस्था (RySS) के जी. मुरलीधर कहते हैं, ‘पूरी योजना बनने का इंतजार मत करो, पूरी योजना कभी नहीं बनती। पूरी, व्यापक योजना कब बनेगी? जल्दी से कहीं से भी शुरू करो।’

जमीनी हकीकत से नीति तक

यह पत्र उन पाँच परस्पर जुड़े बदलावों की पहचान करता है जो क्षेत्र-आधारित दृष्टिकोण को इन आशाजनक उदाहरणों से मुख्यधारा के अभ्यास में ले जाने के लिए आवश्यक हैं: योजना में प्रणालीगत दृष्टिकोण (सिस्टम्स परस्पेक्टिव), डेटा और डिजिटल टूल्स का स्मार्ट उपयोग, नीचे-से-ऊपर (बॉटम-अप) समुदाय-नेतृत्व वाला डिज़ाइन, लंबी पारिस्थितिक समय-सीमाओं के अनुरूप वित्तीय ढाँचा जो प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) जैसी योजनाओं का उपयोग करता है, और नीति के इरादे और जमीनी स्तर के कार्यान्वयन के बीच अधिक सामंजस्य।

वाटर, एनवायरनमेंट, लैंड एंड लिवलीहुड्स (WELL) लैब्स से डॉ. वीना श्रीनिवासन इस बात पर प्रकाश डालती हैं कि क्षेत्र-आधारित दृष्टिकोण में बदलाव के लिए वर्तमान मॉडल से सोच में एक मौलिक बदलाव की आवश्यकता है, जहाँ विशिष्ट जमीनी संगठन विशिष्ट भूदृश्यों के मालिकों के रूप में कार्य करते हैं। वह कहती हैं कि क्षेत्र-आधारित सोच में ‘शक्ति या निर्णय लेने का केंद्र (लोकस ऑफ पावर) समुदाय-आधारित संगठन के पास होना चाहिए, चाहे वह स्वयं सहायता समूह हो, या हो सकता है, अगर हम कमांड क्षेत्रों में काम करते हैं, तो पानी उपयोगकर्ता सहकारी समितियाँ या किसान उत्पादक संगठन जो भी हो, लेकिन उस भूदृश्य में रहने वाले लोगों के समूह, जिनका इरादा उस भूदृश्य का स्वामित्व लेना हो और चाहे कुछ भी हो जाए, उस भूदृश्य को नहीं छोड़ना हो।’

आगे का रास्ता

यह पत्र क्षेत्र-आधारित दृष्टिकोण को भारत की प्राकृतिक संसाधन योजना के केंद्र में मान्यता देने का आह्वान करता है — एक संगठनात्मक सिद्धांत के रूप में जो मौजूदा कार्यक्रमों, समुदायों और निवेशों को विशिष्ट स्थानों की सामाजिक-पारिस्थितिक वास्तविकताओं के आसपास अधिक संरेखण में लाता है।

यह इस बदलाव के लिए व्यावहारिक प्रवेश बिंदुओं की भी पहचान करता है: डिजिटल योजना उपकरण जैसे ‘नोयोरलैंडस्केप’ ) और ‘ग्रामीफाई’ (Gramify) जो सहभागी, भूदृश्य-स्तरीय योजना का समर्थन कर सकते हैं; मिश्रित वित्तपोषण (ब्लेंडेड फाइनेंस) मॉडल जो दीर्घकालिक भूदृश्य निवेशों को बनाए रख सकते हैं; और गाँव स्तर पर फील्ड स्कूल जो पहले से ही काम कर रही चीजों को प्रदर्शित और फैला सकते हैं।

यह पत्र दर्शाता है कि भूदृश्य बहाली के लिए आवश्यक ज्ञान, उपकरण और सामुदायिक संस्थान भारत में पहले से मौजूद हैं, और अब अवसर उनसे सीखने और उन पर आगे निर्माण करने का है।

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