
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव में महज छह महीने का समय बाकी है और भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता की हैट्रिक लगाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। लखनऊ से लेकर दिल्ली तक बैठकों का दौर जारी है। हाल ही में संगठन महामंत्री बीएल संतोष और प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े की अगुवाई में हुई बैक-टू-बैक बैठकों के बाद जो अंदरूनी फीडबैक और सर्वे रिपोर्ट निकलकर सामने आई है, उसने पार्टी आलाकमान की नींद उड़ा दी है। खुफिया रिपोर्ट के संकेत साफ हैं कि इस बार का चुनाव हिंदुत्व के पिच से फिसलकर पूरी तरह जातीय गोलबंदी की तरफ मुड़ता दिख रहा है, जो बीजेपी के रणनीतिकारों के लिए बड़ी खतरे की घंटी है।
धर्म बनाम जाति: नैरेटिव बदलने से खतरे में बीजेपी! यूपी की राजनीति में पिछले कई चुनावों से बीजेपी हिंदुत्व के मुद्दे पर भारी पड़ती रही है, लेकिन इस बार पार्टी के अंदरूनी सर्वे और बैठकों में सामने आई चिंता अलग ही कहानी बयां कर रही है। सूत्रों के मुताबिक, संगठन के शीर्ष नेताओं ने माना है कि राज्य का माहौल धीरे-धीरे पूरी तरह जातीय समीकरणों पर शिफ्ट हो रहा है। अगर चुनाव का मुख्य नैरेटिव जातिगत आंकड़ों पर टिका, तो बीजेपी को भारी राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
100 से ज्यादा विधायकों का रिपोर्ट कार्ड खराब, एंटी-इनकंबेंसी का डर पार्टी के सबसे बड़े सिरदर्द के रूप में स्थानीय विधायकों का प्रदर्शन सामने आया है। सूत्रों के हवाले से खबर है कि बीजेपी के एक अंदरूनी सर्वे में 100 से अधिक मौजूदा विधायकों के खिलाफ ग्राउंड स्तर पर भयंकर जनआक्रोश (एंटी-इनकंबेंसी) पाया गया है। इसके अलावा बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं की अनदेखी और उन्हें सम्मान न मिलने की शिकायतें भी खुलकर सामने आई हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में कार्यकर्ताओं की जिस बेरुखी का खामियाजा पार्टी भुगत चुकी है, आलाकमान 2027 में उसे दोहराने के मूड में बिल्कुल नहीं है।
कांटे की टक्कर: बराबरी की स्थिति बनी चिंता का कारण अंदरखाने की सबसे चौंकाने वाली खबर यह है कि शीर्ष नेतृत्व इस समय चुनाव को एकतरफा नहीं मान रहा है। ग्राउंड रिपोर्ट के आधार पर मुकाबला फिलहाल ‘बराबरी’ का आंका गया है। आगामी छह महीनों में अगर विपक्ष अपना नैरेटिव मजबूत करने में कामयाब रहा, तो बीजेपी के लिए राह बेहद मुश्किल हो जाएगी। इसके साथ ही संगठन की नई टीम के कुछ चेहरों की चयन प्रक्रिया और सिफारिशी नियुक्तियों को लेकर भी भीतर ही भीतर सवाल उठ रहे हैं।
मायावती की BSP में कलह से सपा-कांग्रेस को फायदा? बहुजन समाज पार्टी के भीतर चल रही अंदरूनी हलचल और गिरते वोट शेयर ने भी बीजेपी के गणित को उलझा दिया है। आंकड़ों के मुताबिक, बसपा के कमजोर होने का सीधा फायदा बीजेपी के बजाय सपा और कांग्रेस गठबंधन को ट्रांसफर होता दिख रहा है। 2024 में बसपा का वोट शेयर घटने से बीजेपी को हुए नुकसान को देखते हुए अब दलित वोटों में सेंधमारी रोकने और उन्हें अपने पाले में बनाए रखने के लिए नई रणनीति बनाई जा रही है।
डिजिटल वॉर और युवा: सोशल मीडिया पर आक्रामक होने के निर्देश आज के दौर में चुनाव सिर्फ रैलियों से नहीं बल्कि मोबाइल स्क्रीन पर लड़े जाते हैं। बीजेपी आलाकमान ने माना है कि सोशल मीडिया पर विपक्ष का नैरेटिव युवाओं और पहली बार वोट देने वाले नए मतदाताओं को प्रभावित कर रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं, बेरोजगारी और रोजगार के मुद्दे पर युवाओं की नाराजगी दूर करने के लिए सरकार की उपलब्धियों को आक्रामक तरीके से पेश करने के सख्त निर्देश जारी किए गए हैं।
बीएल संतोष के 3 दिन और आलाकमान को सौंपी जाने वाली रिपोर्ट संगठन महामंत्री बीएल संतोष के तीन दिवसीय यूपी दौरे के दौरान विधायकों के रिपोर्ट कार्ड से लेकर जमीनी हकीकत तक हर बिंदु पर गहन मंथन हुआ है। वह अपनी विस्तृत रिपोर्ट केंद्रीय नेतृत्व को सौंपेंगे, जिसके बाद टिकट कटने से लेकर संगठन में फेरबदल तक कई बड़े और कड़े फैसले देखने को मिल सकते हैं। बैठकों के समापन पर उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया है कि 2027 का चुनाव सिर्फ एक चुनाव नहीं, बल्कि साख की लड़ाई है और सरकार-संगठन को एकजुट होकर चुनावी मैदान में उतरना होगा।














