
पश्चिम बंगाल की राजनीति में उस वक्त भारी भूचाल आ गया, जब भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) के मूल नाम और उसके ऐतिहासिक चुनाव चिह्न ‘दो फूल-घास’ (जोड़ा फूल) के इस्तेमाल पर अंतरिम रोक लगा दी। आयोग ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट और अरूप रॉय व ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट, दोनों पर ही यह पाबंदी लागू की है। आगामी विधानसभा उपचुनावों को देखते हुए निर्वाचन आयोग ने ममता बनर्जी खेमे को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ चुनाव चिह्न आवंटित किया है। वहीं, बागी गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम के साथ ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न दिया गया है।
इस अभूतपूर्व फैसले के बाद पूरे देश में यह सवाल तैरने लगा है कि क्या ममता बनर्जी की पार्टी की 28 साल पुरानी पहचान हमेशा के लिए खत्म हो गई है? आइए समझते हैं कि आयोग के इस अंतरिम आदेश का वास्तविक अर्थ क्या है, क्या कहता है कानून और क्यों शुरू हुआ यह पूरा विवाद।
क्या टीएमसी का नाम और ‘जोड़ा फूल’ निशान स्थायी रूप से छिन गया है?
कानूनी और संवैधानिक तथ्यों के अनुसार, पार्टी का नाम और निशान स्थायी रूप से नहीं बदला है। निर्वाचन आयोग द्वारा उठाया गया यह कदम केवल आगामी उपचुनावों के दौरान मतदाताओं के बीच किसी भी भ्रम को रोकने के लिए की गई एक ‘अस्थायी/अंतरिम व्यवस्था’ है। जब तक आयोग दोनों पक्षों के दावों, संगठनात्मक समर्थन और पार्टी के संविधान की अंतिम जांच पूरी नहीं कर लेता, तब तक मूल नाम और चिह्न को फ्रीज (स्थगित) रखा गया है। अंतिम सुनवाई और दस्तावेजों की गहन जांच के बाद ही यह तय होगा कि असली तृणमूल कांग्रेस कौन सी है और ‘जोड़ा फूल’ का अधिकार किसे मिलेगा।
विवाद की मुख्य वजह: राष्ट्रीय कार्यसमिति और पार्टी संविधान पर जंग
पार्टी के भीतर बगावत और इस बड़े विवाद की शुरुआत संगठन के कार्यकाल को लेकर हुई:
-
बागी गुट का तर्क: अरूप रॉय और ऋतब्रत बनर्जी खेमे का दावा है कि टीएमसी की राष्ट्रीय कार्यसमिति का कार्यकाल 11 फरवरी 2025 को ही समाप्त हो गया था। इसके बाद 22 जून 2026 को बुलाए गए विशेष अधिवेशन में अरूप रॉय को पार्टी का नया अध्यक्ष चुना गया। इसलिए पुरानी कार्यसमिति के फैसले असंवैधानिक हैं।
-
ममता गुट का पक्ष: ममता बनर्जी खेमे ने इन दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए बैठक को असंवैधानिक बताया है। ममता गुट का कहना है कि आयोग में जमा पार्टी संविधान के अनुसार पदाधिकारियों का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। 2022 में हुए संगठनात्मक चुनाव के हिसाब से यह कार्यकाल 2027 तक वैध है।
चुनाव चिह्न आरक्षण एवं आवंटन आदेश 1968 (पैरा 15) क्या कहता है?
राजनीतिक दलों में विभाजन या बगावत की स्थिति में चुनाव आयोग ‘चुनाव चिह्न (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968’ के पैरा 15 के तहत कार्रवाई करता है। आयोग फैसला लेते समय मुख्य रूप से इन बिंदुओं को परखता है:
-
सांसदों और विधायकों का समर्थन: पार्टी के कितने निर्वाचित प्रतिनिधि किस गुट के साथ हैं।
-
संगठनात्मक ढांचा: राष्ट्रीय और राज्य कार्यकारिणी के बहुसंख्यक पदाधिकारियों का किस पक्ष को समर्थन प्राप्त है।
-
पार्टी संविधान का पालन: क्या संगठनात्मक चुनाव और बैठकें पार्टी के लिखित नियमों के तहत हुई हैं।
जब चुनाव नजदीक हों और विस्तृत जांच में समय लगने की संभावना हो, तो आयोग किसी भी एक पक्ष को अनुचित लाभ मिलने से रोकने के लिए मूल नाम व चिह्न को ‘फ्रीज’ कर देता है।
‘फ्रीज’ होने का तकनीकी मतलब और राजनीतिक असर
‘फ्रीज’ का सीधा मतलब है कि विवाद के निस्तारण तक कोई भी गुट मूल नाम और निशान का उपयोग नहीं कर सकेगा। इससे दोनों पक्षों को बराबरी के मैदान पर लाकर खड़ा कर दिया गया है। हालांकि, लंबे समय से ‘जोड़ा फूल’ निशान पर चुनाव लड़ती आ रहीं ममता बनर्जी के लिए नए नाम और निशान ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ के साथ मतदाताओं के बीच जाना एक बड़ी रणनीतिक चुनौती होगी। उम्मीदवारों और कार्यकर्ताओं को बेहद कम समय में घर-घर तक नया प्रतीक चिन्ह पहुंचाना होगा।














