
2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के शंखनाद के लिए समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा रायबरेली से ‘PDA रथ यात्रा’ शुरू करने के फैसले ने राज्य के राजनीतिक गलियारों में भारी हलचल पैदा कर दी है। रायबरेली और अमेठी को पारंपरिक रूप से गांधी परिवार का गढ़ और कांग्रेस की साख का प्रतीक माना जाता रहा है। ऐसे में राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली से अखिलेश यादव का चुनावी अभियान की शुरुआत करना केवल एक सामान्य प्रशासनिक दौरा नहीं है, बल्कि यह एक सुनियोजित रणनीति, क्षेत्रीय सामाजिक समीकरण और सहयोगी पार्टी कांग्रेस के लिए एक स्पष्ट सियासी संदेश का सम्मिश्रण है।
1. कांग्रेस को गठबंधन और ‘जमीनी हकीकत’ का आईना दिखाना
2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने यूपी में सपा के साथ मिलकर शानदार प्रदर्शन किया और 6 सीटें जीतीं, जिसमें राहुल गांधी की रायबरेली से बड़ी जीत भी शामिल थी। हालांकि, 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस राज्य की 403 सीटों पर अपनी दावेदारी मजबूत करने और ज्यादा से ज्यादा सीटों की मांग करने की रणनीति बना रही है।
अखिलेश यादव ने रायबरेली की जमीनी हकीकत का आईना दिखाते हुए यह संदेश दिया है कि लोकसभा में भले ही गांधी परिवार का चेहरा काम आया हो, लेकिन विधानसभा स्तर पर सपा ही इस क्षेत्र का असली और मजबूत स्तंभ है। 2022 के विधानसभा चुनाव में रायबरेली की 6 में से 4 और अमेठी की 4 में से 2 सीटें (कुल 10 में से 6 सीटें) सपा ने जीती थीं, जबकि कांग्रेस केवल एक सीट (जगदीशपुर) पर ही दूसरे स्थान पर आ पाई थी। अखिलेश का यह कदम आगामी सीट बंटवारे (Seat Sharing) में सपा की सौदेबाजी क्षमता (Bargaining Power) को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा दांव है।
2. PDA समीकरण: लोधी और पासी वोट बैंक को सीधा संदेश
रायबरेली से यात्रा शुरू करने का दूसरा सबसे बड़ा कारण वहां का सामाजिक ताना-बाना (Social Engineering) है। रायबरेली में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का लोधी समुदाय और दलितों में पासी समाज खासी बड़ी संख्या में हैं।
अखिलेश यादव ने अपनी यात्रा की शुरुआत हरचंदपुर से सपा के लोधी विधायक राहुल लोधी और बछरावां से पासी समुदाय के विधायक श्याम सुंदर भारती के क्षेत्रों पर केंद्रित रखकर की। हाल ही में फिरोज गांधी डिग्री कॉलेज विवाद और स्थानीय पुलिस-प्रशासन से जुड़े मामले में अपने लोधी विधायक के समर्थन में उतरकर अखिलेश ने लोधी समुदाय को साधने की कोशिश की है। लोधी समाज यूपी की 70-80 विधानसभा सीटों पर असर डालता है। यादव और मुस्लिम कैडर के साथ लोधी और पासी समाज को जोड़ना ही अखिलेश के ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का मूल आधार है।
3. स्थानीय कैडर का मनोबल और हालिया विवाद
हाल के दिनों में रायबरेली में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) और सपा छात्र सभा के बीच हुए संघर्ष तथा पुलिस की कार्रवाई के बाद सपा के स्थानीय कार्यकर्ताओं में आक्रोश था। अखिलेश यादव का सीधे रायबरेली के मैदान में उतरना कार्यकर्ताओं और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों में भरोसा कायम करने और यह दिखाने की कोशिश थी कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व उनके हर संघर्ष में उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है।
4. कांग्रेस की छटपटाहट और अजय राय का पलटवार
अखिलेश यादव का रायबरेली से चुनावी आगाज करना कांग्रेस को गहराई से चुभा है। यूपी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय का यह बयान कि “चुनाव है, कोई भी कहीं भी जा सकता है, लेकिन हम भी कन्नौज, सैफई और इटावा जा सकते हैं” यह स्पष्ट दिखाता है कि सपा का यह कदम कांग्रेस के आत्मसम्मान और क्षेत्रीय दावेदारी पर चोट कर गया है। सैफई, इटावा और कन्नौज मुलायम परिवार और समाजवादी पार्टी के पारंपरिक गढ़ माने जाते हैं, ऐसे में अजय राय का यह बयान दोनों दलों के बीच भीतर ही भीतर चल रही खींचतान को उजागर करता है।
निष्कर्ष: सपा का एक तीर से कई शिकार
2022 में कानपुर से अपनी ‘विजय यात्रा’ शुरू करने वाले अखिलेश यादव का 2026 में रायबरेली को चुनना यह दर्शाता है कि 5 वर्षों में सपा की रणनीति कितनी परिपक्व हुई है। रायबरेली से PDA रथ रवाना करके उन्होंने:
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सत्ताधारी भाजपा को सीधी चुनौती दी।
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अपने पिछड़ा-दलित (लोधी-पासी) समीकरण को मजबूत किया।
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सहयोगी कांग्रेस को अपनी सियासी ताकत और जमीनी हकीकत का अहसास कराकर भविष्य में कम सीटें लेने के लिए मानसिक रूप से तैयार किया।
सपा का यह संदेश बिल्कुल साफ है—उत्तर प्रदेश की सत्ता में वापसी की राह में सपा ही मुख्य ड्राइवर की भूमिका में रहेगी, भले ही कांग्रेस के साथ गठबंधन कायम रहे।













