96 साल बाद लौटी जाति जनगणना – और यूपी को धर्म और जाति में फ़र्क करना होगा

लखनऊ: जिस राज्य की राजनीति दशकों से जातीय अंकगणित पर चलती रही है, वहाँ आख़िरकार आँकड़े अनुमान से नहीं, गिनती से तय होंगे। जनगणना 2027 के लिए जनसंख्या गणना उत्तर प्रदेश में 1 दिसंबर 2026 से 4 जनवरी 2027 तक चलेगी — शेष भारत से दो महीने पहले। 16 से 30 नवंबर के बीच लोग ख़ुद अपनी जानकारी भर सकेंगे और गणना की आधार तिथि 5 जनवरी होगी। आज़ादी के बाद पहली बार हर निवासी से उसकी जाति पूछी जाएगी।

भारत में जाति के आँकड़े आख़िरी बार 1931 में प्रकाशित हुए थे। 1941 में जाति की गणना तो दोबारा हुई, पर द्वितीय विश्वयुद्ध में संसाधन खप जाने के कारण तालिकाएँ कभी संकलित नहीं हो पाईं। उसके बाद देश में सर्वेक्षण होते रहे — 2011 की सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना, 2023 में बिहार का सर्वेक्षण, 2025 में कर्नाटक का — पर जनगणना कभी नहीं हुई। राजनीतिक मत चाहे जो हो, 96 साल बाद जाति का जनगणना में लौटना लगभग एक सदी में पहला वास्तविक अवसर है जब नीति अनुमान के बजाय प्रमाण पर बन सकेगी।

प्रश्नावली सार्वजनिक हो चुकी है। 14 अगस्त को अधिसूचित यह प्रश्नावली लद्दाख तथा जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बर्फ़ से घिरे इलाक़ों में पहले से इस्तेमाल हो रही है। प्रश्न 10 में पहले अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति की स्थिति पूछी जाती है और फिर बाक़ी सबसे — “जाति का नाम लिखें”। साथ में दो ख़ास विकल्प भी हैं: “जाति बताना नहीं चाहते” और “कोई जाति नहीं”। यानी सरकार ने उस नागरिक के लिए भी जगह छोड़ी है जो ख़ुद को किसी वर्ग में रखा जाना ही नहीं चाहता।

फिर भी भ्रम व्यापक है, और इसकी शुरुआत दो कॉलमों से होती है। प्रश्न 9 धर्म पूछता है, प्रश्न 10 जाति। ये दोनों एक नहीं हैं। धर्म वह आस्था है जिसे व्यक्ति मानता है; जाति वह सामाजिक समूह है जिसमें वह उस धर्म के भीतर जन्म लेता है। गोरखपुर का कोई हिंदू यादव, कुर्मी, ब्राह्मण या जाटव हो सकता है — एक धर्म, सैकड़ों जातियाँ। यूपी के मुसलमान अंसारी, क़ुरैशी, सैफ़ी या सैयद हैं — किसी भी अन्य धर्म जितनी ही बिरादरियों वाली आस्था। बौद्धों में आगरा के आंबेडकरवादी धर्मांतरित भी हैं और लद्दाखी तथा तिब्बती समुदाय भी। जैन, जो भारत की आबादी का मात्र 0.37 प्रतिशत हैं, उनमें अग्रवाल, खंडेलवाल, पोरवाल, परवार, ओसवाल और दर्जनों अन्य जातियाँ शामिल हैं।

समुदाय अपने-अपने स्तर पर अभियान चला रहे हैं। कर्नाटक में वीरशैव महासभा ने राज्य सर्वेक्षण से पहले जागरूकता बैठकें कीं कि किस कॉलम में क्या लिखा जाए, और वोक्कालिगा नेताओं ने अपने सदस्यों से आग्रह किया कि वे उप-समूहों में बँटने के बजाय एक ही जाति का नाम लिखें। झारखंड में आदिवासी संगठन वर्षों से इस पर अभियान चला रहे हैं कि उनकी आस्था किस रूप में दर्ज हो। और Let Every Jain Count नाम की एक स्वयंसेवी पहल भारत के सबसे छोटे अल्पसंख्यक समुदायों में से एक के लिए यही काम कर रही है। इस पहल के बारे में स्वयंसेवक वैभव जैन कहते हैं — “हम कोई अलग गिनती नहीं करा रहे हैं, और न ही किसी से कोई ख़ास जवाब देने को कह रहे हैं। हम बस इतना चाहते हैं कि हर जैन, धर्म के कॉलम में ‘जैन’ लिखे और जाति के कॉलम में अपनी असल जाति — न इससे कम, न इससे ज़्यादा।”

96 साल से भारत का सबसे बड़ा राज्य जाति पर बहस करता रहा है, बिना एक भी सत्यापित आँकड़े के। केंद्र ने अब हर घर के हाथ में क़लम थमा दी है। दिसंबर 2026 वह समय है जब बहस ख़त्म होगी — और प्रमाण शुरू होंगे।

 

 

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