बांग्लादेश से नेपाल और मेडागास्कर तक: सड़कों पर क्यों उतरा ‘जेन ज़ेड’, दुनिया भर में कैसे तख्तापलट कर रही युवाओं की नई पीढ़ी?

नई दिल्ली: वर्तमान समय में दुनिया के कई देशों से एक जैसी ही उथल-पुथल भरी तस्वीर सामने आ रही है, जहाँ युवा अपनी-अपनी सरकारों के खिलाफ सड़कों पर उतरकर सीधे सत्ता से तीखे सवाल पूछ रहे हैं। बांग्लादेश से लेकर नेपाल, केन्या से मेडागास्कर और अब भारत में भी जेन ज़ेड (Gen Z – मोटे तौर पर 1997 से 2012 के बीच जन्मी पीढ़ी) के बीच असंतोष की गूंज साफ सुनाई दे रही है। इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के दौर में पली-बढ़ी यह पीढ़ी न केवल पूरी दुनिया से डिजिटल रूप से जुड़ी हुई है, बल्कि अपने लोकतांत्रिक अधिकारों, अभिव्यक्ति की आजादी और एक सुरक्षित-बेहतर भविष्य को लेकर बेहद जागरूक भी है।

युवाओं के इस विश्वव्यापी असंतोष और जनआंदोलनों के मुख्य कारण

दुनिया भर में भड़के इन छात्र और युवा आंदोलनों के पीछे कई ठोस और साझा सामाजिक-आर्थिक कारण मौजूद हैं:

  • भयंकर बेरोजगारी और अवसर की कमी: उच्च शिक्षा हासिल करने के बावजूद मनमाफिक नौकरी और रोजगार के अवसरों का न मिलना।

  • कमरतोड़ महंगाई और आर्थिक तंगी: जीवन-यापन की लागत में बेतहाशा बढ़ोतरी, जिससे युवाओं का आर्थिक भविष्य अंधकारमय दिख रहा है।

  • भ्रष्टाचार और परिवारवाद: सरकारी व्यवस्था, राजनीतिक गलियारों और नौकरियों में हावी भाई-भतीजावाद और व्यापक भ्रष्टाचार।

  • डिजिटल पाबंदियां: सरकार द्वारा इंटरनेट, सोशल मीडिया और अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाने की कोशिशें।

  • बुनियादी ढाँचे का अभाव: शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं की भारी कमी।

जब युवाओं को यह लगने लगता है कि उनकी कठोर मेहनत और लगन के बावजूद देश में अवसर सीमित हैं और सत्ता में बैठे लोग उनकी आवाज को अनसुना कर रहे हैं, तो उनका यह दबा हुआ आक्रोश एक व्यापक क्रांति और जनांदोलन का रूप ले लेता है।

बांग्लादेश से मेडागास्कर तक: कैसे तख्तापलट का कारण बना ‘जेन ज़ेड’ का गुस्सा

हाल के वर्षों में कई देशों में युवा शक्ति ने सीधे तौर पर सरकारों को उखाड़ फेंका है और जनहित में कड़े फैसले लेने पर मजबूर किया है:

  • बांग्लादेश (जुलाई-अगस्त 2024): सरकारी नौकरियों में विवादित आरक्षण के खिलाफ छात्रों का शुरू हुआ आंदोलन देखते ही देखते एक व्यापक सरकार-विरोधी क्रांति में बदल गया। युवाओं के प्रचंड जनसैलाब के आगे झुकते हुए 5 अगस्त 2024 को तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को अपना पद छोड़कर देश से भागना पड़ा।

  • केन्या (जून 2024): सरकार द्वारा प्रस्तावित टैक्स बढ़ोतरी वाले वित्त विधेयक (Finance Bill) के खिलाफ जेन ज़ेड ने मोर्चा खोल दिया। युवाओं का प्रदर्शन इतना उग्र हुआ कि प्रदर्शनकारी संसद परिसर के भीतर तक घुस गए, जिसके परिणामस्वरूप राष्ट्रपति विलियम रूटो को जनहित में उस टैक्स विधेयक को वापस लेने का ऐलान करना पड़ा।

  • नेपाल (सितंबर 2025): सरकार द्वारा सोशल मीडिया पर लगाए गए प्रतिबंधों, व्यापक भ्रष्टाचार और रोजगार के अभाव के खिलाफ युवाओं का गुस्सा भड़क उठा। व्यापक प्रदर्शनों के दबाव में आकर अंततः प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को अपने पद से इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा।

  • मेडागास्कर (सितंबर-अक्टूबर 2025): बिजली और पानी की भारी किल्लत से शुरू हुआ गुस्सा जल्द ही खराब प्रशासन और भ्रष्टाचार के खिलाफ एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन बन गया। अक्टूबर 2025 तक आते-आते राष्ट्रपति एंड्री राजोएलिना की सत्ता का पतन हो गया।

सोशल मीडिया की क्रांति और जेन ज़ेड की बुनियादी मांगें

इन सभी आंदोलनों की सबसे बड़ी ताकत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स रहे हैं। इसने युवाओं को अपनी समस्याओं को उठाने, रैलियां आयोजित करने और दुनिया के दूसरे कोनों में चल रहे आंदोलनों से प्रेरणा लेने का एक सशक्त माध्यम दिया है।

“जेन ज़ेड अब कोरे वादों पर भरोसा नहीं करती, उसे धरातल पर ठोस नतीजे चाहिए। इस पीढ़ी की मांग बेहद सीधी है—पढ़ाई पूरी करने के बाद सम्मानजनक नौकरी, मेहनत के बल पर आगे बढ़ने का निष्पक्ष अवसर और टैक्स चुकाने के बदले बेहतर सार्वजनिक सुविधाएं।”

असली चुनौती: सत्ता परिवर्तन के बाद व्यवस्था बदलना

हालांकि, इन ऐतिहासिक आंदोलनों की असली और सबसे कठिन परीक्षा सत्ता के तख्तापलट के बाद शुरू होती है। किसी उग्र आंदोलन के दम पर सरकार को गिराना तो आसान हो सकता है, लेकिन बरसों से सड़ी-गली और जड़ हो चुकी प्रशासनिक व्यवस्था को रातों-रात बदलना बेहद जटिल काम है।

जेन ज़ेड का यह वैश्विक विद्रोह केवल मौजूदा सरकारों के खिलाफ तात्कालिक गुस्सा भर नहीं है, बल्कि यह उस एक नए भविष्य की पुरजोर मांग है जिसमें युवाओं को रोजगार, आत्मसम्मान, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और समानता के समान अवसर मिल सकें।

 

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