यूपी राजनीति : ओवैसी और चंद्रशेखर के ‘तीसरे मोर्चे’ की आहट से गरमाई सियासत; अखिलेश यादव के लिए खड़ी हो सकती है बड़ी चुनौती

 उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाले एनडीए (NDA) और समाजवादी पार्टी व कांग्रेस के ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के बीच मुख्य मुकाबले के आसार थे। लेकिन इस बीच, एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में एक ‘तीसरे मोर्चे’ (Third Front) के गठन की संभावनाएं तेजी से बल पकड़ रही हैं।

यदि यह नया गठजोड़ आकार लेता है, तो यह उत्तर प्रदेश के मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (SP) और उसके मुखिया अखिलेश यादव के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाकर उनकी चुनावी राह में बड़ी चुनौती खड़ी कर सकता है।

ओवैसी का मुस्लिम बहुल सीटों पर फोकस, मटेरा और भिनगा से प्रत्याशियों का एलान

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी लगातार अखिलेश यादव और सपा पर हमलावर रुख अपनाए हुए हैं। उनकी मुख्य रणनीति राज्य की मुस्लिम बहुल सीटों पर अपनी पकड़ मजबूत करने की है। इसी कड़ी में ओवैसी ने बहराइच की मटेरा और श्रावस्ती की भिनगा जैसी सपा के मजबूत प्रभाव वाली सीटों से उम्मीदवारों की घोषणा कर चुनावी शंखनाद कर दिया है।

हाल ही में आजमगढ़ और रामपुर में आयोजित रैलियों के दौरान ओवैसी ने आजम खान की खुलकर तारीफ की, जबकि अखिलेश यादव पर मुस्लिम नेतृत्व को दरकिनार करने का आरोप लगाया। निकाय चुनावों में मिली सफलता (5 नगर पालिका चेयरमैन और 83 सभासद सीटें) से उत्साहित एआईएमआईएम अब कानपुर, प्रयागराज, सहारनपुर, रामपुर, अमरोहा और मेरठ जैसी मुस्लिम आबादी वाली सीटों पर विशेष रणनीति के तहत काम कर रही है।

दलित-मुस्लिम (40% वोट बैंक) समीकरण बनाने की तैयारी

हाल ही में असदुद्दीन ओवैसी, सुभासपा अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद का एक साथ वीडियो सामने आने के बाद तीसरे मोर्चे की अटकलों को और हवा मिली है। इस संभावित राजनीतिक गठजोड़ का मुख्य लक्ष्य राज्य में ‘दलित-मुस्लिम’ समीकरण तैयार करना है।

आंकड़ों का गणित:

  • दलित आबादी: लगभग 21%

  • मुस्लिम आबादी: लगभग 19%

  • संयुक्त प्रभाव: दोनों वर्ग मिलकर प्रदेश की लगभग 40% आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं।

सूत्रों के मुताबिक, यदि यह गठबंधन औपचारिक रूप लेता है, तो ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम लगभग 40 से 45 सीटों पर चुनाव लड़ सकती है, जबकि चंद्रशेखर आजाद की पार्टी और अन्य छोटे क्षेत्रीय दल बाकी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेंगे। हालांकि, ओवैसी के पिछले प्रयोग—जैसे 2022 का ‘भागीदारी परिवर्तन मोर्चा’ और 2024 का ‘पीडीएम (PDM) न्याय मोर्चा’—चुनावी नतीजों में कुछ खास कमाल नहीं दिखा सके थे, लेकिन इस बार जमीन पर उनकी सक्रियता काफी आक्रामक नजर आ रही है।

सपा की पैनी नजर, अखिलेश यादव ने भी झोंकी ताकत

एआईएमआईएम और चंद्रशेखर की बढ़ती जुगलबंदी पर समाजवादी पार्टी की भी पैनी नजर बनी हुई है। ओवैसी द्वारा मुस्लिम मतों में बिखराव की कोशिशों का काट ढूंढने के लिए अखिलेश यादव खुद एक्टिव हो गए हैं। ओवैसी के हमलों का जवाब देने और मुस्लिम समुदाय के बीच भरोसा कायम रखने के लिए अखिलेश यादव ने हाल ही में जेल में बंद रहे वरिष्ठ नेता आजम खान और उनके परिवार से व्यक्तिगत मुलाकात की थी। इसके अलावा, वह अपनी जनसभाओं में भी इशारों-इशारों में ओवैसी पर पलटवार कर रहे हैं।

आगामी विधानसभा चुनाव से पहले बन रहा यह नया सियासी समीकरण उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई सीटों पर कड़ा और त्रिकोणीय मुकाबला पैदा कर सकता है।

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