बिहार के उन बच्चों के लिए एक बेहद राहत भरी खबर है जो गरीबी, स्कूलों की दूरी या पारिवारिक मजबूरियों के कारण शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। राज्य सरकार ऐसे बच्चों के दरवाजे तक शिक्षा पहुंचाने के लिए एक अनूठी और महत्वाकांक्षी योजना ‘स्कूल ऑन व्हील्स’ (चक्के पर स्कूल) शुरू करने जा रही है। इस योजना के अंतर्गत बेकार पड़ी पुरानी बड़ी बसों को आधुनिक और सुंदर चलते-फिरते क्लासरूम में बदला जाएगा। ये बसें खुद चलकर झुग्गी-झोपड़ियों, बस्तियों और सुदूर ग्रामीण इलाकों तक पहुंचेगी, ताकि कोई भी बच्चा अनपढ़ न रहे।
इस चलते-फिरते स्कूल में बच्चों को मिलेंगी ये आधुनिक सुविधाएं
यह बस केवल पारंपरिक शिक्षा देने का जरिया नहीं होगी, बल्कि बच्चों को पढ़ाई के प्रति आकर्षित करने के लिए इसमें कई विशेष सुविधाएं दी जाएंगी:
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डिजिटल और हाई-टेक क्लासरूम: बस के भीतर वाई-फाई, डिजिटल लर्निंग सिस्टम और स्मार्ट स्क्रीन की व्यवस्था होगी, जिससे बच्चे खेल-खेल में आधुनिक तरीके से पढ़ाई कर सकेंगे।
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गरमा-गरम मिड-डे मील: स्कूल आने वाले सभी बच्चों को दोपहर का ताजा, पौष्टिक और स्वादिष्ट खाना बिल्कुल मुफ्त दिया जाएगा।
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फ्री ड्रेस और अध्ययन सामग्री: गरीब परिवारों पर आर्थिक बोझ न पड़े, इसके लिए बच्चों को स्कूल यूनिफॉर्म, किताबें और कॉपियां बिना किसी शुल्क के मुहैया कराई जाएंगी।
पहले चरण में बिहार के इन 5 जिलों से होगी शुरुआत
राज्य सरकार इस पहल को शुरुआती चरण में बिहार के 5 प्रमुख जिलों में लागू करने जा रही है। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकार (NALSA) के चयन के अनुसार यह सेवा सबसे पहले भागलपुर, पटना, मुजफ्फरपुर, गया और दरभंगा जिलों में शुरू की जाएगी। सफलता के आधार पर आने वाले समय में इसका विस्तार राज्य के अन्य जिलों में भी किया जाएगा।
इन बच्चों को मिलेगा योजना का सीधा लाभ
‘स्कूल ऑन व्हील्स’ मुख्य रूप से उन बच्चों को लक्षित करेगी जो मुख्यधारा की शिक्षा प्रणाली से दूर रह गए हैं:
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सड़क किनारे और असहाय बच्चे: ट्रैफिक सिग्नल पर सामान बेचने वाले, भीख मांगने वाले, अनाथ या फुटपाथ पर जीवन बिताने वाले बच्चों को चिन्हित कर इसमें नामांकित किया जाएगा।
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उम्र सीमा: इस विशेष स्कूल में 6 से 14 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों का दाखिला लिया जाएगा।
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ड्रॉपआउट बच्चे: जिन बच्चों ने पारिवारिक या आर्थिक कारणों से बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी थी, उन्हें भी दोबारा शिक्षा से जोड़ा जाएगा।
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अभिभावकों की सहमति व आगे का रास्ता: दाखिले से पहले माता-पिता या अभिभावकों की लिखित सहमति अनिवार्य होगी। इस बस में बच्चों को बुनियादी रूप से इतना सक्षम बनाया जाएगा ताकि वे आगे चलकर अपनी उम्र के अनुसार सामान्य सरकारी स्कूलों में सीधे एडमिशन ले सकें।
नगर निगम और प्रशासन निभाएंगे अहम भूमिका
इस पूरे प्रोजेक्ट को सुचारू रूप से चलाने के लिए कानून विभाग (लीगल), शिक्षा विभाग, नगर निगम और जिला प्रशासन (कलेक्टर कार्यालय) मिलकर काम करेंगे। नगर निगम बच्चों की दैनिक उपस्थिति (अटेंडेंस) और उनकी पढ़ाई के स्तर में हो रहे सुधार का पूरा रिकॉर्ड रखेगा। साथ ही बच्चों को दी जा रही शिक्षा की गुणवत्ता की समय-समय पर जांच की जाएगी।
बिहार से पहले यह अभिनव योजना महाराष्ट्र, गुजरात, केरल, असम और मणिपुर जैसे राज्यों में सफलतापूर्वक संचालित की जा रही है। अब बिहार भी इस सूची में शामिल होकर जरूरतमंद बच्चों के भविष्य को संवारने की दिशा में एक बड़ा कदम बढ़ा रहा है।


















