एआई युग में मानवीय श्रेष्ठता के एक वर्ष : नितिन सेठ ने हिंदी संस्करण लॉन्च किया, एआई की चर्चा को भारत तक पहुंचाया

नई दिल्ली : वैश्विक कारोबारी नेता, बेस्टसेलिंग लेखक और इंसीडो इंक. के सह-संस्थापक एवं सीईओ नितिन सेठ ने हाल ही में अपनी पुस्तक Human Edge in the AI Age के हिंदी संस्करण एआई युग में मानवीय श्रेष्ठता: सफलता पाने के आठ शाश्वत मंत्र’ का अनावरण नई दिल्ली स्थित एलॉफ्ट बाय मैरियट में आयोजित एक कार्यक्रम में किया। पुस्तक की यात्रा का एक वर्ष पूरा होने के अवसर पर हिंदी संस्करण लॉन्च किया गया। इस दौरान यह पुस्तक अमेज़न इंडिया पर एआई और कंप्यूटर साइंस श्रेणियों में लगातार बेस्टसेलर पुस्तकों में शामिल रही है। हिंदी संस्करण का उद्देश्य एआई, कामकाज और मानवीय एजेंसी से जुड़ी चर्चा को अंग्रेज़ी बोलने वाले महानगरीय वर्ग से आगे ले जाकर व्यापक भारत तक पहुंचाना है।

पुस्तक के केंद्र में एक सरल, लेकिन तेजी से महत्वपूर्ण होता विचार है – एआई युग का वास्तविक वादा केवल बेहतर मशीनें बनाने में नहीं, बल्कि बेहतर इंसान तैयार करने में भी निहित है।

जैसे-जैसे एआई विभिन्न प्रकार के बौद्धिक कार्यों को अपने दायरे में ले रहा है, सेठ इस सवाल की पड़ताल करते हैं कि आखिर कौन-सी क्षमताएं मनुष्य को विशिष्ट बनाती हैं – हमारा विवेक, हमारे मूल्य, हमारा उद्देश्य और सबसे बढ़कर हमारी बहुआयामी रचनात्मकता। वह यह भी बताते हैं कि तकनीकी प्रगति के कारण इन मानवीय गुणों के कमजोर पड़ने के बजाय इन्हें किस तरह स्थायी बढ़त के स्रोत में बदला जा सकता है।

पुस्तक में सेठ ने इस विचार को अपने आठ आयामों वाले ‘द POSSIBLE फ्रेमवर्क’ के माध्यम से व्यावहारिक रूप दिया है। इस फ्रेमवर्क में प्रॉब्लम-सॉल्विंग, ओपननेस टू चेंज, स्पिरिचुअलिटी, स्पोर्ट्स, इम्पैक्ट, बैलेंस, लीडरशिप और आंत्रप्रेन्योरशिप यानी समस्या-समाधान, बदलाव को अपनाने की क्षमता, आध्यात्मिकता, खेल, प्रभाव, संतुलन, नेतृत्व और उद्यमिता शामिल हैं। इन सभी आयामों का उद्देश्य लोगों को उन मानवीय क्षमताओं को मजबूत करने में मदद करना है जो समय के साथ प्रासंगिक बनी रहती हैं, ताकि वे एआई युग में अधिक अनुकूलनशीलता, स्वायत्तता और उद्देश्यपूर्ण दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ सकें।

हिंदी संस्करण के अनावरण के बाद टेक्नोलॉजी, सार्वजनिक नीति, उद्यमिता, प्रकाशन और पर्यावरण के क्षेत्र से जुड़े प्रतिष्ठित वक्ता एक पैनल चर्चा में शामिल हुए। चर्चा का विषय था ‘एआई फॉर भारत ‘ – एआई भारत के लिए क्या मायने रखती है और तेजी से एआई-संचालित होती दुनिया में भारत अपना अलग रास्ता किस तरह बना सकता है। इंसीडो इंक. के सह-संस्थापक एवं सीईओ नितिन सेठ के साथ पैनल में डिजिटल इंडिया कॉरपोरेशन के एमडी एवं सीईओ अखिल कुमार, गरुड़ प्रकाशन के संस्थापक एवं सीईओ/सीटीओ संक्रांत सानु और पर्यावरणविद् तथा गिव मी ट्रीज़ ट्रस्ट के संस्थापक पीपल बाबा (स्वामी प्रेम परिवर्तन) शामिल हुए। चर्चा का संचालन वरिष्ठ पत्रकार और एनडीटीवी की पूर्व एडिटोरियल डायरेक्टर सोनिया सिंह ने किया।

पैनल चर्चा का एक प्रमुख विचार यह रहा कि एआई में भारत का सबसे बड़ा अवसर शायद बड़े फ़ाउंडेशन मॉडल पर अमेरिका और चीन के साथ सीधी प्रतिस्पर्धाकरने में नहीं है। सेठ ने कहा कि वैश्विक एआई प्रतिस्पर्धा का बड़ा हिस्सा अब तक इन्फ्रास्ट्रक्चर और फाउंडेशन मॉडल के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा है, लेकिन भारत के लिए कहीं बड़ा अवसर एप्लिकेशन लेयर में मौजूद है। उनके अनुसार, भारत किफायती और भरोसेमंद एआई एप्लिकेशन विकसित करने के साथ-साथ उस डिजिटल इकोसिस्टम का लाभ उठा सकता है जिसे देश पहले ही बड़े पैमाने पर तैयार कर चुका है। उन्होंने कहा कि भारत का दशकों पुराना आईटी सर्विसेज उद्योग देश को आवश्यक प्रतिभा, विभिन्न क्षेत्रों की गहरी समझ और तकनीकी विशेषज्ञता उपलब्ध कराता है।

इस आधार पर भारत टेक्नोलॉजी सेवाएं उपलब्ध कराने वाले देश की अपनी पारंपरिक भूमिका से आगे बढ़कर एआई-आधारित उत्पादों और समाधानों का निर्माता बन सकता है। सेठ ने फ्रूगल इनोवेशनयानी कम संसाधनों में प्रभावी नवाचार की संभावनाओं की ओर भी ध्यान दिलाया, जिसमें किफायत के साथ सुरक्षा, भरोसा और डेटा की स्थानीय अभिरक्षा का संतुलन बनाया जा सकता है।

एआई युग के लिए डिजिटल आधार

अखिल कुमार ने चर्चा का ध्यान भारत की मौजूदा डिजिटल तैयारियों की ओर आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि भारत डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर, जैसे यूपीआई, के माध्यम से पहले ही यह साबित कर चुका है कि वह बहुत बड़े पैमाने पर डिजिटल प्रणालियां विकसित और लागू कर सकता है। इस क्षमता को देश के विशाल टेक्नोलॉजी टैलेंट पूल और स्थापित डिजिटल डिलीवरी प्लेटफॉर्म से भी मजबूती मिलती है।

अखिल ने कहा, “एप्लिकेशन लेयर वह क्षेत्र है, जहां भारत के पास बड़ी बढ़त है।”

उन्होंने यह भी कहा कि भारत की विविधता और व्यापक पैमाने को ध्यान में रखकर विकसित किए गए समाधान ग्लोबल साउथ के अन्य देशों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकते हैं। कुमार ने महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजी क्षेत्रों में रणनीतिक क्षमता और आत्मनिर्भरता विकसित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उनके अनुसार, इसके लिए किफायती कंप्यूटिंग क्षमता, भारतीय एआई मॉडल और सुरक्षित, भरोसेमंद तथा ‘सिटिजन-फर्स्ट’ यानी नागरिक-केंद्रित नीतिगत ढांचे की जरूरत होगी।

महानगरों से आगे उद्यमिता

संक्रांत सानु ने कहा कि एआई फॉर भारत’ को केवल स्वदेशी फाउंडेशन मॉडल बनाने की होड़ तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक, इससे भी बड़ा अवसर एआई आधारित उद्यमिता को बढ़ावा देने में है, खासकर टियर-2 और टियर-3 शहरों में। जैसे-जैसे एआई सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट और उत्पाद निर्माण की लागत कम कर रहा है, छोटी टीमें और यहां तक कि अकेले काम करने वाले व्यक्ति भी ऐसे कारोबार खड़े कर सकते हैं जिनके लिए पहले कहीं अधिक पूंजी और मानव संसाधन की जरूरत होती थी।

सानु ने कहा, यह वह समय है जब लोग एक व्यक्ति द्वारा खड़ी की जा सकने वाली अरबों डॉलर की यूनिकॉर्न कंपनियों की बात कर रहे हैं।” उन्होंने भारत की 1.4 अरब की आबादी में छिपी व्यापक उद्यमशील संभावनाओं की ओर इशारा किया।

इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए सेठ ने कहा कि भारत का विशाल आकार और उसकी जटिलता उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत बन सकती है। शिक्षा, कृषि और स्वास्थ्य सेवा से जुड़ी चुनौतियां केवल भारत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ग्लोबल साउथ के बड़े हिस्से में समान रूप से मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि एआई गुणवत्तापूर्ण सेवाओं तक पहुंच बढ़ाकर और विकास की गति तेज करके इन समस्याओं का बड़े पैमाने पर समाधान करने का अवसर देता है। इसलिए भारत में सफल होने वाले समाधान उसकी सीमाओं से कहीं आगे भी उपयोगी साबित हो सकते हैं। इससे भारत ग्लोबल साउथ और अंततः पूरी दुनिया के लिए व्यावहारिक तथा बड़े पैमाने पर लागू किए जा सकने वाले एआई नवाचारों के स्रोत के रूप में उभर सकता है।

जब टेक्नोलॉजी की बहस दार्शनिक सवालों पर पहुंची

चर्चा स्वाभाविक रूप से इन्फ्रास्ट्रक्चर, मॉडल और उद्यमिता से आगे बढ़ते हुए एक अधिक गहरे सवाल पर पहुंची: आखिर एआई का मानव बुद्धिमत्ता के लिए क्या अर्थ है?

भारत की दार्शनिक और आध्यात्मिक परंपराओं के संदर्भ में पैनल ने बुद्धिमत्ता, मानवीय एजेंसी और टेक्नोलॉजी तथा चेतना के बीच संबंध पर विचार किया। सेठ का मानना है कि आध्यात्मिकता और टेक्नोलॉजी पहली नजर में एक-दूसरे के विपरीत दिखाई दे सकती हैं, लेकिन वास्तव में वे एक-दूसरे की पूरक भी हो सकती हैं। चर्चा में इस बात पर विचार किया गया कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपराएं बुद्धिमत्ता, मानवीय एजेंसी और एआई के जिम्मेदार उपयोग को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण उपलब्ध करा सकती हैं।

इस संदर्भ में पीपल बाबा ने शायद सबसे व्यापक दृष्टिकोण सामने रखा। उन्होंने कहा, “मैं इसे हमारी विकास यात्रा के एक हिस्से के रूप में देखता हूं। यह सीमाओं से परे की टेक्नोलॉजी है और किसी एक देश के स्वामित्व में नहीं है। संभव है कि यह दुनिया में मनुष्यों और हमारी मौजूदा व्यवस्थाओं के साथ उभर रही एक तीसरी सत्ता के रूप में सामने आए।” इसलिए उन्होंने कहा कि डर हमारी प्रतिक्रिया नहीं हो सकती। अधिक रचनात्मक रास्ता यह होगा कि लोगों को इस सीमाहीन टेक्नोलॉजी को समझने में मदद की जाए और उन्हें एआई से पैदा होने वाले अवसरों के निर्माण में भाग लेने में सक्षम बनाया जाए।

इस आशावाद के साथ-साथ कॉग्निटिव सरेंडर’ यानी बौद्धिक आत्मसमर्पण को लेकर एक चेतावनी भी सामने आई। अगर लोग लेखन, कोडिंग, विश्लेषण और निर्णय लेने जैसे कार्यों के लिए मशीनों पर निर्भर होते जाएंगे, तो क्या धीरे-धीरे उनकी अपनी सोचने की क्षमता कमजोर पड़ सकती है? हालांकि पैनल ने इस धारणा से भी सावधान किया कि एआई के साथ बड़ी हो रही नई पीढ़ियां अनिवार्य रूप से कम सक्षम होती जा रही हैं। इसके बजाय संभव है कि उनमें अलग प्रकार की बौद्धिक क्षमताएं विकसित हों और वे सीखने तथा समस्याओं का समाधान करने के नए तरीके अपनाएं।

इसके बाद चर्चा एक बड़े सामाजिक प्रश्न की ओर लौटी: क्या एआई असमानता को और बढ़ाने वाली ताकत बनने के बजाय समान अवसर उपलब्ध कराने वाला माध्यम बन सकता है? भारत के संदर्भ में इसका जवाब काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि एआई, कौशल और अवसरों तक पहुंच केवल कुछ विशेषाधिकार प्राप्त लोगों तक सीमित न रहे, बल्कि समाज के व्यापक वर्गों तक पहुंचे। इसमें शिक्षा और जागरूकता की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। इनका उद्देश्य केवल लोगों को एआई से पैदा होने वाले अवसरों के बारे में बताना नहीं होगा, बल्कि उन्हें इन अवसरों में सार्थक रूप से भाग लेने के लिए आवश्यक क्षमताओं से भी लैस करना होगा। अखिल कुमार ने कहा कि सरकार की भूमिका किसी विचार को प्रोटोटाइप और फिर प्रोटोटाइप को वास्तविक उत्पादन तक पहुंचाने की पूरी यात्रा को सक्षम बनाने की है। उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर सरकार पहले ग्राहक या उत्प्रेरक की भूमिका निभा सकती है, साथ ही सुरक्षित और भरोसेमंद एआई के लिए नागरिक-केंद्रित सुरक्षा मानक भी उपलब्ध करा सकती है।

अंततः जिम्मेदारी हम सभी की है। मानवता एआई का निर्माण, नियमन और इस्तेमाल किस प्रकार करती है, यही तय करेगा कि भविष्य किस दिशा में जाएगा। सेठ ने इस बात पर जोर देते हुए चर्चा का सारांश दिया कि एआई का भविष्य संभावित (प्रोबेबिलिस्टिक) है, न कि नियतात्मक (डिटरमिनिस्टिक). एआई में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के परिणाम पैदा करने की क्षमता है। एक ओर यह अधिक समृद्धि और समावेशन ला सकता है तथा व्यक्तिगत, उद्यम और सामाजिक स्तर पर मानव प्रगति के अगले चरण को गति दे सकता है। दूसरी ओर यह असमानता, रोजगार विस्थापन और मानवीय एजेंसी के क्षरण को भी बढ़ा सकता है। इनमें से कौन-सा परिणाम सामने आएगा, यह पहले से तय नहीं है। इसलिए एआई का भविष्य केवल अनुमान लगाने या उससे डरने की चीज नहीं है, बल्कि ऐसा भविष्य है जिसे हमें सोच-समझकर और सक्रिय रूप से आकार देना होगा

 

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