सुप्रीम कोर्ट में आरक्षण और चयन से जुड़ा अनोखा मामला: जनरल से ज्यादा नंबर लाने पर भी OBC कैंडिडेट का नहीं हुआ सिलेक्शन, जानें क्या है पूरा विवाद

 नई दिल्ली। सरकारी नौकरियों में आरक्षण और चयन प्रक्रिया से जुड़ा एक पेचीदा मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आया है। एक तरफ जहां आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवारों को आयु सीमा (उम्र में छूट) जैसी सहूलियतें दी जाती हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ मामलों में यही छूट चयन के दौरान उनके लिए अड़चन बन जाती है। त्रिपुरा के एक ओबीसी (OBC) उम्मीदवार जयंत देबनाथ का मामला इन दिनों काफी चर्चा में है, जहां सामान्य वर्ग से ज्यादा अंक लाने के बावजूद उनका चयन नहीं हो सका।

केंद्र सरकार ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए पूरी स्थिति स्पष्ट की है। आइए जानते हैं पूरा मामला और इसके पीछे के नियम क्या हैं।

क्या है पूरा मामला और क्यों नहीं हुआ चयन?

त्रिपुरा के रहने वाले ओबीसी उम्मीदवार जयंत देबनाथ ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPFs), एनआईए (NIA), सचिवालय सुरक्षा बल और असम राइफल्स में कांस्टेबल/राइफलमैन भर्ती परीक्षा के लिए आवेदन किया था।

  • उम्र में छूट का लाभ: जयंत देबनाथ की उम्र सामान्य (General) कैटेगरी के लिए निर्धारित अधिकतम आयु सीमा से अधिक थी, लेकिन ओबीसी कैटेगरी के लिए तय सीमा के दायरे में थी। इस वजह से उन्होंने आरक्षित श्रेणी के तहत ‘उम्र में छूट’ (Age-relaxation) का लाभ लिया और परीक्षा में शामिल हुए।

  • सामान्य से ज्यादा अंक: 2018 की इस भर्ती परीक्षा में जयंत देबनाथ ने 55.1 अंक प्राप्त किए, जो कि इसी परीक्षा में 46.26 अंक पाने वाले सामान्य श्रेणी के एक अन्य उम्मीदवार (सागर देबनाथ) से काफी ज्यादा थे।

  • चयन न होने की वजह: इसके बावजूद जयंत का चयन नहीं हुआ। केंद्र सरकार के मुताबिक, ओबीसी उम्मीदवारों के लिए कट-ऑफ अंक 60 निर्धारित किए गए थे, जो कि सामान्य श्रेणी के कट-ऑफ से अधिक थे। साथ ही, ओबीसी श्रेणी में रिक्तियों (Vacancies) की संख्या सीमित थी।

केंद्र सरकार का तर्क: क्यों नहीं बदला जा सकता कैटेगरी का दायरा?

केंद्र सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में पैरवी कर रहीं अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने बेंच के सामने दलील दी कि भर्ती नियमों के मुताबिक यदि कोई आरक्षित श्रेणी का उम्मीदवार उम्र में छूट या अन्य किसी रियायत का लाभ लेकर परीक्षा में शामिल होता है, तो उसे बाद में सामान्य (अनारक्षित) श्रेणी में शिफ्ट होने की अनुमति नहीं दी जाती।

नियमों के तहत, ऐसे उम्मीदवार का मुकाबला सिर्फ अपनी ही आरक्षित श्रेणी के अन्य अभ्यर्थियों के साथ होता है, भले ही उसके अंक सामान्य श्रेणी के कई चयनित उम्मीदवारों से ज्यादा क्यों न हों।

त्रिपुरा हाईकोर्ट का फैसला और सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

इससे पहले त्रिपुरा हाईकोर्ट की सिंगल-जज बेंच और डिवीजन बेंच, दोनों ने ही अपने फैसलों में यह कहा था कि जयंत देबनाथ को कांस्टेबल के पद पर चयन के लिए योग्य माना जाना चाहिए, क्योंकि उनके अंक सामान्य वर्ग के चयनित अभ्यर्थी से अधिक थे।

त्रिपुरा हाईकोर्ट के इसी फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की है। वर्तमान में यह मामला सुप्रीम कोर्ट की बेंच के समक्ष विचाराधीन है, जहां इस कानूनी और प्रशासनिक पेंच पर सुनवाई चल रही है।

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