Auraiya : जिले के बहुचर्चित अधिवक्ता मंजुल चौबे और उनकी चचेरी बहन सुधा चौबे हत्याकांड में बुधवार को छह साल बाद अदालत ने फैसला सुनाया। विशेष एमपी-एमएलए कोर्ट ने समाजवादी पार्टी के पूर्व एमएलसी कमलेश पाठक, उनके भाई और पूर्व ब्लॉक प्रमुख संतोष पाठक समेत 10 आरोपितों को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। मामले में एक आरोपित नाबालिग है, जिसका मुकदमा किशोर न्याय बोर्ड में विचाराधीन है।
लंबे समय से चल रहे इस मुकदमे के फैसले को लेकर न्यायालय परिसर के साथ-साथ पूरे जिले में भी लोगों की नजरें टिकी हुई थीं। घटना के बाद से ही यह मामला औरैया के चर्चित आपराधिक मामलों में शामिल रहा। पुलिस ने विवेचना पूरी करने के बाद आरोपितों के खिलाफ न्यायालय में आरोपपत्र दाखिल किया था। करीब छह वर्षों तक चली सुनवाई के दौरान अभियोजन और बचाव पक्ष ने अपने-अपने पक्ष में साक्ष्य और गवाह पेश किए। इसके बाद अदालत ने 10 आरोपितों को हत्या के मामले में दोषी माना।
जमीन विवाद से शुरू हुई थी रंजिश
पुलिस के अनुसार, इस दोहरे हत्याकांड की जड़ पंचमुखी हनुमान मंदिर के पास स्थित करीब एक बीघा जमीन को लेकर शुरू हुए विवाद से जुड़ी थी। इसी जमीन को लेकर कमलेश पाठक और अधिवक्ता मंजुल चौबे के बीच मतभेद बढ़ते चले गए थे। बताया जाता है कि कभी दोनों के बीच गहरी दोस्ती थी और वे राजनीतिक व सामाजिक गतिविधियों में साथ नजर आते थे, लेकिन समय के साथ दोनों के रास्ते अलग हो गए।
कमलेश पाठक मंदिर के पास स्थित जमीन पर अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते थे, जबकि मंजुल चौबे इसका विरोध कर रहे थे। जमीन को लेकर शुरू हुआ विवाद धीरे-धीरे व्यक्तिगत और राजनीतिक रंजिश में बदल गया। दोनों पक्षों के बीच तनातनी बढ़ने के बाद इलाके के लोगों की नजर भी इस विवाद पर रहने लगी थी।
विवाद के दौरान हुई थी फायरिंग
पुलिस के मुताबिक, घटना वाले दिन कमलेश पाठक मंदिर परिसर के पास जमीन पर कुर्सी डालकर बैठे थे। इसी दौरान मंजुल चौबे के पिता वहां पहुंचे और दोनों पक्षों के बीच कहासुनी शुरू हो गई। विवाद बढ़ने पर दोनों परिवारों के लोग मौके पर पहुंच गए। कमलेश के भाई संतोष और रामू भी वहां पहुंचे।
आरोप है कि विवाद बढ़ने के दौरान मारपीट शुरू हो गई और इसी बीच फायरिंग हुई। गोलियां चलने से अधिवक्ता मंजुल चौबे और उनकी चचेरी बहन सुधा चौबे जमीन पर गिर पड़े। दोनों की मौके पर ही मौत हो गई। घटना के बाद इलाके में अफरातफरी मच गई और पुलिस ने मौके पर पहुंचकर स्थिति को संभाला।
दोहरे हत्याकांड की सूचना मिलते ही पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया। मामले में कमलेश पाठक, उनके भाइयों समेत कई लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया। पुलिस ने अलग-अलग स्थानों पर दबिश देकर आरोपितों को गिरफ्तार किया था।
कभी जिगरी दोस्त थे कमलेश और मंजुल
मंजुल चौबे और कमलेश पाठक के बीच कभी बेहद करीबी संबंध थे। आसपास के लोग मंजुल को कमलेश पाठक की परछाई तक कहते थे। मंजुल छात्र राजनीति से जुड़े थे और तिलक महाविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष भी चुने गए थे। उस समय कमलेश पाठक ने उन्हें राजनीतिक रूप से आगे बढ़ाने में सहयोग किया था।
समय के साथ मंजुल चौबे की अपनी राजनीतिक पहचान बनने लगी। वर्ष 2006 के नगर पालिका चुनाव के दौरान दोनों के बीच मतभेद सामने आने लगे। बाद में मंजुल चौबे भाजपा नेताओं के करीब होते गए, जबकि कमलेश पाठक सपा के साथ बने रहे। राजनीतिक मतभेदों के बीच पंचमुखी हनुमान मंदिर के पास जमीन का विवाद सामने आया और दोनों की पुरानी दोस्ती दुश्मनी में बदल गई।
कम उम्र में विधायक बनने से लेकर एमएलसी तक का सफर
कमलेश पाठक औरैया की राजनीति में लंबे समय तक प्रभावशाली नाम रहे। महज 28 वर्ष की उम्र में वह सपा से विधायक बने थे। इसके बाद उन्होंने मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 1990 में वह विधान परिषद सदस्य रहे और 1991 में उन्हें दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री बनाया गया।
वर्ष 2002 में उन्होंने दिबियापुर विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर दोबारा विधायक का चुनाव जीता। वर्ष 2007 में उन्होंने दिबियापुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। वर्ष 2012 में सिकंदरा विधानसभा सीट से भी उन्हें हार मिली। इसके बावजूद वर्ष 2013 में सपा सरकार ने उन्हें रेशम विभाग का अध्यक्ष बनाकर राज्यमंत्री का दर्जा दिया। वर्ष 2015 में सपा ने उन्हें दोबारा एमएलसी बनाया।
हत्या के बाद गैंगस्टर एक्ट में भी हुई कार्रवाई
दोहरे हत्याकांड के बाद पुलिस और प्रशासन ने आरोपितों के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत भी कार्रवाई की थी। प्रशासन ने कमलेश पाठक समेत अन्य आरोपितों की संपत्तियों को भी कार्रवाई के दायरे में लिया था। बताया गया कि कमलेश पाठक की करीब 36.15 करोड़ रुपये, संतोष पाठक की 9.75 करोड़ रुपये और रामू पाठक की करीब 7.51 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त की गई थी।
छह साल चली सुनवाई, फैसले पर टिकी थीं निगाहें
दोहरे हत्याकांड की सुनवाई के दौरान मुकदमे में कई तारीखें पड़ीं। अभियोजन और बचाव पक्ष की ओर से बड़ी संख्या में गवाह पेश किए गए। दोनों पक्षों की लंबी बहस के बाद विशेष एमपी-एमएलए कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया।
छह साल से लंबित इस मामले में 10 आरोपितों को उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के बाद पीड़ित परिवार के लोगों ने न्याय मिलने की बात कही है। वहीं, मामले से जुड़े अन्य कानूनी पहलुओं पर आगे की प्रक्रिया जारी रहेगी।












