Journalist Shantanu Shukla ने स्वामी कैलाशानंद गिरी जी महाराज की प्रशंसा में कहा….साधना सभी करते हैं, लेकिन तप की ऊँचाइयाँ विरले ही छू पाते हैं 

कठोर तप, त्याग, अनुशासन और लोकमंगल का संकल्प ही किसी संत को विशिष्ट बनाता है

स्वामी कैलाशानंद गिरी जी महाराज : भारतीय सनातन परंपरा में साधना केवल पूजा-पाठ या ध्यान का नाम नहीं है। साधना का वास्तविक अर्थ है—अपने मन, इंद्रियों और अहंकार पर विजय प्राप्त करना। यही कारण है कि साधना का मार्ग जितना दिव्य है, उतना ही कठिन भी है। इस मार्ग पर चलने वाले अनेक होते हैं, किंतु तप की सर्वोच्च ऊँचाइयों तक पहुँचने वाले संत विरले ही होते हैं।

हमारे शास्त्र बताते हैं कि तपस्या का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत सिद्धि प्राप्त करना नहीं, बल्कि लोककल्याण और धर्म की रक्षा का संकल्प भी है। जब कोई साधक वर्षों तक संयम, त्याग, अनुशासन और अखंड साधना का जीवन जीता है, तभी उसके व्यक्तित्व में वह तेज प्रकट होता है, जो समाज के लिए प्रेरणा बनता है।

आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरी जी महाराज का जीवन भी इसी तप और साधना की परंपरा का उदाहरण माना जाता है। उनकी साधना केवल व्यक्तिगत आध्यात्मिक उन्नति तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्र, समाज और सनातन धर्म के कल्याण की भावना से प्रेरित है। सावन जैसे पवित्र मास में उनका दीर्घकालीन जप, ध्यान और रुद्राभिषेक श्रद्धालुओं के लिए आस्था और प्रेरणा का केंद्र बनता है।

यह समझना आवश्यक है कि किसी भी संत का सम्मान केवल उसके पद से नहीं होता। ‘आचार्य महामंडलेश्वर’ जैसी उपाधि अखाड़ा परंपरा में अत्यंत प्रतिष्ठित है, किंतु उसके अनुरूप जीवन जीना निरंतर तप, अनुशासन, शास्त्रज्ञान और समाज के प्रति समर्पण की माँग करता है। पद प्रतिष्ठा दे सकता है, परंतु तप ही उसे सार्थक बनाता है।

आज के समय में, जब जीवन सुविधाओं की ओर अधिक आकर्षित है, तब कठोर साधना का मार्ग चुनना अपने आप में एक बड़ा संदेश है। यह हमें बताता है कि आत्मबल, धैर्य और आध्यात्मिक उन्नति का कोई सरल मार्ग नहीं होता। जो जितना अधिक तप करता है, उसका जीवन उतना ही अधिक लोकहित के लिए समर्पित होता जाता है।

स्वामी कैलाशानंद गिरी जी महाराज : सावन का पावन मास हमें भी यही प्रेरणा देता है कि हम अपने जीवन में संयम, सेवा, सत्य और सदाचार को स्थान दें। यदि हम भगवान शिव की आराधना के साथ अपने आचरण को भी श्रेष्ठ बनाने का प्रयास करें, तो वही सच्ची साधना होगी।

सनातन परंपरा का संदेश स्पष्ट है—साधना का मूल्य उसके प्रदर्शन में नहीं, बल्कि उसके प्रभाव में है। और जब किसी संत का तप समाज, संस्कृति और राष्ट्र के लिए प्रेरणा बन जाए, तभी वह साधना अपने सर्वोच्च उद्देश्य को प्राप्त करती है।

हर-हर महादेव!

शान्तनु शुक्ल

(लेखक धार्मिक मामलों के विशेषज्ञ एवं वरिष्ठ पत्रकार है )

 

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