उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज (पुरनिया) में हुए दिल दहला देने वाले अग्निकांड ने पूरे सूबे को झकझोर कर रख दिया है। इस हादसे के बाद अब सरकारी सिस्टम और बिजली विभाग (Electricity Department) की कार्यशैली पर बेहद गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इस मामले में कार्रवाई की पहली गाज जानकीपुरम जोन के अधिशाषी अभियंता (XEN) पर गिरी है, जिन्हें सस्पेंड कर दिया गया है। लखनऊ के इतिहास के इस सबसे भीषण अग्निकांड के अगले दिन भी प्रभावित इलाके में ऐसा सन्नाटा पसरा रहा, जो इस त्रासदी की भयावहता को खुद बयां कर रहा था।
चेतावनी को किया गया नजरअंदाज, बार-बार ट्रिप हो रही थी MCB
शुरुआती जांच में भले ही आग लगने की मुख्य वजह शॉर्ट-सर्किट बताई जा रही हो, लेकिन इसके पीछे की इनसाइड स्टोरी बेहद चौंकाने वाली है। सूत्रों के मुताबिक, जिस बहुमंजिला बिल्डिंग में यह भयावह हादसा हुआ, वहां की एमसीबी (MCB) बार-बार ट्रिप हो रही थी। परिसर के लोगों ने इसकी शिकायत भी दर्ज कराई थी, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों ने इसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। बिजली विभाग के ही एक उच्चाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि बार-बार एमसीबी का गिरना इस बात का साफ संकेत था कि या तो बिल्डिंग में क्षमता से अधिक ओवरलोडिंग थी या फिर अंदरूनी तौर पर शॉर्ट-सर्किट शुरू हो चुका था। इस बड़ी लापरवाही पर जब जानकीपुरम जोन के चीफ इंजीनियर से संपर्क करने की कोशिश की गई, तो घटना के 24 घंटे बाद भी उन्होंने चुप्पी साधे रखी।
विद्युत सुरक्षा निदेशालय की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल
विभाग के भीतर से ही अब यह आवाज उठने लगी है कि इस तरह के हादसों के लिए केवल बिजली घर के जमीनी कर्मचारियों को सूली पर नहीं चढ़ाया जा सकता। असली जवाबदेही ‘विद्युत सुरक्षा निदेशालय’ (Directorate of Electrical Safety) की है। नियमानुसार, किसी भी कमर्शियल या बड़ी इमारत को बिजली कनेक्शन और एनओसी (NOC) जारी करने से पहले विद्युत सुरक्षा अधिकारी की रिपोर्ट सबसे जरूरी होती है। ऐसे में यह बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है कि उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में कितने विद्युत सुरक्षा अधिकारी वास्तव में फील्ड में तैनात हैं और वे अपनी जिम्मेदारी कितनी मुस्तैदी से निभा रहे हैं?
सिस्टम को झकझोरने वाले 5 कड़े सवाल
इस दर्दनाक हादसे ने वर्तमान बिजली व्यवस्था और मॉनिटरिंग सिस्टम के सामने 5 तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं:
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क्या इस बहुमंजिला परिसर में ‘बिजली सप्लाई कोड’ के नियमों का पूरी तरह पालन किया गया था?
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जब इस परिसर का कुल लोड 20 किलोवाट (kW) से अधिक था, तो तकनीकी टीम ने समय रहते इस पर एक्शन क्यों नहीं लिया? क्या केवल जुर्माना वसूल कर अवैध लोड को खींचते रहना सही है?
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आखिर हर बार किसी मासूम की जान जाने या बड़ी दुर्घटना होने के बाद ही सरकारी सिस्टम की नींद क्यों टूटती है?
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लखनऊ में धड़ल्ले से चल रहे सैकड़ों कोचिंग सेंटरों, होटलों और अस्पतालों की सुरक्षा को लेकर बिजली विभाग अब क्या ठोस कदम उठाने जा रहा है?
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लोड सैंक्शन (Load Sanction) करने की जमीनी हकीकत क्या है? क्या राजधानी में इसके लिए कोई बड़ा चेकिंग अभियान चलाया जाएगा?
जांच के घेरे में मीटर रूम, अंदरूनी वायरिंग पर भी संशय
इस बीच ‘उत्तर प्रदेश राज्य संविदा/निविदा कर्मी संगठन’ ने भी इस तकनीकी चूक के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। संगठन के पदाधिकारियों का कहना है कि जांच में सबसे पहले यह साफ होना चाहिए कि परिसर का बिजली मीटर बिल्डिंग के अंदर लगा था या बाहर, और मीटर रूम की स्थिति क्या थी? क्योंकि मीटर में लगने वाली आग भी पल भर में विकराल रूप ले लेती है।
पावर कॉरपोरेशन के पूर्व जीएम एस. दुबे और इंजीनियरों के अनुसार, नया कनेक्शन जारी करने से पहले उपभोक्ता से ‘बी एंड एल फॉर्म’ (B&L Form) लिया जाता है, जिसे विद्युत सुरक्षा निदेशालय से मान्यता प्राप्त लाइसेंसधारी ठेकेदार ही जारी करता है। यह फॉर्म प्रमाणित करता है कि भवन के अंदर की पूरी वायरिंग, अर्थिंग और विद्युत प्रणाली सुरक्षित है। लेकिन इस केस में इन मानकों की जमकर धज्जियां उड़ाई गईं।
अभियंता संघ का फूटा गुस्सा: ‘अधिशासी अभियंता का निलंबन अन्यायपूर्ण, उन्हें बलि का बकरा बनाया’
दूसरी तरफ, इस कार्रवाई को लेकर बिजली विभाग के इंजीनियरों में भारी आक्रोश है। यूपी विद्युत अभियंता संघ के महासचिव इंजीनियर जितेन्द्र सिंह गुर्जर ने अलीगंज अग्निकांड में जानकीपुरम के अधिशाषी अभियंता के निलंबन को पूरी तरह अन्यायपूर्ण करार दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि असली दोषियों को बचाने के लिए अधिशासी अभियंता को जबरदस्ती ‘बलि का बकरा’ बनाया गया है, जबकि असली गलती उपभोक्ता और विद्युत सुरक्षा निदेशालय की है।
गुर्जर ने तकनीकी पक्ष रखते हुए कहा कि बिजली विभाग केवल मीटर या इनकमिंग केबल (Incoming Cable) में फाल्ट के लिए जिम्मेदार होता है। अगर आउटपुट केबल या परिसर के अंदर की वायरिंग में कोई फाल्ट है, तो उसकी सीधी जिम्मेदारी उपभोक्ता और एनओसी देने वाले विभाग की होती है।















