नई दिल्ली: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के हिंसक प्रदर्शन से जुड़ी याचिकाओं पर सर्वोच्च न्यायालय ने बेहद अहम टिप्पणी करते हुए बड़ा निर्देश जारी किया है। प्रधान न्यायाधीश (CJI) की अध्यक्षता वाली पीठ ने अपने पूर्व के आदेश में संशोधन करते हुए स्पष्ट किया है कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले गंभीर आरोपियों को किसी प्रकार की राहत प्रदान नहीं की जाएगी। हालांकि, छोटे-मोटे मामलों या राजनीतिक मंशा से हुए प्रदर्शनों में शामिल लोगों को बड़ी राहत देते हुए राज्यों को केस वापस लेने की पूरी स्वतंत्रता दी गई है।
गंभीर अपराध बनाम मामूली मामले: सुप्रीम कोर्ट का रुख
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि 28 जुलाई को दिए गए आदेश में ‘आपराधिक इतिहास’ शब्द का संदर्भ केवल हत्या, दुष्कर्म और POCSO जैसे जघन्य और गंभीर अपराधों से था। कोर्ट ने कहा कि दिल्ली सरकार समेत देश का कोई भी राज्य प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को स्वतः बंद करने या वापस लेने की दिशा में फैसला करने के लिए स्वतंत्र है।
मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने अदालत को आश्वस्त किया कि सरकार प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज सामान्य एफआईआर को लेकर दिए गए अपने पूर्व वचनों पर पूरी तरह कायम है। हालांकि, गंभीर अपराधों में संलिप्त लगभग 2,700 से अधिक लोगों पर दर्ज मुकदमे वापस नहीं लिए जाएंगे।
पुलिसिया कार्रवाई और पेलेट गन के इस्तेमाल पर उठे सवाल
सुनवाई के दौरान याचिककर्ता के वकीलों ने पुलिस और सुरक्षा बलों की कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े किए। वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल ने कोर्ट को बताया कि बिना वर्दी में तैनात पुलिसकर्मियों और संदिग्ध गतिविधियों में शामिल अधिकारियों की पहचान कर ली गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि कार्रवाई के दौरान असामाजिक तत्वों को भी शामिल किया गया था, जो सीधे तौर पर छात्रों और आम नागरिकों पर अत्याचार था।
वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी और वृंदा ग्रोवर ने पैलेट गन तथा लाठीचार्ज के आदेश पर जवाबदेही तय करने की मांग की। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर के बाद पहली बार दिल्ली में पैलेट गन का इस्तेमाल किस अधिकार के तहत किया गया, इस पर पुलिस आयुक्त और रैपिड एक्शन Force (RAF) के महानिदेशक को हलफनामा देना चाहिए। इस पर CJI ने सॉलिसिटर जनरल को अगले जवाब में पैलेट गन के प्रयोग पर स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश दिया।
फेशियल सर्विलांस और निजता के अधिकार पर तीखी बहस
कोर्ट रूम में वकील हरिहरन ने विरोध प्रदर्शन स्थल पर बड़े पैमाने पर की गई ‘फेशियल सर्विलांस’ (चेहरे की पहचान प्रणाली) का मुद्दा उठाया। उन्होंने दलील दी कि बिना किसी पूर्व सहमति के नागरिकों की निगरानी करना निजता के मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन है। इसके साथ ही वकील गोपाल ने डेटा सुरक्षा पर सवाल उठाते हुए पूछा कि प्रशासन द्वारा बायोमेट्रिक डेटा का इस्तेमाल किस आधार पर किया गया और इस संवेदनशील डेटा को कितने समय तक रिटेन किया जाएगा।
मामले की गंभीरता को देखते हुए सर्वोच्च अदालत ने राज्यों के मुख्य सचिवों को ऑनलाइन माध्यम से पेश होने का निर्देश दिया और सभी से विस्तृत हलफनामा मांगा है। कोर्ट ने यह भी संकेत दिए हैं कि वह एक पूर्व सीजेआई की अध्यक्षता में जांच निगरानी समिति गठित करने के विकल्प पर विचार कर रही है। अगली सुनवाई 19 अगस्त को होगी, जिसमें एसआईटी (SIT) गठन और एफआईआर वापसी की प्रगति की समीक्षा की जाएगी।














