
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनके जरिए हैदराबाद स्थित नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के छात्रों के व्यवहार को नियंत्रित करने और उनके खिलाफ कार्रवाई करने की बात कही गई थी। कोर्ट ने कहा कि BCI के पास लॉ स्टूडेंट्स के व्यवहार को रेगुलेट करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने नालसार के छात्रों के खिलाफ जारी BCI के दो नोटिफिकेशन्स को रद्द कर दिया। मामला यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत की प्रस्तावित भागीदारी के विरोध से जुड़ा था।
क्या है पूरा विवाद?
विवाद तब शुरू हुआ जब नालसार यूनिवर्सिटी के कई छात्रों ने दीक्षांत समारोह में CJI सूर्य कांत को मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाए जाने के फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की। छात्रों ने अलग-अलग बैचों की ओर से कम से कम छह बार अपनी बात रखी। पहली बार 23 जुलाई को इस मुद्दे को उठाया गया था।
छात्रों ने 20 जुलाई को संसद तक मार्च करने वाले प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित पुलिस ज्यादती से जुड़ी सुनवाई के दौरान CJI सूर्य कांत की कुछ टिप्पणियों का भी हवाला दिया। छात्रों का तर्क था कि CJI को दीक्षांत समारोह में आमंत्रित करना यूनिवर्सिटी की संवैधानिक अधिकारों, न्याय तक पहुंच और शिकायतों पर तर्कपूर्ण तरीके से ध्यान देने की प्रतिबद्धता के खिलाफ है।
एक शिकायत में CJI की उस कथित प्रतिक्रिया का भी उल्लेख किया गया, जो उन्होंने पुलिस कार्रवाई के वीडियो दिखाने के प्रस्ताव पर दी थी। इसमें कहा गया कि उन्होंने कहा था, “हमें वीडियो में कोई दिलचस्पी नहीं है। हमारे पास उन्हें देखने का समय नहीं है।” शिकायत में वकील से कही गई उनकी कथित टिप्पणी, “हमारा समय बर्बाद न करें और अपना समय भी बर्बाद न करें”, का भी जिक्र किया गया।
छात्रों ने कहा- विरोध न्यायिक पद के खिलाफ नहीं
छात्रों का कहना था कि उनका विरोध CJI के पद के प्रति अनादर के कारण नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों के आधार पर था। स्टूडेंट बार काउंसिल के सदस्य रहे एक छात्र ने कहा, “हम सीजेआई के पद का सम्मान करते हैं लेकिन हमें संविधान और संवैधानिक मूल्यों के बारे में सिखाया गया है और हम ऐसी किसी चीज का समर्थन नहीं करना चाहते जो उन मूल्यों के खिलाफ हो।”
इसके बाद विवाद और बढ़ गया, जब BCI के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने राज्य बार काउंसिलों को निर्देश दिया कि अगले आदेश तक नालसार के 2026 बैच के लॉ ग्रेजुएट्स को वकील के तौर पर एनरोल न किया जाए।
BCI ने छात्रों की पहचान के लिए मांगी रिपोर्ट
BCI ने नालसार यूनिवर्सिटी से उन छात्रों की पहचान करने के लिए रिपोर्ट भी मांगी, जिन्होंने कथित तौर पर दीक्षांत समारोह में CJI सूर्य कांत की भागीदारी के खिलाफ अभियान शुरू किया, आयोजित किया या उसे आगे बढ़ाया।
काउंसिल के शुरुआती संदेश में कहा गया था कि अगले आदेश तक नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ से 2026 में लॉ की डिग्री हासिल करने वाले किसी भी छात्र को किसी राज्य बार काउंसिल में वकील के तौर पर एनरोल नहीं किया जाएगा।
BCI ने यह भी कहा था कि जिस लॉ छात्र में देश के सर्वोच्च न्यायिक पद के प्रति सम्मान या आदर नहीं है, उससे जिम्मेदार वकील, शिक्षक या जज बनने की उम्मीद नहीं की जा सकती। काउंसिल ने ऐसे व्यवहार को कानूनी पेशे की गरिमा, अनुशासन और नैतिक मानकों के खिलाफ बताया था।
आदेश की हुई आलोचना
BCI के इस कदम की कानूनी बिरादरी के कुछ वर्गों ने आलोचना की। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष विकास सिंह ने इसे मनमाना, गैर-कानूनी और जरूरत से ज्यादा कठोर बताया। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह CJI को दीक्षांत समारोह में बुलाए जाने के खिलाफ छात्रों के विरोध का समर्थन नहीं करते हैं।
BCI ने यह भी आरोप लगाया था कि नालसार के कुछ एकेडमिक स्टाफ सदस्य छात्रों को गुमराह करने, उकसाने और गलत रास्ते पर ले जाने में शामिल थे।
कुछ घंटों में BCI ने वापस लिया था निर्देश
आलोचना के बीच BCI ने कुछ ही घंटों में अपने मूल निर्देश को वापस ले लिया। संशोधित संदेश में BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने कहा कि काउंसिल ने पहले के पत्र पर पूरी तरह चर्चा और विचार-विमर्श किया और इसके बाद अपने निर्देश में बदलाव किया।
उन्होंने कहा कि नालसार से 2026 में ग्रेजुएट होने वाले छात्रों में से ज्यादातर “निर्दोष” थे और वे कथित अनादर वाले कदम में शामिल होने के इच्छुक नहीं थे। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा था कि कुछ भरोसेमंद सूत्रों से पता चला कि कुछ शिक्षकों और बाहरी लोगों ने मासूम छात्रों को उकसाने में अहम भूमिका निभाई थी।
संशोधित फैसले के बाद 2026 बैच के लॉ ग्रेजुएट्स को एनरोलमेंट की अनुमति दी गई थी, जबकि BCI ने नालसार से जांच रिपोर्ट मिलने का इंतजार करने की बात कही थी।
अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा BCI के दोनों नोटिफिकेशन्स को रद्द किए जाने से इस विवाद में एक महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ आ गया है।












