
रियाद/सना। मध्य पूर्व (Middle East) में तनाव एक बार फिर अपने चरम पर पहुंच गया है। यमन के हूती विद्रोही (Ansar Allah) और सऊदी अरब के बीच सैन्य संघर्ष और सीमावर्ती गतिरोध तेजी से गहराता जा रहा है। यमन और सऊदी अरब के बीच लगभग 1450 किलोमीटर लंबी रणनीतिक भूमि सीमा साझा होती है। हूती विद्रोहियों के पास सऊदी अरब के दक्षिणी प्रांतों से सटी सीमा पर मजबूत पकड़ है, जिससे दोनों पक्षों के बीच दूरी लगभग ‘शून्य’ के बराबर रह गई है और सीधा सैन्य टकराव बना हुआ है।
सऊदी सीमा पर शून्य दूरी: जजान और नजरान में बढ़े हमले यमन का उत्तरी सादा प्रांत सऊदी अरब के जजान और नजरान प्रांतों से पूरी तरह सटा हुआ है। इस भौगोलिक निकटता का फायदा उठाकर हूती विद्रोही सीमा पार आसानी से शॉर्ट-रेंज रॉकेट और तोपखाने से हमले करते रहे हैं। इसके साथ ही, वे लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों और सुसाइड ड्रोन से सऊदी अरब के अंदर स्थित सैन्य अड्डों और नागरिक बस्तियों को निशाना बना रहे हैं।

सऊदी अरब के दक्षिणी क्षेत्रों जैसे शरूराह सैन्य अड्डे, अल-तव्वाल, अभा और खामिस मुशैत में हुए हमलों में इमारतों को नुकसान पहुंचा है और कई नागरिक घायल हुए हैं। हालांकि सऊदी एयर डिफेंस सिस्टम कई मिसाइलों को हवा में ही नष्ट कर देता है, लेकिन लगातार हो रहे हमलों ने सीमावर्ती इलाकों में दहशत पैदा कर दी है।
लाल सागर और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य पर कब्जा सऊदी अरब के लिए सबसे बड़ी चिंता केवल भूमि सीमा नहीं, बल्कि लाल सागर (Red Sea) तट पर हूतियों की मजबूत होती पकड़ है। हूतियों ने रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण मोखा बंदरगाह, धुबाब शहर और पेरिम द्वीप (मयून) पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया है।
बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के केंद्र में स्थित पेरिम द्वीप विश्व के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। सऊदी अरब फारस की खाड़ी में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) के जोखिमों से बचने के लिए यानबू बंदरगाह के रास्ते लाल सागर से अपने कच्चे तेल का निर्यात बढ़ा रहा था। अब बाब अल-मंदेब पर हूतियों के सीधे प्रभाव से सऊदी टैंकरों और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति शृंखला पर गंभीर खतरा मंडराने लगा है।
सऊदी अरब के सामने उभरीं ये 4 बड़ी चुनौतियां हूती विद्रोहियों की आक्रामकता ने सऊदी अरब के रक्षा और आर्थिक रणनीतिकारों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं:
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सीधे सीमा पार हमले: ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल हमलों से दक्षिणी शहरों में आम नागरिकों और रणनीतिक ढांचों की सुरक्षा खतरे में पड़ गई है।
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समुद्री मार्ग और तेल निर्यात पर खतरा: रेड सी ब्लॉक करने की धमकियों और जहाजों पर संभावित हमलों से सऊदी के एशिया और यूरोप जाने वाले तेल निर्यात में गिरावट का खतरा उत्पन्न हो गया है।
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क्षेत्रीय तनाव व ईरान का समर्थन: ईरान समर्थित समूह होने के कारण मध्य पूर्व के व्यापक संघर्ष का असर यमन तक पहुंच रहा है, जिससे 2022 का युद्धविराम पूरी तरह बेअसर साबित हो रहा है।
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सटीक हथियार क्षमता में सुधार: हूतियों के पास अब अधिक दूरी तक मार करने वाले और आधुनिक जीपीएस-गाइडेड ड्रोन व मिसाइलें मौजूद हैं।
यमन के भीतर छिड़ी जंग और आर्थिक असर यमन के आंतरिक मोर्चों जैसे ताइज, मारेब और अल-जौफ में भी सऊदी समर्थित सरकारी सेना और हूतियों के बीच भीषण जंग जारी है। लाल सागर तट पर हूतियों के हालिया कब्जे ने युद्ध का पलड़ा उनकी तरफ झुका दिया है।
इस बहुआयामी खतरे के कारण दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातक देश सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है। यदि लाल सागर का जलमार्ग बाधित होता है, तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ा उछाल आ सकता है। जिबूती में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डा भी पेरिम द्वीप से महज 30-32 किलोमीटर की दूरी पर है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सुरक्षा चिंताएं गहरा गई हैं। सऊदी अरब फिलहाल कूटनीतिक और सैन्य दोनों विकल्पों पर काम कर रहा है, लेकिन हूतियों की सीमा और समुद्र पर मौजूदगी ने रियाद की चुनौतियों को दोगुना कर दिया है।















