मालाड SRA बिल्डर घोटाला: ₹2 करोड़ की धोखाधड़ी और महिलाओं पर बर्बर हमले ने पकड़ा तूल, कानूनी घेरे में शाह हाउसकॉन के प्रमोटर

मालाड-ईस्ट SRA बिल्डर घोटाला अब ₹2 करोड़ से अधिक मूल राशि की वित्तीय धोखाधड़ी, दो महिलाओं पर बर्बर हमले और तीन जुड़ी हुई FIR शिकायतों में जाँच संबंधी चूकों से एक सनसनीखेज मिश्रण में बदल गया है, जो अब कानूनी विशेषज्ञों की नज़र में है। इस विवाद के केंद्र में मालाड स्थित शाह हाउसकॉन प्राइवेट लिमिटेड (SHPL) कंपनी के प्रमोटर – रामजी हरखचंद शाह , पंकज नानजी गडा, मनसुख हरखचंद शाह, आकाश मनसुख शाह, हिरेन प्रेमजी सावला, गौरव पदमशी खिरानी (एक ही परिवार के सदस्य), और उनका प्रतिनिधि उमेश दामजी देढीया शामिल है, जिनके वकीलों ने अग्रिम ज़मानत और बार-बारअंतरिम राहत हासिल की है, जबकि आरोपियों पर जाँच में सहयोग ना करने का आरोप है।

*यह मामला FIR नं. 307/2020 दिंडोशी पुलिस थाने से शुरू हुआ, जो डॉ. रचना डी फाडिया के द्वारा उनपर और उनकी माँ श्रीमती सुरेखा फाडिया को गाली गलौज करके शारीरिक चोट पहुंचाने की वजह से दर्ज की गई थी। उनका आरोप है कि 27 जून, 2020 को SHPL कार्यालय में इन दो महिलाओं को बुलाकर हिसाब करने के बजाय गाली-गलौज, धमकिया, लज्जा भंग और शारीरिक हमले का सामना करना पड़ा जिसमें उनका जमाई पंकज गडा, भतीजा दीपेश धनजी शाह और उनके कार्यालय के स्टाफ भी मिले हुए थे। रामजी हरखचंद शाह ने दो दिन पहले यानी 25 जून 2020 को डॉ फड़ीया के पिताजी को कॉल करके हिसाब मांगने पर जान की धमकी दी और उसी धमकी के अनुसार 27जून 2020 को अपने SHPL ऑफिस में बुलाकर इन दो महिलाओं पर अत्याचार किया जिससे वरिष्ठ नागरिक श्रीमती सुरेखा फाडिया को फ्रैक्चर हुआ और डॉ. रचना फाडिया को गहरा, खून बहता मौखिक घाव और कई चोटें आईं। FIR 307/2020 में एक प्रतिनिधि-सह-रिश्तेदार दीपेश धनजी शाह विदेश प्रस्थान कर चुका है और कभी जाँच में शामिल नहीं हुआ।

इससे भी अधिक परेशान करने वाला है मेडिकल रिकॉर्ड को लेकर विवाद। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि नगरपालिका अस्पताल की चोट रिपोर्टों को बार-बार बदला गया जबकि मूल OPD कागज़ों पर एक ही क्लिनिकल निष्कर्ष दर्ज थे। यह एक मेडिकल प्रोफेशनल द्वारा जारी सबूतों पर आधारित मामले में सबूतों की सत्यनिष्ठा पर सवाल उठाता है।

इसी FIR से जुड़ी दूसरी FIR दिंडोशी पुलिस थाने में दर्ज हुई – FIR 789 of 2021 में इस परिवार का आरोप है कि 2011 में उसी SHPL बिल्डर ने इस परिवार के पुराने दो फ्लैट्स बिकवाकर मिली हुई रकम में से लगभग ₹1.57 करोड़ रुपए अपनी कंपनी SHPL में जमा करवा लिए थे जिसके बदले में बिल्डर ने अपने नए प्रोजेक्ट में तीन नए फ्लैट, 6 कार पार्किंग और नियमित ब्याज का वादा किया था। लेकिन तीन फ्लैट में से उन्होंने 2017 में केवल एक फ्लैट रजिस्टर किया, वह भी खातों में हेराफेरी और बनावटी कागजाद के साथ नब्बे लाख रुपए का बकाया बताकर, जबकि अन्य फ्लैट तीसरे पक्ष को बेच दिए गए और ब्याज का भुगतान कभी नहीं हुआ।

FIR ७८९/२०२१ में अब सबूतों के आधार पर भारतीय दंड संहिता की धारा ४१७, ४२३, १२०बी,४६४, ४६५, ४६७, ४६८, ४७१, ४७७अ, महाराष्ट्र प्रोटेक्शन ऑफ इंटररेस्ट ऑफ डिपॉजिटर्स एक्ट 1999 की धारा 3 और 4, महाराष्ट्र ऑनरशिप फ्लैट्स एक्ट की धारा 3, 4, 5, 8, 13, 14 अधिक लगाई गई है परन्तु फिर भी इन बिल्डर्स की अग्रिम ज़मानत और अंतरिम राहत को जारी रखा जा रहा है। इन सभी FIR की चार्जशीट लगभग पांच से छह साल बाद भी प्रलंबित है। इतने गंभीर आरोपों के बावजूद, वही आरोपी बिल्डर और उनके प्रतिनिधि ज़मानत और अंतरिम सुरक्षा हासिल करते रहते हैं। शिकायतकर्ताओं का यह भी आरोप है कि बॉम्बे हाई कोर्ट में उन्हें सुनवाई से वंचित किया गया, जहाँ अभियोक्ता पक्ष ने मौखिक रूप से जज साहब को बताया कि वित्तीय धोखाधड़ी की FIR ७८९ /२०२१ में डॉ. रचना डी फाडिया “पीड़िता नहीं” हैं, हालाँकि उस FIR के मूल शिकायतकर्ता, उनके भाई के बयान में डॉ रचना फड़ीया का नाम पीड़ितो में दर्ज है—यह रुख माननीय सर्वोच्च न्यायालय के जगजीत सिंह बनाम आशीष मिश्रा मामले में पीड़ित की भागीदारी पर दिए गए निर्णय के विपरीत है।*

यह मामला अब इस बात की परीक्षा बन गया है कि देश का कानून इस बिल्डर की धोखाधड़ी, सबूतों से छेड़छाड़ और महिलाओं के खिलाफ अपराधों को कैसे संभालती है।

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