मिशन-2022 : जनता की च्वाइश बनने को शुरू हुई जोरआजमाइश


विस उपचुनाव में पहले ही मुंह की खा चुका है विपक्ष
-एमएलसी चुनाव के नतीजों ने बढ़ाई विपक्ष की धुकधुकी
-सपा-बसपा समेत कांग्रेस को भी गठबंधन की दरकार
-छुटभैय्ये दलों ने मिलकर बनाया भागीदारी संकल्प मोर्चा

योगेश श्रीवास्तव
लखनऊ। यूपी एसेम्बली के चुनाव में भले अभी एक साल का समय बाकी हो लेकिन सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी समेत विपक्ष के सारे दलों ने गठबंधन और जोड़तोड़ को लेकर अपने रणनीति बनानी शुरू कर दी है। भाजपा छोड़ मुख्यविपक्षी दल समाजवादी पार्टी के अलावा बसपा और हाशिए पर पड़ी कांग्रेस भी बड़ी ताकत बनने के लिए अकेले दम के बजाए ताकतवार साथी की बांट जोह रही है। सपा-बसपा कांग्रेस ये तीनो ही दल अतीत में गठबंधन कर चुके है। यह तीनो ही दल किसी के लिए अछूते नहीं है। इस बार समाजवादी पार्टी ऐसा कुछ करना चाहती है कि वह चुनाव में बहुमत का जादुई आंकड़ा पार कर ले। २०१७ के चुनाव में भाजपा ने अपना दल के अलावा भासपा से तालमेल कर ३२५ सीटे हासिल की थी जिसमे ३१२ सीटे अकेले भारतीय जनता पार्टी की थी। यदि इस बार सपा बसपा या कांग्रेस सरीखे दल छुटभैय्ये दलों को साथ चुनाव मैदान में जाते है तो यह कोई नया प्रयोग नहीं होगा।

इससे पहले २०१७ के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अपना राजनीतिक वनवास खत्म करने के लिए अनुप्रिया पटेल की अपना दल (एस) और ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के साथ गठबंधन का प्रयोग किया था । बीजेपी ने 2017 के विधानसभा चुनाव में सुभासपा को 8 और अपना दल को 11 सीटें दीं जबकि खुद 384 सीटों पर मैदान में लड़ी थी। बीजेपी को 312 राजभर को 4 और अपना दल (एस) को 9 सीटों पर जीत मिली थी। हालांकि सरकार के गठन के कुछ समय बाद ही भासपा ने भाजपा गठबंधन से किनारा किया और इस समय वह विधानसभा में विपक्ष की भूमिका में है। सपा और कांग्रेस भले चुनावों को लेकर कोई रणनीति न बना सके हो लेकिन भासपा ने पांच छोटे दलों ने बड़े दलों के साथ जाने के बजाय आपस में ही हाथ मिलाकर चुनावी मैदान में उतरने का फैसला कर लिया है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर के नेतृत्व में बाबू सिंह कुशवाहा की जनाधिकार पार्टी, अनिल सिंह चौहान की जनता क्रांति पार्टी, बाबू राम पाल की राष्ट्र उदय पार्टी और प्रेमचंद्र प्रजापति की राष्ट्रीय उपेक्षित समाज पार्टी ने भागीदारी संकल्प मोर्चा के नाम से नया गठबंधन तैयार किया है। इस प्रकार यह यूपी की पिछड़ी जातियों के नेताओं का एक नया गठबंधन बना है। ओम प्रकाश राजभर ने पिछले दिनों इस गठबंधन का ऐलान किया है और उन्होंने कहा कि जिस पार्टी के समाज की जहां भागीदारी होगी।

वहां पर वो पार्टी चुनावी मैदान में किस्मत आजमाएगी। प्रदेश में मुख्यविपक्षी दल समाजवादी पार्टी ने लोकसभा २०१९ के चुनाव में भले बसपा से तालमेल किया हो लेकिन इस बार विधानसभा चुनाव में वह छुटभैय्येदलों को साथ लेकर अपनी चुनाव वैतरणी पार करना चाह रही है जिसमें कुछ मुस्लिम संगठन भी शामिल हो सकते है। समाजवादी पार्टी इस बार सरकार बनाने के लिए कोई चूक नहीं करना चाहती। विधानसभा चुनाव में इस बार समाजवादी पार्टी चौ.अजित सिंह के नेतृत्ववाले राष्टï्रीय लोकदल और सुनील सिंह के नेतृत्व वाले लोकदल सहित समाजवादी विचारधारा वाले भाजपा विरोधी दलों का नेतृत्व दलों को साथ लेकर चुनाव मैंदान मे उतर सकते है। इस तरह के कई दल पूर्व में सपा के साथ रह चुके है।

पूर्व जनवादी पार्टी और महान दल जैसे कई छुटभैय्येदल सपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ चुके है लेकिन इनमें से किसी को सफलता नहीं मिली थी। इस बार के चुनाव में सपा के प्रसपा के साथ मिलकर चुनाव लडऩें की संभावानाओं से राजनीतिक प्रेक्षकों को इंकार नहीं है। जिस तरह लोकसभा चुनाव में सपा बसपा में एका दिखा था उसके बाद से यह उम्मीद की जा रही थी कि यह दोंनो विधानसभा चुनाव भी साथ मिलकर लड़ेगे। ऐसा नहीं हुआ। मायावती ने गठबंधन टूटने का ठीकरा सपा के सिर फोड़ दिया। लोकसभा और विधानसभा चुनाव में बुरी तरह शिकस्त खाने के बाद अब कांग्रेस ऐसे दलों को साथ लेने की फिराक में है जो भाजपा को सत्ता से दूर रखने के उसके मंसूबे को पूरा करने में निर्णायक भूमिका निभा सके। इस बावत कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने कहा कि हमारी कोशिश पार्टी संगठन को ग्राम स्तर पर मजबूत करने की है। जिसे इसी महीने पूरा कर लिया जाएगा। इसके बाद गठबंधन को लेकर कोई बात करेंगे। नेतृत्व की कोशिश जरूर है कि सूबे के जो भी छोटे दल हैं। उन्हें साथ लेकर चलें। कांग्रेस पहले भी छोटे दलों को साथ लेकर चलने के पक्ष में रही है।

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