राजद्रोह : कानून में बड़े बदलाव की जरूरत ?

हाल ही में राजद्रोह के बड़े मामलों में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने दंडात्मक कार्रवाई करने से रोकते हुए कहा कि राजद्रोह से सम्बंधित आईपीसी की धारा 124 ए की व्याख्या करने के ज़रुरत है | इनमे से एक मामला तेलुगू न्यूज़ चैनलों- टीवी 5 और एबीएन चैनल से सम्बंधित था जबकि दूसरा मामला पत्रकार विनोद दुआ को लेकर था | पत्रकार विनोद दुआ के मामले में माननीय सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस यू.यू. ललित और जस्टिस विनीत सरन की बेंच ने साल 1962 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि हर पत्रकार को ऐसे आरोपों से संरक्षण मिला हुआ है | वर्ष 1978 से प्रेस स्वतंत्रता की रक्षा और समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के संपादकीय नेतृत्व के मानकों को बढ़ाने के दोहरे उद्देश्यों के लिए स्थापित संस्था एडिटर्स गिल्ड ने इस निर्णय का स्वागत किया है | आप अक्सर ऐसे मामलों में कई राज्य सरकारों और केंद्र सरकार द्वारा कार्यवाही की खबर सुनते रहते है | ऐसे में हम सभी के विचार में यह आना स्वाभाविक है की इसकी जमीनी वास्तविकता क्या है ? कुछ भी इसके बारे में कहने के पहले एक बात आपको जरुर बता दे की राजद्रोह के लिए 1859 तक देश में कोई कानून नहीं था यह कानून 1860 में बनाया गया था | जिसे 1870 में आईपीसी में शामिल कर लिया गया | इस कानून को थॉमस मैकाले ने तैयार किया था | इन्हें कई लोग भारतीय दंड संहिता के जनक भी कहते है | अंग्रेजों ने यह कानून ब्रिटिश शासन का विरोध करने वाली जनता के लिए बनाया था जिससे ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विद्रोह को कुचला जाए और विद्रोहियों को तुरंत जेल में डाल दिया जाए | इस कानून के तहत किसी को गिरफ्तार करने के लिए वारंट की जरूरत नहीं पड़ती है |

भारतीय कानून संहिता (आईपीसी) की धारा 124A में राजद्रोह की दी हुई परिभाषा के मुताबिक – अगर कोई भी व्यक्ति सरकार विरोधी सामग्री लिखता या बोलता है या फिर ऐसी सामग्री का समर्थन करता है, या राष्ट्रीय चिन्हों का अपमान करने के साथ संविधान को नीचा दिखाने की कोशिश करता है, तो उसे आजीवन कारावास या तीन साल की सजा हो सकती है | इसमें जुर्माने का भी प्रावधान है साथ ही राजद्रोह के मुकदमे में आरोपी को अपना पासपोर्ट भी सरेंडर करना पड़ता है | ऐसा व्यक्ति किसी तरह की सरकारी नौकरी नहीं कर सकता है | इस कानून का प्रयोग करते हुए 1922 में ब्रिटिश सरकार ने महात्मा गांधी पर राजद्रोह का केस दर्ज किया था | महात्मा गांधी जी यंग इंडिया अखबार में सरकार के खिलाफ लिखा करते थे | ब्रिटिश सरकार को यह नापसंद था | इस कानून के तहत अब तक अनेकों लोगों के खिलाफ केस दर्ज किये गए है | केंद्र में वर्तमान सरकार हो या फिर पूर्व की सरकार केस दर्ज करने में कोई पीछे नहीं रहा है | केंद्र की यूपीए सरकार में वर्ष 2010 से 2014 के अंतिम चार वर्षो में राजद्रोह के कुल 279 मामले दर्ज किये गए थे जबकि एनडीए सरकार के 2014 से 2020 की अवधि में 519 केस दर्ज हुए है | आम जनता इस बात को तभी जान पाती है जबकि ऐसे मामले मीडिया की सुर्ख़ियों में आते है |

बात सिर्फ इतनी ही नहीं है बल्कि यदि हम अपने इतिहास को टटोले तो पायेगे की उस समय के राजा – महाराजा भी कई लोगों पर राजद्रोह का आरोप लगाकर कठिन कार्यवाही करते थे | इसके पीछे कई कारणों में से मुख्य कारण सरकार/सत्ता/शासन को अस्थिर होने का भय भी रहता था | इस कानून में कई विरोधाभास भी है मसलन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) एक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है जबकि राजद्रोह और अभिव्यक्ति की आजादी में बारीक़ रेखा जैसा अंतर है जिसे समझना कई लोगो के लिए मुश्किल कार्य है | कई मामलों में यह देखा गया है की सरकारें अपनी कमियों को छुपाने के लिए भी राजद्रोह का मुकदमा लोगों पर दर्ज कराती है | विगत के दो दशकों से अब यह प्रचलन अधिक बढ़ गया है की यदि आप मेरे साथ नहीं है तो आप विरोध में है या यूँ कहे की अब विरोध के लिए कोई स्थान नहीं बचा है | सरकारें अपनी आलोचनाओं की बातों को सुनना पसंद नहीं करती जबकि इनके जरिये अपनी कमियों का न केवल मूल्यांकन किया जा सकता है बल्कि सशक्त नीति नियमों का निर्धारण भी किया जा सकता है | सरकारें राजद्रोह का प्रयोग कर आलोचनाओं को बंद करने का भी प्रयास करती रही है |

इतिहास इस बात का स्पष्ट गवाह है की जिस भी शासक ने अपने हितों को कठोरता से लागू करने का प्रयास किया, उसके विरोध में प्रतिक्रिया भी उतनी ही तीव्र हुई है | जबकि आलोचनाओं को सुनने और समझने वाली सरकारों में परिस्थिति नियंत्रण में रही है | वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने यह घोषणा की थी की सरकार बनने पर इस कानून को वापस लेंगे | अब समय आ गया है की अंग्रेजों द्वारा स्थापित भारतीय दंड सहित को वर्तमान परिवेश के अनुरूप परिवर्तन किया जाये | राजद्रोह और देशद्रोह में अंतर को भी स्पष्ट रूप से उल्लेखित किया जाए | आपको जानकर यह हैरानी जरुर होगी की जिस कानून को भारत में ब्रिटिश सरकार ने बनाया था, उसे वो लोग खुद ब्रिटेन से हटा चुके हैं लेकिन भारत में यह आज भी चल रहा है | राजद्रोह का कानून अंग्रेजों के जमाने में बनाया गया कानून है, इस पर वक्त-वक्त पर बड़ी बहस होती रही है | कई बार इस कानून को लेकर सवाल उठाए गए हैं | पर यह एक मात्र विवादित विषय नहीं है बल्कि आपको जानकर आश्चर्य होगा की वर्ष 1860 का IPC आजतक चल रहा है | 1861 का पुलिस ऐक्ट बदला नहीं गया | वर्ष 1872 का एविडेंस ऐक्ट भी चल रहा है | टैक्स रिफार्म – इलेक्शन रिफार्म अब तक नहीं किया गया | पुलिस रिफार्म – जुडिशियल रिफार्म भी नहीं किया गया | भ्रष्टाचार विरोधी कानून घटिया और कमजोर है | नार्को पॉलीग्राफ ब्रेनमैपिंग कानून बनाया नहीं गया | अब बड़े परिप्रेक्ष में यह आवश्यक है की देश और नागरिकों के हितों की रक्षा के लिए इन सभी विषयों पर कार्य कर के सरकार बड़ा बदलाव लाये | जिससे देश की एकता, अखंडता बनी रहें और आम जन के हितों की भी रक्षा बड़े पैमाने पर हो सकें |

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