संतों के चरणों में लौट रहा युवा मन, जाग रही सनातन की अमर चेतना : शान्तनु शुक्ला

आज का समय परिवर्तन का समय है। एक ओर आधुनिकता, तकनीक और तेज़ रफ्तार जिंदगी है, तो दूसरी ओर आज का युवा अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और अपनी आध्यात्मिक पहचान को तलाश रहा है। यही बदलती तस्वीर सनातन के लिए एक नई आशा का संकेत है।

आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरि जी महाराज के अंतरराष्ट्रीय मीडिया प्रभारी शान्तनु शुक्ला ने कहा कि मौजूदा समय में संत समाज सनातन संस्कृति का सबसे बड़ा ध्वजवाहक बनकर सामने आया है। संतों ने सदियों से अपनी तपस्या, त्याग और साधना के माध्यम से सनातन की ज्योति को जलाए रखा है। आज वही ज्योति नई पीढ़ी के भीतर संस्कार, आस्था और आत्मविश्वास का प्रकाश पैदा कर रही है।

उन्होंने कहा कि आज का युवा केवल आधुनिक जीवन जीना नहीं चाहता, बल्कि वह यह भी जानना चाहता है कि वह कौन है, उसकी जड़ें कहां हैं और उसकी संस्कृति उसे क्या देती है। यही कारण है कि युवा बड़ी संख्या में संतों के सान्निध्य में पहुंच रहा है, उनसे संवाद कर रहा है और साधना की शक्ति को समझने का प्रयास कर रहा है।

शान्तनु शुक्ला ने कहा कि आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरि जी महाराज इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। उनकी साधना, तपस्या, रुद्राभिषेक और सनातन के प्रति अटूट समर्पण ने देश-विदेश के असंख्य लोगों को प्रभावित किया है। विशेष रूप से युवा पीढ़ी उनके आध्यात्मिक जीवन और साधना से प्रेरणा लेकर सनातन से जुड़ने का प्रयास कर रही है।

उन्होंने कहा कि संत और युवा का यह संबंध केवल आस्था का संबंध नहीं है, बल्कि पीढ़ियों के बीच संस्कारों के हस्तांतरण का संबंध है। एक ओर संतों के पास हजारों वर्षों की आध्यात्मिक विरासत है और दूसरी ओर युवाओं के पास ऊर्जा, जिज्ञासा और नई सोच। जब ये दोनों शक्तियां एक साथ आती हैं, तो सनातन और अधिक सशक्त होकर सामने आता है।

उन्होंने कहा, “आज का युवा अपनी जड़ों से दूर नहीं जाना चाहता, वह अपनी जड़ों को समझकर दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना चाहता है। संत समाज उसे यही आत्मविश्वास दे रहा है कि आधुनिकता को अपनाइए, लेकिन अपनी संस्कृति को मत भूलिए।”

शान्तनु शुक्ला ने कहा कि संतों की तपस्या और युवाओं की ऊर्जा का यह संगम आने वाले भारत की नई तस्वीर लिख सकता है। संतों के चरणों से निकली सनातन की चेतना जब युवाओं के हृदय तक पहुंचती है, तो वह केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरी पीढ़ी को दिशा देती है।

उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता है कि संत समाज और युवा पीढ़ी के बीच संवाद और मजबूत हो। क्योंकि सनातन केवल अतीत की विरासत नहीं है, वह वर्तमान की चेतना और भविष्य की शक्ति भी है।

“संतों के हाथों में सनातन की मशाल है और युवाओं के कंधों पर उसे भविष्य तक पहुंचाने की जिम्मेदारी—यही भारत की सबसे बड़ी आध्यात्मिक शक्ति है।”

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