परिसीमन क्या है? निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण से जुड़ी 5 बड़ी बातें, जानें क्यों दक्षिण भारतीय राज्यों में है इसे लेकर खौफ

नई दिल्ली : देश की राजनीति में इन दिनों ‘परिसीमन’ (Delimitation) शब्द सबसे ज्यादा चर्चा में है। महिला आरक्षण कानून के लागू होने के बाद अब सबकी निगाहें इसी प्रक्रिया पर टिकी हैं। सरल शब्दों में कहें तो परिसीमन का अर्थ है— जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से तय करना। यह प्रक्रिया भारतीय लोकतंत्र के ‘एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को मजबूत करने के लिए अपनाई जाती है, ताकि हर जनप्रतिनिधि लगभग समान आबादी का प्रतिनिधित्व कर सके।

राष्ट्रपति के नोटिफिकेशन से गठित होता है शक्तिशाली आयोग

परिसीमन का कार्य एक स्वतंत्र ‘परिसीमन आयोग’ द्वारा किया जाता है, जिसका गठन राष्ट्रपति की अधिसूचना के जरिए होता है। यह आयोग कितना शक्तिशाली है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसके द्वारा लिए गए निर्णयों को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। इसका उद्देश्य राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त होकर निष्पक्ष रूप से चुनावी सीमाओं का निर्धारण करना है।

सांसदों की संख्या 543 से बढ़कर हो सकती है 850

वर्तमान में देश में लोकसभा सीटों का बंटवारा 1971 की जनगणना के आधार पर चल रहा है। पिछले 55 वर्षों में देश की जनसंख्या में लगभग 2.25 गुना की वृद्धि हुई है। इतनी बड़ी आबादी के प्रबंधन और बेहतर प्रतिनिधित्व के लिए सांसदों की संख्या को 543 से बढ़ाकर करीब 850 करने की तैयारी है। नई संसद भवन को भी इसी भविष्य की जरूरत को ध्यान में रखकर बनाया गया है, ताकि बढ़ी हुई संख्या के अनुरूप सांसदों के बैठने की व्यवस्था हो सके।

उत्तर भारत बनाम दक्षिण भारत: क्यों बढ़ रहा है विवाद?

चूंकि परिसीमन का मुख्य आधार आबादी है, इसलिए उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या में भारी बढ़ोतरी होने की संभावना है। इससे संसद में इन राज्यों का दबदबा और अधिक बढ़ जाएगा। दूसरी ओर, तमिलनाडु और केरल जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में बेहतरीन कार्य किया है। अब उन्हें डर है कि आबादी कम होने के कारण उनकी सीटों में कम बढ़ोतरी होगी, जिसे वे अपने अच्छे कार्यों की ‘सजा’ के तौर पर देख रहे हैं।

विपक्ष की आशंका और राज्यों का संतुलन

कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। उनका मानना है कि सीटों के इस नए गणित से राज्यों के बीच का राजनीतिक संतुलन बिगड़ सकता है। विपक्ष का तर्क है कि इससे उन राज्यों को सीधा चुनावी फायदा मिल सकता है जहाँ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) मजबूत स्थिति में है। इसी कारण दक्षिण भारतीय राज्य इसे अपनी आवाज को केंद्र में कमजोर करने की साजिश के रूप में देख रहे हैं।

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