नई दिल्ली। दिल्ली में प्रदर्शनकारी छात्रों पर हुए लाठीचार्ज और बहुचर्चित राष्ट्रीय पात्रता सह-प्रवेश परीक्षा (NEET) पेपर लीक का मुद्दा संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में बुरी तरह गरमा गया है। केंद्र सरकार की ओर से संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू और राज्यसभा में नेता सदन जेपी नड्डा ने स्पष्ट किया कि सरकार नीतिगत स्तर पर नीट मुद्दे पर चर्चा के लिए पूरी तरह तैयार है। इसके बावजूद विपक्षी दल लगातार नारेबाजी और विरोध दर्ज करा रहे हैं।
राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और विपक्ष के अन्य सांसदों की मांग है कि सदन के अन्य सभी सूचीबद्ध कार्यों को रोककर ‘नियम 267’ (Rule 267) के तहत तुरंत नीट धांधली और दिल्ली में छात्रों पर हुए लाठीचार्ज पर निष्पक्ष चर्चा कराई जाए।
आखिर क्या है राज्यसभा का ‘नियम 267’?
‘नियम 267’ राज्यसभा की कार्य-प्रक्रिया और कामकाज के संचालन नियमावली का एक विशेष और असाधारण प्रावधान है।
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कामकाज रोकने का अधिकार: इस नियम के तहत राज्यसभा के सभापति (या उपसभापति) की अनुमति से उस दिन की पूर्वनिर्धारित कार्यसूची के नियमों को अस्थायी रूप से निलंबित (Suspend) किया जा सकता है।
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उद्देश्य: इसका एकमात्र उद्देश्य किसी अति-महत्वपूर्ण और आपातकालीन विषय पर सदन में तुरंत और निर्बाध रूप से चर्चा कराना होता है।
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आवश्यक शर्तें: नियम को निलंबित करने के लिए सदस्यों को ठोस और उचित कारण प्रस्तुत करना होता है। साथ ही यह स्पष्ट होना चाहिए कि उस दिन की सूची में से कौन-सा नियम और कार्य निलंबित किया जा रहा है।
उपसभापति और विपक्ष के बीच तीखी बहस
सदन की कार्यवाही के दौरान उपसभापति हरिवंश ने नियम की संवैधानिक व्याख्या करते हुए कहा कि नियम 267 के तहत चर्चा बेहद ‘दुर्लभ से दुर्लभ’ (Rarest of Rare) मामलों में ही दी जा सकती है।
इस पर पलटवार करते हुए नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा, “अगर नियम 267 का इस्तेमाल दुर्लभ मामलों के लिए होता है, तो देश के भविष्य—छात्रों, बच्चों और महिलाओं को सड़कों पर घसीटना और पीटना भी एक दुर्लभ और अत्यंत गंभीर स्थिति है।” खड़गे ने यह भी मांग रखी कि निष्पक्ष चर्चा के लिए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा जरूरी है। इसके बाद डीएमके (DMK) सांसद तिरुचि शिवा ने भी इस नियम के तहत तत्काल चर्चा की वकालत की।
विपक्ष क्यों अड़ा है ‘नियम 267’ पर ही?
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सदन में दोहराया कि सरकार चर्चा से पीछे नहीं हट रही है, लेकिन चर्चा किस नियम के तहत होगी, उसकी समय-सीमा क्या होगी और तारीख क्या तय की जाएगी, यह सभी दल के नेताओं के साथ विचार-विमर्श करके तय होगा।
विपक्षी दलों को आशंका है कि सरकार किसी अन्य साधारण संसदीय नियम के तहत अल्पकालिक चर्चा कराकर इस मुद्दे की गंभीरता को हल्का करना चाहती है। विपक्ष की स्पष्ट शर्त है कि संसद में पहले पेपर लीक और लाठीचार्ज पर व्यापक चर्चा हो, उसके बाद ही कोई अन्य सरकारी कामकाज आगे बढ़ने दिया जाए।
2000 में बदला गया नियम, 2016 के बाद से एक भी नोटिस स्वीकार नहीं
नियम 267 का इतिहास बेहद दिलचस्प रहा है:
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वर्ष 2000 में संशोधन: 2000 से पहले विपक्ष अक्सर किसी भी तात्कालिक मुद्दे पर सूचीबद्ध कार्य रुकवाने के लिए इसका उपयोग करता था। 2000 में संशोधन कर इसका दायरा बेहद सीमित कर दिया गया। अब यह केवल उसी दिन की कार्यसूची में शामिल विषय से संबंधित नियमों को निलंबित करने के लिए ही इस्तेमाल हो सकता है।
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आखरी बार कब मिली मंजूरी? नवंबर 2016 में तत्कालीन उपराष्ट्रपति और सभापति मोहम्मद हामिद अंसारी के कार्यकाल के दौरान आखिरी बार ‘नियम 267’ के तहत चर्चा की मंजूरी दी गई थी। तब देश में हुए ‘नोटबंदी’ (Demonetization) के मुद्दे पर पूरी कार्यसूची को स्थगित कर दिया गया था।
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नायडू और धनखड़ का कार्यकाल: 2017 से 2022 के दौरान तत्कालीन सभापति एम. वेंकैया नायडू के कार्यकाल में इस नियम के तहत दिया गया एक भी नोटिस स्वीकार नहीं हुआ। वर्तमान सभापति जगदीप धनखड़ के कार्यकाल में भी विपक्ष द्वारा दिए गए दर्जनों नोटिस खारिज किए जा चुके हैं।













