कच्चे तेल के बाजार में भारत का बड़ा मास्टरस्ट्रोक: दो महीने पहले तक जिस देश से नहीं आ रही थी एक बूंद, वह अमेरिका-सऊदी को पछाड़ बना तीसरा सबसे बड़ा सप्लायर

नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार और कूटनीति के गलियारों से भारत के लिए एक बहुत बड़ी और राहत भरी खबर सामने आई है। केवल दो महीने पहले तक भारत जिस देश से कच्चे तेल (Crude Oil) की एक बूंद भी आयात नहीं कर रहा था, उसने मई के महीने में अमेरिका और सऊदी अरब जैसे दिग्गज तेल उत्पादक देशों को कोसों पीछे छोड़ दिया है। वह देश अब सीधे भारत को सबसे ज्यादा तेल सप्लाई करने वाले देशों की सूची में तीसरे पायदान पर आ खड़ा हुआ है। हम बात कर रहे हैं उस देश की, जो किसी समय भारत को सबसे सस्ता तेल बेचा करता था— यानी ‘वेनेजुएला’।

वेनेजुएला बना भारत का तीसरा सबसे बड़ा तेल सप्लायर

वैसे तो वेनेजुएला से भारत की तेल खरीद इस साल अप्रैल महीने से ही दोबारा शुरू हो गई थी, लेकिन मई के महीने में इस खरीद ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। इस महीने वेनेजुएला से भारत का तेल आयात हर रोज 417,000 बैरल से भी अधिक के स्तर पर पहुंच गया है। इस अभूतपूर्व उछाल के साथ ही अब वेनेजुएला केवल रूस और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बाद भारत को तेल सप्लाई करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश बन चुका है। भारत को तेल बेचने के मामले में अब उससे आगे सिर्फ रूस और यूएई ही बचे हैं।

अगले हफ्ते वेनेजुएला की राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज का भारत दौरा, बड़ी डील की उम्मीद

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण बात यह है कि अगले हफ्ते वेनेजुएला की राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज एक उच्च स्तरीय यात्रा पर भारत आ रही हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो के बयानों के अनुसार, इस रणनीतिक दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच तेल और ऊर्जा सहयोग को लेकर एक बेहद बड़ी और ऐतिहासिक डील होने की पूरी संभावना है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि वेनेजुएला की राष्ट्रपति के भारत आने और इस तेल सौदे से जुड़े तमाम बड़े अपडेट्स खुद वेनेजुएला के बजाय अमेरिका की तरफ से आ रहे हैं। आइए समझते हैं कि आखिर इसके पीछे की पूरी इनसाइड स्टोरी क्या है।

दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार, लेकिन अमेरिका की ‘ग्रीन सिग्नल’ वाली राजनीति

आपको बता दें कि वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे विशाल तेल भंडार है, जो कि 300 बिलियन बैरल से भी अधिक का है। यह भंडार कितना बड़ा है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह अमेरिका, रूस और सऊदी अरब के कुल तेल भंडार को मिला देने पर भी उससे कहीं ज्यादा बैठता है। लेकिन इस कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा इसकी टाइमिंग है।

दरअसल, इस साल की शुरुआत में वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को राजधानी काराकास से एक विशेष सैन्य अभियान के जरिए अमेरिका उठा ले गया था। अमेरिका ने वर्षों से वेनेजुएला के तेल निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लगा रखे थे, जिसकी वजह से भारत जैसे देशों ने वहां से तेल खरीदना लगभग बंद कर दिया था। लेकिन अब अचानक अमेरिका से आ रही इन खबरों के पीछे वाशिंगटन की एक सोची-समझी रणनीति है।

जानकारों का मानना है कि अमेरिका इस समय दो चीजें चाहता है: पहली— वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की सप्लाई बनी रहे ताकि तेल की कीमतें काबू में रहें, और दूसरी— भारत जैसा दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा खरीदार कच्चे तेल के लिए पूरी तरह से रूस पर निर्भर न हो जाए। यही वजह है कि अमेरिका ने वेनेजुएला पर लगे प्रतिबंधों में थोड़ी नरमी दिखाई और भारतीय रिफाइनर्स ने बिना वक्त गंवाए वहां से तेल की खरीद बढ़ा दी। चूंकि इस पूरी खरीद पर परोक्ष रूप से अमेरिकी सिस्टम की नजर और नियंत्रण है, इसीलिए इसके सारे बड़े अपडेट्स अमेरिकी मीडिया और ट्रेड ट्रैकर्स के जरिए ही बाहर आ रहे हैं।

रूस से सस्ता तेल मिलने के बावजूद वेनेजुएला क्यों है भारत की जरूरत?

भारत अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में तेल की कीमतों में मामूली सा बदलाव भी देश की अर्थव्यवस्था, महंगाई और पेट्रोल-डीजल के दामों पर सीधा असर डालता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने भारी डिस्काउंट के चलते रूस से रिकॉर्ड तोड़ तेल खरीदा। लेकिन किसी एक देश पर पूरी तरह निर्भर रहने के जोखिम को कम करने और अपनी ऊर्जा सुरक्षा को संतुलित रखने के लिए भारत लगातार नए विकल्प खोज रहा है, और वेनेजुएला इसी संतुलन की नीति का एक अहम हिस्सा है।

इसके अलावा, होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) में जारी भारी तनाव और बाधाओं के चलते बीते दो महीनों में मध्य-पूर्व (Middle-East) के देशों, विशेषकर सऊदी अरब से भारत की तेल खरीद में 40% से भी अधिक की भारी कमी आई है। ऐसे में वेनेजुएला के साथ होने वाली यह नई डील भारत को लंबे समय तक सस्ता तेल सुनिश्चित कराएगी और मध्य-पूर्व के देशों पर निर्भरता को घटाएगी।

मध्य-पूर्व से तेल सप्लाई घटने की असली वजह

अंतरराष्ट्रीय व्यापार का विश्लेषण करने वाली प्रतिष्ठित फर्म ‘केप्लर’ के आंकड़ों के मुताबिक, ईरान-इजराइल और अमेरिका के बीच छिड़े युद्ध के कारण होर्मुज स्ट्रेट के लगभग बंद होने से अप्रैल और मई में शिपमेंट का आवागमन करीब-करीब ठप हो गया। युद्ध छिड़ने से पहले फरवरी में जहां इराक से भारत को हर रोज 969,000 बैरल तेल मिल रहा था, वह मई में घटकर महज 51,000 बैरल प्रति दिन रह गया है।

ठीक इसी तरह, सऊदी अरब जो कभी भारत का तीसरा सबसे बड़ा सप्लायर था, उसकी सप्लाई भी मई में लगभग आधी होकर 340,000 बैरल प्रति दिन रह गई है, जो अप्रैल में 670,000 बैरल प्रति दिन थी। इसकी एक वजह सऊदी अरब द्वारा अपनी तेल कीमतों में की गई बेतहाशा बढ़ोतरी भी है। पेट्रोलियम मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत किसी भी भू-राजनीतिक संकट से बचने के लिए इस समय दुनिया के करीब 40 अलग-अलग देशों से कच्चे तेल की खरीद कर रहा है ताकि देश की ऊर्जा सुरक्षा को हमेशा अभेद्य रखा जा सके।

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