नेपाल-तिब्बत सीमा के पास हाल ही में आई भीषण बाढ़ ने पूरे हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते खतरे को लेकर एक बार फिर बड़ी चेतावनी जारी कर दी है। भू-वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, हिमालय में एक आपदा दूसरी नई तबाही को जन्म देती है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में ‘कैस्केडिंग डिजास्टर’ (Cascading Disaster) कहा जाता है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में होने वाली इन प्राकृतिक घटनाओं का विनाशकारी असर हिमालय से निकलने वाली नदियों के माध्यम से सैकड़ों किलोमीटर दूर स्थित मैदानी इलाकों तक पहुंच सकता है।
भूस्खलन और भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील हैं दार्जिलिंग और सिक्किम
पश्चिम बंगाल का प्रसिद्ध पहाड़ी क्षेत्र दार्जिलिंग भले ही सीधे तौर पर बड़ी ग्लेशियर झीलों के निकट न हो, लेकिन यह अत्यंत संवेदनशील भूकंपीय क्षेत्र (Seismic Zone) और भूस्खलन संभावित ढलानों के अंतर्गत आता है। विशेषज्ञों का मानना है कि मूसलाधार बारिश या भूकंप के झटकों से जब पहाड़ों के ढलान कमजोर पड़ते हैं, तो विशाल मात्रा में मलबा नदियों में गिर जाता है। इससे नदियों का स्वाभाविक प्रवाह रुक जाता है और अस्थायी प्राकृतिक बांध बन जाते हैं। जब ये बांध पानी का दबाव नहीं झेल पाते और अचानक टूटते हैं, तो निचले इलाकों में अचानक विकराल बाढ़ (Flash Flood) आ जाती है।
ग्लेशियर झील फटने (GLOF) से नेपाल से बंगाल तक महाविनाश का खतरा
हिमालयी क्षेत्रों में ‘ग्लेशियर लेक बर्स्ट’ यानी GLOF (Glacial Lake Outburst Flood) सबसे गंभीर प्राकृतिक खतरों में से एक है। अति-ऊंचाई पर स्थित ग्लेशियर झील के अचानक फटने से लाखों क्यूसेक पानी तेज गति से नीचे की ओर बहता है। इसका सबसे भयावह उदाहरण अक्टूबर 2023 में देखने को मिला था, जब उत्तरी सिक्किम की ‘साउथ ल्होनक झील’ फटने से तीस्ता नदी में भयंकर बाढ़ आ गई थी। उस आपदा की तबाही का असर सिक्किम से लेकर कलिम्पोंग और पश्चिम बंगाल के निचले इलाकों तक पड़ा था, जिसमें कई महत्वपूर्ण पुल, हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट और राष्ट्रीय राजमार्ग पूरी तरह बह गए थे।
ग्लोबल वार्मिंग और बढ़ता तापमान बना रहा स्थिति को खतरनाक
वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि के कारण हिमालयी ग्लेशियरों की संरचना तेजी से बदल रही है। तापमान बढ़ने से बर्फ पिघल रही है और परमाफ्रॉस्ट (जमी हुई जमीन) ढीली पड़ रही है। इससे पहाड़ों पर भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं और ग्लेशियर झीलों में पानी का आयतन खतरनाक स्तर तक पहुंच रहा है, जो कभी भी बड़ी तबाही का कारण बन सकता है।
आपदा प्रबंधन के लिए ‘नदी-बेसिन’ मॉडल और अर्ली वार्निंग सिस्टम जरूरी
नेपाल की इस हालिया आपदा ने यह साफ कर दिया है कि आपदा प्रबंधन की रणनीतियां केवल राज्यों या अंतरराष्ट्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं रखी जा सकतीं। पूरे हिमालयी और मैदानी इलाकों को एक एकीकृत ‘नदी-बेसिन’ (River Basin) के रूप में देखकर संयुक्त योजनाएं बनानी होंगी। विशेषज्ञों ने निम्नलिखित सुरक्षात्मक उपाय तत्काल लागू करने की सिफारिश की है:
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ग्लेशियर झीलों की मॉनिटरिंग: संवेदनशील झीलों के जलस्तर पर उपग्रह (Satellite) और सेंसर के जरिए 24 घंटे निगरानी।
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निर्माण पर कड़ा नियंत्रण: भूकंपीय और भूस्खलन संभावित ढलानों पर भारी अवसंरचनात्मक निर्माण गतिविधियों को प्रतिबंधित करना।
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अर्ली वार्निंग सिस्टम (EWS): निचले तटीय इलाकों में रीयल-टाइम अर्ली वार्निंग और सायरन सिस्टम की स्थापना करना ताकि समय रहते लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सके।















