नई दिल्ली। देश में जब भी कोई जघन्य अपराध या दिल दहला देने वाली वारदात सामने आती है, तो पीड़ित परिवार और आम जनता की ओर से एक ही मांग सबसे प्रमुखता से उठती है— ‘मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में हो।’ अब यह विशेष न्यायिक व्यवस्था एक बार फिर जबरदस्त चर्चा में है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशभर में पेपर लीक करने वाले भू-माफियाओं और दोषियों को सख्त सजा दिलाने के लिए बड़ा ऐलान किया है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर स्पष्ट किया कि पेपर लीक से जुड़े मामलों के त्वरित निस्तारण और दोषियों को कड़ा सबक सिखाने के लिए अलग से ‘फास्ट ट्रैक कोर्ट’ गठित किए जाएंगे।
क्या होते हैं फास्ट ट्रैक कोर्ट और कब हुई थी शुरुआत?
फास्ट ट्रैक कोर्ट का आसान भाषा में मतलब ऐसी अदालतों से है जो किसी गंभीर मामले में बिना किसी अनावश्यक देरी के त्वरित सुनवाई कर तय सीमा के भीतर फैसला सुनाती हैं।
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पहली शुरुआत (साल 2000): 11वें वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर देश में पहली बार फास्ट ट्रैक अदालतों की स्थापना हुई थी। इसका प्राथमिक उद्देश्य निचली और जिला अदालतों में सालों से धूल फांक रहे मुकदमों को तेजी से निपटाना था। यह व्यवस्था 2011 तक चली।
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निर्भया कांड के बाद वापसी (2013): दिल्ली के चर्चित निर्भया कांड के बाद त्वरित न्याय की जरूरत फिर महसूस हुई। दिल्ली हाईकोर्ट ने यौन उत्पीड़न के मामलों के लिए 5 विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट को मंजूरी दी। 2 जनवरी 2013 को साकेत कोर्ट परिसर में पहली एक्सक्लूसिव फास्ट ट्रैक कोर्ट शुरू की गई, जहां निर्भया केस की शुरुआती सुनवाई हुई थी।
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केंद्र का बड़ा फैसला (2019): केंद्र सरकार ने निर्भया फंड के तहत अक्टूबर 2019 में ‘फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) योजना’ लागू की। इसका मुख्य जोर बलात्कार और पॉक्सो (POCSO) एक्ट से जुड़े मामलों के त्वरित निस्तारण पर रखा गया।
फास्ट ट्रैक कोर्ट की जरूरत क्यों पड़ी?
सामान्य न्यायिक प्रक्रिया में गंभीर से गंभीर मुकदमों के फैसले आने में दशकों का वक्त लग जाता है। ऐसे में फास्ट ट्रैक कोर्ट्स की जरूरत मुख्य रूप से इन वजहों से महसूस की गई:
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अदालतों से मुकदमों का बोझ घटाना: लंबित पड़े लाखों मुकदमों की संख्या को नियंत्रित करना।
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संवेदनशील मामलों में त्वरित न्याय: बलात्कार, हत्या, और बच्चों व महिलाओं के खिलाफ हुए बर्बर अपराधों का तत्काल निपटारा।
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जनता का भरोसा बढ़ाना: समय पर न्याय दिलाकर देश की कानून व्यवस्था और न्याय प्रणाली पर आम नागरिकों का विश्वास मजबूत करना।
कितना बजट और देश में इस वक्त कितनी हैं ये अदालतें?
फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) योजना के लिए केंद्र सरकार ने ₹1,952.23 करोड़ का कुल बजट मंजूर किया था, जिसमें निर्भया फंड के तहत ₹1,207.24 करोड़ की राशि केंद्र दे रहा है और बाकी हिस्सा राज्य सरकारें वहन कर रही हैं।
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कुल अदालतें: केंद्र सरकार द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार 30 जून 2025 तक देश के 29 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में 725 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट काम कर रहे हैं।
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पॉक्सो कोर्ट: इनमें से 392 एक्सक्लूसिव पॉक्सो (POCSO) कोर्ट हैं, जो केवल बच्चों से जुड़े यौन अपराधों की सुनवाई करती हैं।
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उत्तर प्रदेश सबसे आगे: देश में सर्वाधिक 218 फास्ट ट्रैक कोर्ट उत्तर प्रदेश में संचालित हैं। इसके बाद मध्य प्रदेश में 67 और केरल में 55 कोर्ट कार्यरत हैं।
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कामकाज की रफ्तार: आम अदालतों में जहां रेप और पॉक्सो के औसतन 3.26 मामलों का निपटारा प्रति माह होता है, वहीं फास्ट ट्रैक कोर्ट्स में यह दर 9.51 मामले प्रति माह है। यानी ये अदालतें सामान्य कोर्ट से लगभग 3 गुना तेजी से न्याय दे रही हैं।
कितने प्रकार की होती हैं ये अदालतें और किन मामलों की होती है सुनवाई?
मुख्य रूप से फास्ट ट्रैक कोर्ट दो प्रकार के होते हैं:
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सामान्य फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट: ये अदालतें बलात्कार और पॉक्सो दोनों से संबंधित मुकदमों की एक साथ सुनवाई करती हैं। इनका लक्ष्य 6 महीने से 1 साल के भीतर ट्रायल पूरा करने का होता है।
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एक्सक्लूसिव पॉक्सो कोर्ट: ये विशेष तौर पर बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों के लिए आरक्षित होती हैं। यहां पीड़ित बच्चों को अदालत के माहौल से राहत दी जाती है और उनके बयान दर्ज करते समय खास एहतियात बरती जाती है।
मुख्य रूप से सुने जाने वाले मामले:
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दुष्कर्म और यौन उत्पीड़न
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बच्चों के खिलाफ यौन अपराध (POCSO)
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हत्या और महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराध
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वरिष्ठ नागरिकों से जुड़े विशिष्ट मामले
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राज्य सरकार या उच्च न्यायालय द्वारा भेजे गए विशेष/लंबित मामले
जब फास्ट ट्रैक कोर्ट ने रिकॉर्ड समय में सुनाया फैसला
फास्ट ट्रैक अदालतों ने कई मौकों पर देश के सामने नजीर पेश करते हुए कुछ ही दिनों के भीतर अपराधियों को उनके अंजाम तक पहुंचाया है:
| मामला व स्थान | अपराध का स्वरूप | फैसले का समय | सजा |
| इटारसी (मध्य प्रदेश, 2023) | मासूम भतीजी से दुष्कर्म | मात्र 21 दिन | फांसी की सजा |
| गोरखपुर (उत्तर प्रदेश, अप्रैल 2026) | 6 महीने की मासूम से दुष्कर्म | मात्र 24 दिन | आजीवन कारावास |
| नरसापुर (महाराष्ट्र, जून 2026) | 3 साल की बच्ची से रेप | मात्र 55 दिन | आजीवन कारावास |
| दिल्ली (अप्रैल 2025) | 16 साल की नाबालिग से रेप | त्वरित सुनवाई | आजीवन कारावास |
क्या फास्ट ट्रैक कोर्ट के फैसले को ऊपर चुनौती दी जा सकती है?
जी हां, बिल्कुल। फास्ट ट्रैक कोर्ट कोई अलग न्यायिक ढांचा नहीं है। इनमें वही सत्र न्यायाधीश (Session Judges) बैठते हैं जिनकी नियुक्ति हाईकोर्ट या राज्य सरकार करती है। इन अदालतों पर भी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की वही धाराएं और कानूनी नियम लागू होते हैं जो सामान्य अदालतों पर होते हैं।
इसलिए, यदि कोई पक्ष फास्ट ट्रैक कोर्ट के फैसले से संतुष्ट नहीं है, तो जिला स्तर की फास्ट ट्रैक कोर्ट के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में और हाईकोर्ट स्तर के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में नियमानुसार अपील दाखिल कर सकता है।












