समुद्र मंथन योजना: समंदर की गहराइयों से निकलेगा 60 करोड़ टन कच्चा तेल, साल 2031 तक खर्च होंगे 84 हजार करोड़ से ज्यादा

नई दिल्ली: देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और विदेशों से कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने के लिए केंद्र सरकार ने एक ऐतिहासिक और महत्वाकांक्षी योजना को हरी झंडी दे दी है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के तहत शुरू की गई इस केंद्रीय क्षेत्र की योजना का नाम ‘समुद्र मंथन’ यानी नेशनल ऑफशोर एक्सप्लोरेशन स्कीम रखा गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने 31 जुलाई 2026 को इस योजना को औपचारिक मंजूरी दी थी, जिसके तहत देश के समुद्री तटों से दूर गहरे पानी में छिपे तेल और गैस के विशाल भंडारों को बाहर निकाला जाएगा।

60 करोड़ टन ऊर्जा भंडार का है अनुमान इस योजना का मुख्य उद्देश्य समुद्र तल के नीचे छिपे लगभग 600 मिलियन मीट्रिक टन ऑयल इक्विवेलेंट यानी करीब 60 करोड़ टन कच्चे तेल के बराबर ऊर्जा भंडारों का पता लगाना है। भारत वर्तमान में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का कंज्यूमर है, जिसका सालाना आयात बिल लगभग 144 अरब डॉलर यानी करीब 13 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। पिछले एक दशक में देश की कच्चे तेल पर आयात निर्भरता 77 प्रतिशत से बढ़कर 88 प्रतिशत हो गई है, जबकि प्राकृतिक गैस की लगभग आधी जरूरत भी विदेशों से पूरी होती है। इस भारी-भरकम आयात को कम करने के लिए सरकार ने यह ठोस रोडमैप तैयार किया है।

साल 2031 तक खर्च होंगे 84 हजार करोड़ से ज्यादा योजना के पहले चरण के तहत वित्त वर्ष 2030-31 तक कुल 84,084 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का प्रावधान है। भारत के पूर्वी और पश्चिमी ऑफशोर बेसिन, जो तीन हजार मीटर तक की गहराई में फैले हैं, वहां 5,600 मिलियन मीट्रिक टन ऑयल इक्विवेलेंट से अधिक हाइड्रोकार्बन क्षमता होने की संभावना जताई गई है। हालांकि, गहरे समुद्र में ड्रिलिंग करना बेहद खर्चीला और जोखिम भरा काम माना जाता है। एक कुएं की ड्रिलिंग पर ही 125 से 150 मिलियन डॉलर तक का खर्च आता है और एक्सप्लोरेशन ब्लॉक मिलने से लेकर कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू होने में पांच से दस साल तक का समय लग जाता है। इसी वित्तीय जोखिम और चुनौतियों के चलते अब तक सरकारी और निजी कंपनियां गहरे समुद्र में उतरने से बचती रही हैं, जिसे दूर करने के लिए अब सरकार खुद इस जोखिम में साझीदार बन रही है।

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