100 रुपये किलो ग्रीन हाइड्रोजन और हवा में उड़ने वाली बस! नितिन गडकरी के इस मेगा प्लान से हिलेगी दुनिया

नई दिल्ली।   सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने देश के ट्रांसपोर्ट सिस्टम को लेकर एक ऐसा क्रांतिकारी ब्लूप्रिंट पेश किया है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया है. इथेनॉल और इलेक्ट्रिक वाहनों की सफलता के बाद अब केंद्र सरकार का सबसे बड़ा दांव ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ पर है. लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे से जुड़े एक कार्यक्रम के दौरान गडकरी ने साफ किया कि भारत बहुत जल्द स्वच्छ ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनने जा रहा है. इसके साथ ही उन्होंने देश में ‘फ्लाइंग बस’ (हवा में उड़ने वाली बस) चलाने के ड्रीम प्रोजेक्ट का भी खुलासा किया है.

आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर नितिन गडकरी का यह पूरा प्लान क्या है, हवा में उड़ने वाली बसें कैसी होंगी और कैसे यह तकनीक आम भारतीय की जिंदगी बदलने वाली है.

पानी से बनेगा ईंधन, 100 रुपये में चलेगी 450 किलोमीटर कार!

नितिन गडकरी ने ग्रीन हाइड्रोजन को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला और उम्मीद जगाने वाला आंकड़ा साझा किया है. उन्होंने बताया कि वर्तमान में देश में एक किलो ग्रीन हाइड्रोजन तैयार करने की लागत करीब 300 रुपये आती है. सरकार का लक्ष्य इस लागत को घटाकर मात्र 100 रुपये प्रति किलो पर लाना है.

सबसे खास बात यह है कि मात्र 1 किलो ग्रीन हाइड्रोजन की मदद से एक कार को लगभग 450 किलोमीटर तक चलाया जा सकेगा. यानी महज 100 रुपये के खर्च में आप दिल्ली से लखनऊ तक का सफर आसानी से तय कर सकेंगे.

मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि पानी की मदद से बनने वाली हाइड्रोजन को ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ कहा जाता है, जबकि कोयले से बनने वाली को ‘ब्लैक’ और पेट्रोलियम से बनने वाली को ‘ब्राउन’ हाइड्रोजन की श्रेणी में रखा जाता है. इसके अलावा बायोवेस्ट मीथेन से भी हाइड्रोजन बनाने की तैयारी युद्ध स्तर पर चल रही है.

सचमुच हवा में उड़ेंगी बसें? जानें क्या है ‘फ्लाइंग बस’ का पूरा सच

नितिन गडकरी के ‘फ्लाइंग बस’ वाले बयान के बाद से ही सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है कि क्या वाकई बसें आसमान में उड़ती दिखाई देंगी? तो आपको बता दें कि यह कोई पारंपरिक हवाई जहाज या पंखों वाली बस नहीं होगी.

यह असल में मास रैपिड ट्रांसपोर्ट सिस्टम (MRTS) के तहत तैयार होने वाली एक ‘एलिवेटेड केबल बस’ या ‘एरियल पॉड प्रणाली’ होगी. यह सड़क से काफी ऊंचाई पर बने खंभों और मजबूत केबल्स (तारों) के सहारे हवा में चलेगी. चूंकि इसका जमीन के ट्रैफिक से कोई लेना-देना नहीं होगा, इसलिए इसे बोलचाल की भाषा में ‘उड़ने वाली बस’ कहा जा रहा है.

फिलीपींस जैसे देशों में इस तकनीक का सफल इस्तेमाल हो रहा है और अब भारत में भी इस पर तेजी से स्टडी की जा रही है.

बिना ड्राइवर के दौड़ेगी उड़ने वाली बस, 30 सेकंड में होगी चार्ज

तकनीकी रूप से यह फ्लाइंग बस बेहद आधुनिक और सुविधाओं से लैस होगी:

  • क्षमता: इस बस में एक साथ करीब 135 यात्री सफर कर सकेंगे.

  • ऑटोमैटिक ड्राइविंग: यह पूरी तरह से ड्राइवरलेस यानी सेंसर आधारित कंट्रोल सिस्टम पर काम करेगी.

  • हाईटेक फीचर्स: सफर को आरामदायक बनाने के लिए इसमें एयर कंडीशनर, वाई-फाई और बस होस्टेस जैसी सुविधाएं मिलेंगी.

  • फ्लैश चार्जिंग: इस बस की सबसे बड़ी खूबी इसकी चार्जिंग स्पीड होगी. स्टेशन पर महज 30 सेकंड रुकने के दौरान यह इतनी चार्ज हो जाएगी कि 40 किलोमीटर का सफर आसानी से तय कर सके.

क्या है ग्रीन हाइड्रोजन और यह पर्यावरण के लिए क्यों है संजीवनी?

ग्रीन हाइड्रोजन को भविष्य का सबसे स्वच्छ ईंधन माना जा रहा है. इसे बनाने के लिए ‘इलेक्ट्रोलाइजर’ मशीन की मदद से पानी ($H_2O$) के अणुओं को तोड़ा जाता है, जिससे हाइड्रोजन और ऑक्सीजन अलग-अलग हो जाते हैं.

इस पूरी प्रक्रिया (इलेक्ट्रोलाइजेशन) को चलाने के लिए सौर ऊर्जा या पवन ऊर्जा जैसी रिन्यूएबल एनर्जी का इस्तेमाल किया जाता है. यही कारण है कि इसके उत्पादन में कार्बन का उत्सर्जन बिल्कुल शून्य (Zero Carbon Emission) होता है. आने वाले समय में इसका इस्तेमाल न सिर्फ गाड़ियों में, बल्कि स्टील, सीमेंट, हवाई जहाजों और भारी जहाजों में कोयले व डीजल के विकल्प के रूप में किया जाएगा.

19,744 करोड़ का नेशनल मिशन और 2030 का महा-लक्ष्य

भारत सरकार ने देश को ग्रीन हाइड्रोजन का ग्लोबल हब बनाने के लिए कमर कस ली है. जनवरी 2023 में शुरू किए गए ‘राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन’ के लिए सरकार ने 19,744 करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट आवंटित किया है.

2030 तक सरकार के प्रमुख लक्ष्य इस प्रकार हैं:

  • देश में हर साल कम से कम 5 मिलियन मीट्रिक टन ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन करना.

  • ग्रिड में 125 गीगावाट की अतिरिक्त रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता को जोड़ना.

  • इस पूरे मिशन से देश में 8 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश आकर्षित करना.

  • देश के युवाओं के लिए 6 लाख से ज्यादा नौकरियों के नए अवसर पैदा करना.

  • जीवाश्म ईंधन (पेट्रोल-डीजल) के आयात बिल में 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की सीधी बचत करना.

ग्राउंड जीरो पर कितनी बदली तस्वीर? हाइड्रोजन ट्रेन से लेकर ग्रीन हब तक तैयार

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत ने फरवरी 2026 तक लगभग 8,000 टन प्रति वर्ष की ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता सफलतापूर्वक हासिल कर ली है. जमीन पर काम काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है:

  • ग्रीन हाइड्रोजन हब: देश के तीन बड़े बंदरगाहों—कांडला, तूतीकोरिन और पारादीप को स्पेशल ग्रीन हाइड्रोजन हब के रूप में बदला जा रहा है.

  • हाइड्रोजन वैली क्लस्टर: कोच्चि, पुणे, भुवनेश्वर और जोधपुर में हाइड्रोजन वैली विकसित की जा रही हैं.

  • रेलवे का बड़ा कदम: भारतीय रेलवे हरियाणा के जींद-सोनीपत रूट पर देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन चलाने के प्रोजेक्ट पर तेजी से काम कर रही है.

इथेनॉल से लेकर ग्रीन हाइड्रोजन: क्यों गेम चेंजर है भारत की यह नीति?

नितिन गडकरी लंबे समय से वैकल्पिक ईंधनों की वकालत करते रहे हैं. इथेनॉल (E20) को लेकर चल रही अफवाहों को खारिज करते हुए उन्होंने साफ किया कि इथेनॉल मिश्रित ईंधन से गाड़ियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचता है.

इथेनॉल के बाद अब ग्रीन हाइड्रोजन पर फोकस शिफ्ट करना भारत की एक सोची-समझी रणनीतिक चाल है. इसका मकसद केवल प्रदूषण कम करना नहीं, बल्कि खाड़ी देशों से आने वाले महंगे कच्चे तेल पर भारत की निर्भरता को पूरी तरह खत्म करना है. अगर भारत अपने तय लक्ष्यों को हासिल कर लेता है, तो वह न सिर्फ अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी करेगा, बल्कि दुनिया भर को क्लीन एनर्जी का निर्यात करने वाला सबसे बड़ा देश बन जाएगा.

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