
पानी बचाना सबकी जिम्मेदारी, सेंटर फॉर वाटर पीस ने आयोजित की चौपाल
भास्कर सामाचार सेवा
गाजियाबाद। आध्यात्म गुरु व चिंतक प्रो. पवन सिन्हा ने कहा कि जल संरक्षण और प्रबंधन के लिए देश में गंभीर प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। हमें अपनी पुरातन संस्कृति से इस संबंध में सीख लेनी होगी कि हमारे महापुरुष, ऋषि-मुनि, राजा और प्रजा कैसे जल पर विशेष ध्यान देते थे।
प्रो. सिन्हा विश्व जल दिवस पर आयोजित चौपाल को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम जी-20 के विभिन्न आयोजनों के तहत सेंटर फॉर वाटर पीस ने आयोजित किया। प्रो. सिन्हा ने कहा कि हमारे देश में आदिकाल से ही जल संरक्षण पर पूर्ण ध्यान दिया जाता था। भगवान राम और कृष्ण के समय इसके लिए कार्ययोजनाएं थी। श्री कृष्ण ने जल व कृषि को जोड़कर बहुत बड़ा ईको सिस्टम तैयार किया था। अन्य राजा भी जल की पवित्रता पर पूरा ध्यान देते थे। महाभारत काल में पांडवों के वनवास के दौरान यक्ष के प्रश्नों का उत्तर न देने पर कैसे चार पांडव भाई जल पीते ही बेहोश हो गए थे। बाद में युधिष्ठर ने आकर यक्ष प्रश्नों का उत्तर देखकर अपने भाइयों को बचाया। इससे स्पष्ट है कि वन में भी जल प्राप्त करने के लिए कड़े नियम थे।
उन्होंने कहा कि हड़प्पा संस्कृति में भी जल संरक्षण अहम था। परंतु अब हम जल के प्रति घोर लापरवाह हो गए हैं। जल संरक्षण और स्वच्छता पर जनमानस कोई ध्यान नहीं दे रहा है। जिस तरह मानव क्रियाकलापों से नदियां व अन्य जल स्रोत्र प्रदूषित व नष्ट हो रहे हैं और भूजल का अंधाधुंध दोहन हो रहा है वह गंभीर संकट पैदा कर देगा। इसलिए सभी को जल के प्रति जागरूक होना होगा। पानी को बचाने के साथ उसकी स्वच्छता व प्रबंधन पर भी विशेष ध्यान देना होगा। यदि जनमानस सचेत नहीं हुआ तो 2050 तक भयावह स्थिति होगी और लोग पानी के लिए तरसेंगे। पानी के लिए युद्ध होने लगेंगे। विकास और शहरीकरण के लिए जल संरक्षण सामन्जस्य बनाना होगा। सरकार के साथ सभी के प्रयास होंगे तभी जल संकट पर नियंत्रण कर पाएंगे।
हिमालय बचाओ अभियान के डॉ. समीर रतूड़ी ने कहा कि हिमालय की बर्फ पीने के पानी का बड़ा स्रोत्र है। पहाड़ों पर अत्याधिक निर्माण कार्य व पेड़ों के कटान से गर्मी बढ़ी है। इससे ग्लेशियर पिघलने लगे हैं। केदारनाथ त्रासदी भी अवैध व गलत निर्माण की देन थी। अनियोजित विकास व निर्माण, नदियों पर निरंतर बनते बांध, जंगलों की आग और पेड़ों का अवैध कटान हिमालय को बर्बाद कर रहा है। जब तक आम जनमानस जागरूक नहीं होगा जल, जंगल और जमीन का संरक्षण नहीं हो पाएगा।
चेन्नई के एक्टिविस्ट डॉ. नंद गोपाल ने दक्षिण भारत की प्रदूषित हो रही नदियों की दुर्दशा को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि नदियों में सीवेज गिरने से उनका पानी पीने योग्य नहीं रहा। दक्षिण भारत की झीलें भी बर्बाद हो रही हैं। उन्होंने कहा कि जल संरक्षण के लिए स्कूली स्तर से बच्चों को तैयार किया जाए।
गंगा विचार मंच के अध्यक्ष डॉ. भरत पाठक ने कहा कि छोटी नदियों व अन्य जल स्रोत्रों को जीवित करना आवश्यक है। इस पर सरकार नीति तैयार कर रही है। जल संरक्षण के लिए सभी को अनिवार्य रूप से आगे आना होगा। जल जीवन मिशन के सजल श्रीवास्तव ने घर-घर पानी पहुंचाने की योजना पर प्रकाश डाला।
वेद विज्ञान संस्थान के शिशिर गौड़ ने ग्राउंड वाटर मैनेजमेंट के तकनीकि पहलू पर विचार व्यक्त किए। इंडिया वाटर पोर्टल के केसर सिंह ने कहा कि मानसून व समुद्र पानी के सबसे बड़े स्रोत्र हैं, लेकिन इन पर समझदारी से योजनाएं नहीं बन रही हैं। आईडीटी के डॉ. विवेक ने कहा कि कृषि में पानी का कुप्रबंधन समाप्त किया जाए।
तरुण भारत संघ के सुरेश कुमार ने जल संरक्षण के अहम मुद्दों पर प्रकाश डाला। शोधार्थी रामबाबू तिवारी ने बुंदेलखंड के जल संकट की समस्या व समाधान पर विचार व्यक्त किए। चौपाल का संचालन सेंटर फॉर वाटर पीस के सीएमडी संजय कश्यप ने किया।













