कानपुर। उत्तर प्रदेश का कानपुर अपनी जिंदादिली और अनोखे अंदाज के लिए जाना जाता है, लेकिन इस बार कानपुर बार एसोसिएशन का होली मिलन समारोह चर्चाओं के साथ-साथ विवादों के घेरे में आ गया है। 27 फरवरी 2026 को आयोजित इस कार्यक्रम का एक वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल रहा है, जिसमें काले कोट वाले वकील साहबान पूरी तरह मस्ती के मूड में नजर आ रहे हैं। कोर्ट परिसर के पास हुए इस जश्न में विदेशी बेली डांसर्स के ठुमकों और फिल्मी गानों के शोर ने न्यायपालिका की मर्यादा पर नई बहस छेड़ दी है।
जब वकीलों पर चढ़ा होली का खुमार, मंच पर थिरकीं बेली डांसर्स
वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि कानपुर बार एसोसिएशन के लॉन में अबीर-गुलाल की बौछार हो रही है। इसी बीच मंच पर सजी महफिल में विदेशी बेली डांसर्स ने अपनी परफॉर्मेंस शुरू की। जैसे ही लाउड स्पीकर पर लोकगीत ‘लूटा रे राजा…’ बजा, वहां मौजूद वकीलों का उत्साह सातवें आसमान पर पहुंच गया। वकील न केवल तालियां बजाते दिखे, बल्कि खुद भी मंच के सामने जमकर थिरके। माहौल किसी गंभीर प्रोफेशनल एसोसिएशन का नहीं, बल्कि किसी हाई-प्रोफाइल शादी समारोह जैसा नजर आ रहा था।
सोशल मीडिया पर मचा घमासान: ‘मर्यादा या मनोरंजन?’
वीडियो के वायरल होते ही इंटरनेट की दुनिया दो गुटों में बंट गई है। आलोचकों का कहना है कि वकीलों का पेशा बेहद गरिमामय होता है और कोर्ट परिसर के भीतर इस तरह के ‘फूहड़’ प्रदर्शन शोभा नहीं देते। एक यूजर ने तंज कसते हुए लिखा, “न्याय के मंदिर में यह कैसा तमाशा? क्या बार एसोसिएशन की गरिमा अब बेली डांस तक सीमित रह गई है?” वहीं, कुछ यूजर्स ने बजरंग दल और अन्य संगठनों की चुप्पी पर भी सवाल उठाए हैं।
कानपुरिया अंदाज के मुरीद भी कम नहीं
विवाद एक तरफ, लेकिन कानपुर के इस बिंदास अंदाज को पसंद करने वालों की भी कमी नहीं है। कई यूजर्स ने इसे ‘स्ट्रेस बस्टर’ करार देते हुए वकीलों का समर्थन किया है। एक यूजर ने मजेदार कमेंट करते हुए लिखा, “कानपुर वाले हैं भैया, यहां होली ऐसे ही मनाई जाती है!” समर्थकों का तर्क है कि वकील भी इंसान हैं और दिन भर अदालती कार्यवाही और कानूनी दांव-पेच के तनाव के बाद उन्हें भी जश्न मनाने का पूरा अधिकार है।
गरिमा बनाम उत्सव: क्या पार हुई लक्ष्मण रेखा?
यह पहली बार नहीं है जब किसी बार एसोसिएशन के कार्यक्रम पर सवाल उठे हों, लेकिन बेली डांस और ‘लूटा रे राजा’ जैसे गानों ने इस बार विवाद को गहरा कर दिया है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि उत्सव मनाना गलत नहीं है, लेकिन स्थान और पेशे की मर्यादा का ध्यान रखना अनिवार्य है। काले कोट की शालीनता और कोर्ट परिसर की पवित्रता को ध्यान में रखते हुए इस तरह के आयोजनों की सीमाओं पर अब नए सिरे से विचार करने की मांग उठ रही है।












