
नई दिल्ली/गाजियाबाद: दिल्ली के एम्स (AIIMS) अस्पताल की सफेद दीवारों के पीछे इस वक्त जिंदगी, मौत और कानून के बीच एक ऐसी जंग चल रही है, जिसने पत्थर दिल इंसान को भी रुला दिया है। गाजियाबाद के हरीश राणा, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (गरिमामय मृत्यु) दी जा रही है, पिछले छह दिनों से बिना अन्न और जल के जीवन की अंतिम डोर थामे हुए हैं। बाहर गलियारे में बैठी मां के हाथों में हनुमान चालीसा है और आंखों में आंसुओं का सैलाब, जो आज भी किसी दैवीय चमत्कार की प्रतीक्षा कर रही हैं।
बेबस ममता की पुकार: ‘मेरा बेटा सांस ले रहा है, उसे कैसे जाने दूं?’
एम्स के आईआरसीएच (IRCH) पैलिएटिव केयर वार्ड के बाहर का मंजर बेहद भावुक करने वाला है। हरीश की मां दिन-रात वहीं बैठकर प्रार्थना कर रही हैं। उनका गला रुंधा हुआ है और वह बस यही कहती हैं, “मेरा बेटा अभी सांस ले रहा है, उसकी धड़कनें चल रही हैं, वह मुझे छोड़कर कैसे जा सकता है?” वहीं, पिता की आंखों के आंसू सूख चुके हैं। भारी मन से उन्होंने नियति को स्वीकार तो कर लिया है, लेकिन डॉक्टरों से बस एक ही विनती कर रहे हैं— “साहब, मेरे बेटे को आखिरी पलों में दर्द नहीं होना चाहिए।”
छह दिन से बिना भोजन-पानी के संघर्ष, डॉक्टर बोले- स्थिति स्थिर
चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में यह एक दुर्लभ और कठिन समय है। डॉक्टरों की विशेष टीम सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए हरीश को दी जाने वाली लाइफ सपोर्ट प्रणालियों को चरणबद्ध तरीके से हटा रही है। पिछले एक सप्ताह से उन्हें कोई भोजन या पानी नहीं दिया गया है, फिर भी उनके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता सबको हैरान कर रही है। विशेषज्ञों की मुख्य प्राथमिकता हरीश को शारीरिक दर्द और मानसिक तनाव से मुक्त रखना है, जिसके लिए उन्हें विशेष दवाएं (Palliative Care) दी जा रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ‘गरिमामय विदाई’ की प्रक्रिया
एम्स प्रशासन ने इस संवेदनशील मामले पर कोई भी आधिकारिक बयान देने से परहेज किया है, लेकिन सूत्रों के अनुसार, पूरी प्रक्रिया कोर्ट की निगरानी में हो रही है। एम्स के पूर्व निदेशक डॉ. एमसी मिश्रा के मुताबिक, ऐसे मामलों में हर कदम फूंक-फूंक कर रखा जाता है। मरीज की स्थिति की पल-पल की रिपोर्ट तैयार की जाती है। इस प्रक्रिया को पूरा होने में 15 दिन से लेकर एक महीने तक का समय लग सकता है। फिलहाल, अस्पताल की मेडिकल टीम हरीश के माता-पिता की निरंतर काउंसलिंग भी कर रही है ताकि वे इस असहनीय दुख को सह सकें।
क्या होता है पैसिव यूथेनेशिया?
कानूनी भाषा में इसे ‘गरिमामय मौत’ का अधिकार कहा जाता है। जब कोई मरीज ऐसी स्थिति में पहुंच जाता है जहां सुधार की कोई गुंजाइश नहीं होती, तो कोर्ट की अनुमति से उसे दिए जा रहे कृत्रिम जीवन रक्षक साधनों (Ventilator, Feeding Tube आदि) को धीरे-धीरे हटा लिया जाता है। हरीश राणा के मामले में भी इसी जटिल प्रक्रिया का पालन किया जा रहा है, लेकिन एक मां का दिल विज्ञान और कानून के इन तर्कों से ऊपर सिर्फ अपने लाल की सलामती मांग रहा है।









