नई दिल्ली/पटना। जनता दल (यूनाइटेड) के भीतर मंगलवार, 24 मार्च 2026 को एक बार फिर नीतीश कुमार के निर्विवाद नेतृत्व पर मुहर लग गई। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को सर्वसम्मति से पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया है। नामांकन की समयसीमा समाप्त होने तक उनके सामने किसी अन्य नेता ने दावेदारी पेश नहीं की, जिसके बाद चुनाव अधिकारी ने उन्हें निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिया।
निर्विरोध ताजपोशी: जेडीयू में नीतीश का कोई विकल्प नहीं
पार्टी के राष्ट्रीय चुनाव अधिकारी और पूर्व राज्यसभा सांसद अनील प्रसाद हेगड़े ने दिल्ली स्थित पार्टी मुख्यालय में नीतीश कुमार के निर्वाचन की आधिकारिक घोषणा की। चूंकि उनके खिलाफ कोई दूसरा नामांकन नहीं आया था, इसलिए 27 मार्च को होने वाले मतदान की आवश्यकता नहीं पड़ी। नीतीश कुमार की ओर से कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा और अन्य वरिष्ठ नेताओं ने नामांकन दाखिल किया था। उनकी अनुपस्थिति में संजय झा ने ही जीत का प्रमाण पत्र प्राप्त किया।
‘बिहार के गौरव को लौटाने वाला नेता’: संजय झा ने की प्रशंसा
इस ऐतिहासिक मौके पर जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने नीतीश कुमार के दो दशकों के कार्यकाल को ‘स्वर्ण काल’ करार दिया। उन्होंने कहा:
“नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार ने पिछड़ेपन की बेड़ियों को तोड़कर विकास की नई इबारत लिखी है। पिछले 20 वर्षों में उन्होंने बिहार की जो पहचान और गरिमा वापस लौटाई है, उसे इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा।”
2003 से 2026 तक: संघर्ष और संगठन की कहानी
नीतीश कुमार का जेडीयू से रिश्ता इसके जन्म से है। 2003 में जॉर्ज फ़र्नान्डिस और शरद यादव जैसे दिग्गजों के साथ मिलकर उन्होंने इस पार्टी की नींव रखी थी। तब से लेकर अब तक, नीतीश कुमार कई बार अध्यक्ष पद की कमान संभाल चुके हैं। हाल ही में राज्यसभा के लिए चुने जाने के बाद, यह उनके राजनीतिक जीवन का एक नया मोड़ है, जहां वे बिहार के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति में भी पार्टी को नई मजबूती देंगे।
आगामी चुनावों के लिए रणनीतिक मास्टरस्ट्रोक
नीतीश कुमार का पुनः अध्यक्ष बनना केवल एक पद की प्राप्ति नहीं, बल्कि आगामी विधानसभा चुनावों से पहले पार्टी को एकजुट रखने का एक बड़ा संदेश है। ललन सिंह के इस्तीफे के बाद दिसंबर 2023 से ही नीतीश कमान संभाल रहे थे, लेकिन अब पूर्णकालिक अध्यक्ष के रूप में उनकी ताजपोशी ने यह साफ कर दिया है कि एनडीए (NDA) के भीतर जेडीयू की सौदेबाजी की ताकत और संगठन की धार अब और तेज होगी।















