वैश्विक तेल संकट: दुनिया परेशान, पर चीन क्यों है बेफिक्र? ड्रैगन के ‘सुरक्षित ऊर्जा घेरे’ की 4 बड़ी रणनीतियां

बीजिंग/नई दिल्ली: पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में छिड़े महायुद्ध ने पूरी दुनिया को तेल संकट की दहलीज पर खड़ा कर दिया है। सप्लाई चेन ठप है और ईंधन की कीमतें आसमान छू रही हैं। लेकिन इस वैश्विक उथल-पुथल के बीच दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक देश चीन बेहद शांत और सुरक्षित नजर आ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की ‘एनर्जी सिक्योरिटी’ की दूरदर्शी नीति ने उसे एक ऐसा सुरक्षा कवच प्रदान किया है, जिसे भेद पाना किसी भी भू-राजनीतिक संकट के लिए मुश्किल है।

विशाल रणनीतिक भंडार: संकट काल का ‘बैकअप’

चीन ने पिछले एक दशक में कच्चे तेल का दुनिया का सबसे बड़ा रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) तैयार किया है। बीजिंग की नीति साफ रही है—जब तेल सस्ता हो, तब उसे खरीदकर जमा कर लो। आज चीन के पास इतना विशाल भंडार है कि अगर मिडिल ईस्ट से तेल की सप्लाई पूरी तरह बंद भी हो जाए, तो भी उसकी फैक्ट्रियां और परिवहन महीनों तक बिना किसी बाधा के चलते रहेंगे।

कोयले से केमिकल: तेल पर निर्भरता खत्म करने की नई तकनीक

चीन ने तकनीकी नवाचार के क्षेत्र में दुनिया को पीछे छोड़ते हुए ‘कोल-टू-केमिकल’ (Coal-to-Chemical) तकनीक पर महारत हासिल कर ली है। चीन के पास कोयले का प्रचुर भंडार है, जिसका उपयोग अब वह मेथेनॉल और सिंथेटिक अमोनिया बनाने में कर रहा है। इससे प्लास्टिक, रबर और खाद जैसे उद्योगों के लिए उसे अब कच्चे तेल की जरूरत नहीं रह गई है। यह कदम चीन की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ है।

EV क्रांति: पेट्रोल-डीजल की मांग में भारी गिरावट

परिवहन के क्षेत्र में चीन ने जो क्रांति की है, उसका असर अब दिखने लगा है। दुनिया में सबसे ज्यादा इलेक्ट्रिक वाहन (EV) आज चीन की सड़कों पर दौड़ रहे हैं। भारी सब्सिडी और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर के कारण वहां पेट्रोल और डीजल की मांग में ऐतिहासिक गिरावट आई है। कल तक जो चीन तेल का सबसे बड़ा ‘प्यास’ बुझाने वाला बाजार था, वह अब इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के जरिए दुनिया को रास्ता दिखा रहा है।

अक्षय ऊर्जा: सौर और पवन ऊर्जा का वैश्विक लीडर

चीन ने सौर ऊर्जा (Solar), पवन ऊर्जा (Wind) और जल विद्युत (Hydro) में इतना निवेश किया है कि उसकी कुल बिजली उत्पादन क्षमता का एक बड़ा हिस्सा अब ‘क्लीन एनर्जी’ से आता है। इस विविधीकरण (Diversification) ने उसे खाड़ी देशों के तेल और गैस के दबाव से काफी हद तक मुक्त कर दिया है।

पड़ोसी देशों की उम्मीद बना ‘ड्रैगन’

चीन की इस ऊर्जा मजबूती को देखते हुए वियतनाम और फिलीपींस जैसे दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों ने भी संकट के समय चीन से मदद की उम्मीद जताई है। चीन ने भी इन देशों के साथ ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर साझेदारी की इच्छा जाहिर की है, जिससे इस क्षेत्र में उसका दबदबा और बढ़ने वाला है।

चुनौतियां अब भी बरकरार

भले ही चीन ने खुद को काफी हद तक सुरक्षित कर लिया है, लेकिन चुनौतियां पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। चीन आज भी अपनी तेल जरूरतों का 75 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि वहां तेल और गैस की खपत अब ‘पीक’ पर पहुँचकर स्थिर (Plateau) हो रही है। इसका मतलब है कि भविष्य में चीन की बाहरी तेल पर निर्भरता और कम होगी, जो उसे दुनिया के अन्य विकसित देशों की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली और सुरक्षित बनाता है।

खबरें और भी हैं...

Leave a Comment