मंडी में मिल्क प्लांट के गेट पर बहाया 1200 लीटर दूध, स्वरोजगार की उम्मीदों पर फिरा पानी

मंडी (ब्यूरो)। हिमाचल प्रदेश में ‘व्यवस्था परिवर्तन’ के सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई गहराती जा रही है। मंडी जिले के चक्कर स्थित मिल्कफेड प्लांट से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने पशुपालकों के दर्द को सड़कों पर ला खड़ा किया है। शनिवार और रविवार को जब प्लांट प्रबंधन ने दूध लेने से इनकार कर दिया, तो आक्रोशित एक डेयरी संचालक ने 1200 लीटर दूध प्लांट के गेट के बाहर ही बहा दिया।

करोड़ों का कर्ज और ₹50 हजार का नुकसान

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस वीडियो ने प्रदेश सरकार की स्वरोजगार नीतियों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। पीड़ित पशुपालक रवि सैनी ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि उन्होंने करीब एक करोड़ रुपये का बैंक कर्ज लेकर 30 गायों के साथ डेयरी फार्मिंग शुरू की थी। रवि के मुताबिक, मिल्क प्लांट की मनमानी और बार-बार लगाए जा रहे ‘कट्स’ के कारण उन्हें भारी आर्थिक चोट पहुंच रही है। अकेले इस एक घटना से उन्हें 50 हजार रुपये का सीधा नुकसान हुआ है। रवि का सवाल है कि अगर उनका उत्पाद ही नहीं खरीदा जाएगा, तो वे बैंक की लाखों रुपये की किस्त कैसे चुकाएंगे?

प्लांट प्रबंधन की दलील: ‘क्षमता से बाहर है स्थिति’

दूसरी ओर, चक्कर मिल्कफेड प्लांट के प्रभारी विश्वकांत शर्मा ने इस मामले में प्रबंधन का पक्ष रखा है। उन्होंने बताया कि प्लांट की अधिकतम स्टोरेज क्षमता केवल एक लाख लीटर है। जब आवक क्षमता से अधिक हो जाती है, तो उसे स्टोर करना नामुमकिन हो जाता है। उन्होंने कहा कि इसी वजह से क्षेत्रवार दूध लेने की योजना (रोस्टर) बनाई गई थी, जिसकी सूचना पहले ही दी जा चुकी थी। प्रबंधन ने दूध बहाने की इस घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की बात भी कही है।

सरकार के वादे बनाम पशुपालकों का आक्रोश

हिमाचल प्रदेश में पशुपालकों की यह नाराजगी नई नहीं है। इससे पहले भी दूध के भुगतान में देरी को लेकर रामपुर समेत कई इलाकों में प्रदर्शन हो चुके हैं। सरकार एक तरफ दूध पर सब्सिडी और किसानों की आय बढ़ाने के मंचों से दावे कर रही है, तो दूसरी तरफ बुनियादी ढांचे (Storage Capacity) की कमी युवाओं के स्वरोजगार की राह में रोड़ा बन रही है।

पशुपालक का दर्द: “एक तरफ सरकार स्वरोजगार की बात करती है, दूसरी तरफ जब हम अपना उत्पाद लेकर पहुंचते हैं तो उसे लेने से मना कर दिया जाता है। क्या यह व्यवस्था परिवर्तन है?” – रवि सैनी, डेयरी संचालक

अब सवाल यह उठता है कि क्या सरकार केवल दावों तक सीमित रहेगी या मिल्कफेड प्लांटों की क्षमता बढ़ाकर इन मेहनतकश किसानों और युवाओं को कोई ठोस समाधान देगी? फिलहाल, सड़क पर बहता हुआ यह सफेद दूध प्रदेश की कृषि नीतियों की विफलता की गवाही दे रहा है।

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