उदयपुर। झीलों की नगरी उदयपुर से एक ऐसी रूहानी कंपा देने वाली खबर सामने आई है, जिसने मानवता और चिकित्सा जगत को शर्मसार कर दिया है। शहर में आईवीएफ (IVF) की आड़ में नाबालिग लड़कियों के अंडों (Eggs) की खरीद-फरोख्त का एक बड़ा रैकेट सक्रिय है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस काले कारोबार में डॉक्टर और महिला दलाल मिलकर 13 से 15 साल की बच्चियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। चंद पैसों के लालच में मासूमों को हार्मोनल इंजेक्शन देकर उनके शरीर का शोषण किया जा रहा है।
आधार कार्ड में हेराफेरी: 13 साल की बच्ची को बनाया 23 साल की महिला
जांच में खुलासा हुआ है कि इस गिरोह का नेटवर्क इतना शातिर है कि वे कानूनी उम्र की सीमा (न्यूनतम 23 वर्ष) को पार करने के लिए दस्तावेजों में खुलेआम छेड़छाड़ कर रहे हैं। दलाल आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की 13-15 साल की बच्चियों को निशाना बनाते हैं। इसके बाद उनके आधार कार्ड में जन्मतिथि बदलकर उम्र बढ़ा दी जाती है, ताकि कागजों पर उन्हें वयस्क दिखाया जा सके। कई मामलों में तो लड़कियों के नाम तक बदल दिए गए ताकि किसी को शक न हो।
25 हजार में खरीद और लाखों में सौदा: ‘प्रीमियम डोनर’ का लालच
दलालों का यह नेटवर्क बच्चियों के परिवार को महज 25 से 30 हजार रुपये देकर उनके अंडे खरीदता है। लेकिन जब बात निसंतान दंपत्तियों को ये अंडे बेचने की आती है, तो खेल ‘प्रीमियम’ हो जाता है। एक स्टिंग ऑपरेशन में सामने आया कि डॉक्टर “हाई-प्रोफाइल” और “प्रीमियम डोनर” के नाम पर ग्राहकों से 2 लाख रुपये तक की मांग करते हैं। पूरे आईवीएफ पैकेज का खर्च 5 से 6 लाख रुपये तक बताया जाता है। एडवांस पेमेंट के लिए ऑनलाइन ट्रांजेक्शन का सहारा लिया जा रहा है।
हार्मोनल इंजेक्शन का टॉर्चर: सेहत के साथ जानलेवा खिलवाड़
अंडों की संख्या बढ़ाने के लिए इन नाबालिग लड़कियों को बेरहमी से भारी मात्रा में हार्मोनल इंजेक्शन दिए जाते हैं। उन्हें कई दिनों तक गुप्त केंद्रों पर रखा जाता है, जहां उनकी हर गतिविधि गोपनीय होती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कम उम्र में इन इंजेक्शनों के इस्तेमाल से अंडाशय में सूजन (Ovarian Hyperstimulation Syndrome), हार्मोनल असंतुलन और भविष्य में हमेशा के लिए बांझपन का खतरा पैदा हो जाता है। यह प्रक्रिया इन बच्चियों के लिए जानलेवा भी साबित हो सकती है।
क्या कहता है कानून?
भारत में अंडाणु (Oocytes) की खरीद-फरोख्त पूरी तरह से गैरकानूनी है। असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (ART) एक्ट के तहत डोनर की पहचान गुप्त रखना अनिवार्य है और उसकी उम्र 23 से 35 वर्ष के बीच होनी चाहिए। उदयपुर के इस मामले में इन सभी नियमों की धज्जियां उड़ाई गई हैं। नाबालिगों का इस्तेमाल करना न केवल मेडिकल एथिक्स के खिलाफ है, बल्कि यह पॉक्सो (POCSO) एक्ट और मानव तस्करी के दायरे में आने वाला गंभीर अपराध है।
डॉक्टरों और दलालों का गठजोड़
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जांच के दौरान कई डोनर्स की तस्वीरें दिखाकर उन्हें “हाई प्रोफाइल” बताया गया। इस सिंडिकेट में शामिल महिला दलाल पहले मेडिकल चेकअप के बहाने लड़कियों को फंसाती हैं और फिर उन्हें इस दलदल में धकेल देती हैं। स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग पर अब इस रैकेट की गहराई से जांच करने और दोषी अस्पतालों व डॉक्टरों के लाइसेंस रद्द करने का भारी दबाव है।














