काठमांडू/भैरहवा: नेपाल और भारत के बीच व्यापारिक संबंधों में इन दिनों एक नया ‘टैक्स विवाद’ खड़ा हो गया है। नेपाल की बालेन सरकार द्वारा कस्टम ड्यूटी और एमआरपी (MRP) लेबलिंग को लेकर जारी किए गए एक सख्त आदेश ने बॉर्डर पर हड़कंप मचा दिया है। द रिपब्लिका की रिपोर्ट के अनुसार, नए नियमों के विरोध में व्यापारियों ने पिछले चार दिनों से आयात ठप कर दिया है, जिससे बीरगंज से लेकर विराटनगर तक हजारों कंटेनरों के पहिये थम गए हैं।
क्या है बालेन सरकार का ‘100 रुपये वाला’ नया नियम?
नेपाल सरकार ने 28 अप्रैल से एक नया कानून प्रभावी किया है। इसके तहत अब भारत से आने वाले 100 नेपाली रुपये से अधिक मूल्य के हर सामान पर कस्टम ड्यूटी (सीमा शुल्क) चुकाना अनिवार्य होगा। सिर्फ टैक्स ही नहीं, सरकार ने ‘एमआरपी लेबल’ को लेकर भी कड़े निर्देश दिए हैं:
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आयात किए गए हर तैयार सामान पर कस्टम क्लीयरेंस से पहले एमआरपी (MRP) लेबल होना जरूरी है।
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बिना पहले से घोषित मूल्य के किसी भी सामान को सीमा पार करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
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वाणिज्य विभाग ने इसके लिए केवल 15 दिन का समय दिया था, जिसे व्यापारी नाकाफी बता रहे हैं।
बॉर्डर पर ट्रकों की मील लंबी कतारें, बाजार में किल्लत का डर
नियम लागू होते ही नेपाल के प्रमुख बॉर्डर पॉइंट्स—बीरगंज, भैरहवा, विराटनगर, रसुवागढ़ी और नेपालगंज—पर सन्नाटा पसर गया है। भैरहवा कस्टम प्रमुख हरिहर पौडेल के मुताबिक, 1,000 से ज्यादा कंटेनर भारत की तरफ फंसे हुए हैं। नेपाल के कस्टम अधिकारियों ने स्पष्ट कर दिया है कि बिना लेबल वाले सामान को अंदर नहीं आने दिया जाएगा। हालांकि, पेट्रोलियम उत्पादों, कच्चे माल और फल-सब्जियों जैसी आवश्यक वस्तुओं को इस पाबंदी से बाहर रखा गया है।
व्यापारियों की दलील: ‘अव्यावहारिक है यह फरमान’
नेपाली आयातकों का कहना है कि सरकार का यह फैसला पूरी तरह अव्यावहारिक है। उनका तर्क है:
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पैकिंग की समस्या: एक शिपमेंट में हजारों छोटे आइटम होते हैं, हर एक पर अलग से लेबल लगाना नामुमकिन है।
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लागत में बढ़ोतरी: बॉर्डर पर सामान खोलकर दोबारा पैकिंग और लेबलिंग करने से लेबर और समय की लागत बढ़ेगी, जिससे नेपाल के बाजार में महंगाई चरम पर पहुंच जाएगी।
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सुरक्षा का खतरा: खुले में सामान की दोबारा पैकिंग करना असुरक्षित है और इससे सामान खराब होने का डर है।
10 साल पुराना मुद्दा, अब बढ़ी सख्ती
नेपाल सरकार पिछले एक दशक से एमआरपी नियम लागू करने की कोशिश कर रही है। पहली बार 17 सितंबर 2012 को राजपत्र में नोटिस जारी कर रोजमर्रा के सामान पर प्राइस टैग अनिवार्य किया गया था। लेकिन इस बार बालेन सरकार की सख्ती ने व्यापारियों को बैकफुट पर ला दिया है। जानकारों का मानना है कि यदि यह गतिरोध जल्द नहीं सुलझा, तो नेपाल में जरूरी सामानों की भारी किल्लत और कीमतों में भारी उछाल आ सकता है।















