वॉशिंगटन: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की महत्वाकांक्षी आर्थिक नीतियों को न्यायपालिका से करारा झटका लगा है। अमेरिका के एक फेडरल ट्रेड कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए 10% ग्लोबल टैरिफ को पूरी तरह अवैध घोषित कर दिया है। गुरुवार को आए इस फैसले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति के पास कांग्रेस की सहमति के बिना इतने व्यापक स्तर पर आयात शुल्क (Import Duty) थोपने का संवैधानिक अधिकार नहीं है।
कोर्ट का फैसला: कानून की मर्यादा का उल्लंघन
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ‘कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड’ के तीन सदस्यीय पैनल ने 2-1 के बहुमत से यह निर्णय सुनाया। जजों ने कहा कि फरवरी में एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर के जरिए लागू किए गए ये टैरिफ ट्रेड एक्ट 1974 की कसौटी पर खरे नहीं उतरते।
अदालत ने ट्रंप प्रशासन की उस दलील को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें 1.2 ट्रिलियन डॉलर के व्यापार घाटे को ‘आर्थिक आपातकाल’ बताकर टैरिफ को जायज ठहराया गया था। कोर्ट ने माना कि व्यापार घाटा होना मात्र इस कानून के तहत असाधारण शक्तियां इस्तेमाल करने का आधार नहीं हो सकता।
छोटे व्यापारियों और खिलौना निर्माताओं की जीत
इस फैसले का सबसे अधिक स्वागत उन अमेरिकी कंपनियों ने किया है जो वैश्विक सप्लाई चेन पर निर्भर हैं। ‘बेसिक फन’ कंपनी के CEO जे मय फोरमैन ने इसे ‘बड़ी जीत’ बताते हुए कहा कि इन गैर-कानूनी करों के कारण बाजार में टिकना मुश्किल हो गया था। यह फैसला उन कंपनियों को स्पष्टता देगा जो सस्ती और सुरक्षित वस्तुओं के लिए ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग का सहारा लेती हैं।
भारत पर क्या होगा असर?
ट्रंप अक्सर भारत की टैरिफ नीतियों की आलोचना करते रहे हैं और ‘रेसिप्रोकल टैक्स’ (बराबर टैक्स) की वकालत करते आए हैं। ऐसे में अमेरिकी कोर्ट का यह फैसला भारतीय निर्यातकों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है:
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निर्यात में सुगमता: भारतीय सामान (खासकर टेक्सटाइल, जेम्स और ज्वेलरी) अमेरिकी बाजार में महंगे होने से बच जाएंगे।
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लागत में कमी: 10% की अतिरिक्त ड्यूटी हटने से भारतीय सामानों की प्रतिस्पर्धात्मकता बनी रहेगी।
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सकारात्मक संकेत: अमेरिका में टैरिफ नीतियों के कमजोर पड़ने से वैश्विक व्यापार युद्ध की आशंका कम होगी।
क्या है ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 122?
यह कानून राष्ट्रपति को विशेष परिस्थितियों में 150 दिनों के लिए अस्थायी टैरिफ लगाने की शक्ति देता है। हालांकि, यह शक्ति केवल तभी इस्तेमाल की जा सकती है जब देश पर:
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गंभीर भुगतान संतुलन (Balance of Payments) का संकट हो।
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मुद्रा स्थिरता (Currency Stability) को बड़ा जोखिम हो।
कोर्ट ने पाया कि वर्तमान स्थिति इन अनिवार्य शर्तों को पूरा नहीं करती थी।
आगे की राह: अपील की तैयारी
माना जा रहा है कि ट्रंप प्रशासन इस फैसले को चुपचाप स्वीकार नहीं करेगा। सरकार जल्द ही इसके खिलाफ ‘यूएस कोर्ट ऑफ अपील्स फॉर द फेडरल सर्किट’ में अपील कर सकती है। यदि वहां भी राहत नहीं मिली, तो यह कानूनी लड़ाई एक बार फिर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच सकती है।















