केजीएमयू में ₹2.5 करोड़ के दवा घोटाले के बाद महा-ऑडिट: कैंसर विभागों पर कसता शिकंजा, इन 7 विभागों में खंगाला जाएगा रिकॉर्ड

लखनऊ। किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में करीब ढाई करोड़ रुपये के सनसनीखेज दवा घोटाले के सामने आने के बाद अब शासन से लेकर प्रशासन तक बेहद सख्त रुख में नजर आ रहा है। यूरोलॉजी विभाग में हुए इस महाफर्जीवाड़े से सबक लेते हुए केजीएमयू प्रशासन ने अब उन सभी 7 विभागों का व्यापक ‘स्पेशल ऑडिट’ कराने का एक बड़ा फैसला लिया है, जहां कैंसर मरीजों का इलाज और कीमोथेरेपी की सुविधा उपलब्ध है। इस जांच के दायरे में 5,000 रुपये से अधिक कीमत वाली सभी दवाओं के बिल, वाउचर और मरीजों के पूरे रिकॉर्ड को लाया जाएगा।

उधर, यूपी शासन ने भी इस मामले का कड़ा संज्ञान लेते हुए पिछले वित्तीय वर्ष (2025-26) में मुफ्त इलाज के नाम पर बांटे गए बजट और सत्यापित मरीजों की पूरी कुंडली तलब कर ली है।

इन 7 विभागों में खंगाला जाएगा रिकॉर्ड, मरीजों का होगा भौतिक सत्यापन

केजीएमयू के जिन सात प्रमुख विभागों में कैंसर रोगियों का इलाज किया जा रहा है, वहां पिछले पांच महीनों के भीतर हुए इलाज की फाइलें फिर से खोली जाएंगी। इन विभागों में शामिल हैं:

  • रेडियोथेरेपी विभाग

  • सर्जिकल आंकोलॉजी

  • यूरोलॉजी विभाग

  • स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग

  • गायनी आंकोलॉजी

  • मेडिकल आंकोलॉजी

  • इंडोक्राइन सर्जरी विभाग

जांच के दौरान यह बारीकी से देखा जाएगा कि असाध्य रोग योजना, बीपीएल (BPL) और विपन्न कोटे के तहत किन-किन मरीजों को मुफ्त इलाज और महंगी दवाएं दी गईं। इसके लिए मरीजों का नाम, पता, [आधार संख्या ओमिटेड], मोबाइल नंबर, राशन कार्ड, डॉक्टर का पर्चा (प्रिस्क्रिप्शन) और भर्ती होने के रिकॉर्ड (आईपीटी) का पूरा ब्यौरा जुटाकर कड़ा ऑडिट किया जाएगा।

3 आरोपी कर्मचारी बर्खास्त, वसूली की प्रक्रिया शुरू

मामले की जानकारी देते हुए केजीएमयू के प्रवक्ता डॉ. केके सिंह ने बताया कि सभी सातों विभागों की गहन तफ्तीश के लिए एक ‘पांच सदस्यीय उच्च स्तरीय जांच कमेटी’ का गठन कर दिया गया है। यह कमेटी विशेष रूप से महंगी कीमोथेरेपी और इम्यूनोथेरेपी पाने वाले मरीजों के दावों की अलग से स्क्रूटनी करेगी।

डॉ. सिंह ने यह भी साफ किया कि यूरोलॉजी विभाग में हुए इस ढाई करोड़ के दवा घोटाले में लिप्त पाए गए तीन आरोपी कर्मचारियों को तत्काल प्रभाव से नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया है। इसके साथ ही, संबंधित आउटसोर्सिंग सेवा प्रदाता एजेंसी को कारण बताओ नोटिस जारी कर घोटाले की रकम की वसूली (रिकवरी) की कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

विभागाध्यक्षों (HOD) की तय होगी जवाबदेही, बिना जांच दस्तखत पर रोक

भविष्य में इस तरह के किसी भी वित्तीय घालमेल को रोकने के लिए केजीएमयू प्रशासन ने प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा फेरबदल किया है। अब से किसी भी विभाग में वित्तीय अनियमितता पाए जाने पर सीधे विभागाध्यक्ष (HOD) की जवाबदेही तय की जाएगी। सभी एचओडी को कड़े निर्देश जारी किए गए हैं कि वे किसी भी सरकारी योजना से जुड़े दस्तावेज, इंडेंट या दवा के प्रस्ताव पर आंख मूंदकर हस्ताक्षर न करें, बल्कि उसकी पूरी जांच-पड़ताल करने के बाद ही अपनी स्वीकृति दें।

ओटीपी (OTP) आधारित डिजिटल व्यवस्था से रुकेगी चोरी, इमरजेंसी फंड पर ताला

दवाओं की कालाबाजारी और फर्जी बिलिंग को जड़ से खत्म करने के लिए केजीएमयू अब पूरी व्यवस्था को ऑनलाइन और अभेद्य बनाने जा रहा है।

  1. ओटीपी वेरिफिकेशन प्रणाली: नई डिजिटल व्यवस्था के तहत जब भी किसी सरकारी योजना के माध्यम से किसी मरीज के लिए महंगी दवा या उपकरण का इंडेंट (डिमांड) भेजा जाएगा, तो सिस्टम से एक ओटीपी (OTP) जेनरेट होगा। यह ओटीपी सीधे मरीज के रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर और संबंधित नोडल अधिकारी के पास जाएगा। दोनों स्तरों से सत्यापन के बाद ही दवा जारी हो सकेगी।

  2. इमरजेंसी फंड हुआ बंद: पहले केजीएमयू में सभी विभागों को आपातकालीन स्थिति के लिए 20,000 रुपये तक का इमरजेंसी फंड मिलता था, ताकि डॉक्टर जरूरत पड़ने पर सीधे दवा खरीद सकें। लेकिन इस फंड में भी गड़बड़ी और अपारदर्शिता की आशंका को देखते हुए केजीएमयू प्रशासन ने कई विभागों में इस व्यवस्था को पूरी तरह से बंद कर दिया है।

शासन का कड़ा रुख: चिकित्सा शिक्षा विभाग ने तलब की सत्यापित सूची

यूरोलॉजी विभाग की इस बड़ी सेंधमारी के बाद शासन स्तर पर भी हड़कंप है। उत्तर प्रदेश चिकित्सा शिक्षा विभाग के अनु सचिव ज्ञानेंद्र कुमार शुक्ला ने केजीएमयू की कुलसचिव अर्चना गहरवार को एक पत्र भेजकर बेहद कड़े लहजे में रिपोर्ट मांगी है। शासन ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान बीपीएल, अंत्योदय, लावारिस और विपन्न कल्याण योजना के तहत मुफ्त इलाज पाने वाले सभी मरीजों की विभागवार और केजीएमयू प्रशासन द्वारा पूरी तरह सत्यापित सूची मांगी है, जिसमें मरीज का नाम, पता और मोबाइल नंबर अनिवार्य रूप से दर्ज होना चाहिए, ताकि यह साफ हो सके कि सरकारी पैसे का लाभ वाकई असली पीड़ितों को मिला है या नहीं।

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