वॉशिंगटन/नई दिल्ली। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फार्मास्यूटिकल सेक्टर को लेकर एक बेहद सख्त और दूरगामी फैसला लिया है। ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका में आयात होने वाली सभी जेनेरिक दवाओं पर चरणबद्ध तरीके से भारी-भरकम टैरिफ (आयात शुल्क) लगाने का औपचारिक ऐलान कर दिया है। ट्रंप के इस फैसले का सीधा मकसद विदेश में दवाएं बनाने वाली अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स अमेरिका में ही स्थापित करने के लिए मजबूर करना है।
चरणबद्ध तरीके से लागू होगा नया टैरिफ स्ट्रक्चर
ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रूथ सोशल’ (Truth Social) पर इस नीति की रूपरेखा साझा करते हुए स्पष्ट किया कि इस नीति को तुरंत लागू करने के बजाय तीन अलग-अलग चरणों में लागू किया जाएगा:
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पहला चरण (1 अगस्त 2026 से): अगले दो वर्षों तक अमेरिका में आयात होने वाली जेनेरिक दवाओं पर 0% टैरिफ रहेगा।
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दूसरा चरण: दो साल की छूट की अवधि खत्म होने के बाद अगले एक साल तक 100% टैरिफ वसूला जाएगा।
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तीसरा चरण: तीसरे वर्ष के बाद आयातित जेनेरिक दवाओं पर टैरिफ को बढ़ाकर 200% कर दिया जाएगा।
राष्ट्रपति ट्रंप का कहना है कि यह छूट का समय (दो साल) दवा कंपनियों को अमेरिका में अपनी मैन्युफैक्चरिंग इकाइयां और संयंत्र स्थापित करने के लिए दिया जा रहा है। जो कंपनियां तय समय सीमा के भीतर अमेरिका में प्लांट नहीं लगाएंगी, उन पर सख्त जुर्माना भी ठोका जाएगा। हालांकि, पेटेंटेड, ब्रांडेड या इनोवेटिव दवाओं पर लागू वर्तमान में जारी नीतियों में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा।
‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत रीशोरिंग पर जोर
इस कड़े कदम के पीछे की वजह बताते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि इसका मुख्य उद्देश्य जेनेरिक दवा बनाने के काम को अमेरिका में वापस लाना (रीशोरिंग) और अपने देश के नागरिकों की स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित करना है। ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका में वर्तमान में अभूतपूर्व स्तर पर नई फार्मास्युटिकल फैसिलिटीज और रीसर्च सेंटर का निर्माण किया जा रहा है, ताकि दवा आपूर्ति के मामले में दूसरे देशों पर निर्भरता को पूरी तरह खत्म किया जा सके।
भारत की फार्मा इंडस्ट्री पर कितना होगा असर?
भारत को ‘दुनिया की फार्मेसी’ कहा जाता है, और अमेरिकी बाजार में बिकने वाली लगभग 40% से 50% जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति भारतीय फार्मा कंपनियां ही करती हैं। इस लिहाज से ट्रंप का यह फैसला भारतीय बाजार के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।
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तत्काल राहत: अगले दो सालों तक टैरिफ जीरो रहने से भारतीय दवा निर्यातकों पर फिलहाल कोई अतिरिक्त वित्तीय बोझ नहीं पड़ेगा। इससे भारतीय कंपनियों को अपनी भविष्य की रणनीतियां बनाने और विकल्प तलाशने का पर्याप्त समय मिल जाएगा।
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लंबी अवधि की चुनौती: अगर भारतीय कंपनियां दी गई समय सीमा के भीतर अमेरिका में अपने मैन्युफैक्चरिंग प्लांट स्थापित नहीं करती हैं, तो 100% से 200% तक लगने वाले टैरिफ के कारण भारत से निर्यात बेहद खर्चीला और नुकसानदेह हो जाएगा।
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अमेरिकी उपभोक्ताओं पर मार: टैरिफ बढ़ने का सीधा असर अमेरिका में दवाओं की खुदरा कीमतों पर पड़ेगा। इससे वहां के आम नागरिकों के लिए जीवनरक्षक जेनेरिक दवाएं काफी महंगी हो जाएंगी, जिससे स्वास्थ्य बजट बिगड़ना तय माना जा रहा है।















