पटना (बिहार)। डिजिटल दौर में सोशल मीडिया जहां एक ओर सूचनाओं के आदान-प्रदान का बड़ा जरिया है, वहीं फेक न्यूज, सांप्रदायिक अफवाहें, डीपफेक वीडियो और फर्जी प्रोफाइल अब कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बनते जा रहे हैं। इसी खतरे से निपटने के लिए बिहार सरकार और राज्य पुलिस ने सोशल मीडिया के दुरुपयोग के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी और सख्त कार्रवाई शुरू की है। पुलिस की इस आक्रामक रणनीति से साइबर अपराधियों और नफरत फैलाने वाले तत्वों में हड़कंप मच गया है।
बिहार में जनवरी से जून 2026 के बीच महज छह महीनों के भीतर सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक और भड़काऊ सामग्री से जुड़े 475 मामले दर्ज किए गए हैं। इस दौरान पुलिस ने 103 आरोपियों को गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे भेजा है। इसके अलावा साइबर सेल ने तत्परता दिखाते हुए 1,320 आपत्तिजनक पोस्ट और यूआरएल (URL) इंटरनेट से हटवाए हैं, जबकि 529 फर्जी या आपत्तिजनक सोशल मीडिया अकाउंट्स को पूरी तरह से बंद करा दिया है।
कानून-व्यवस्था बिगाड़ी तो लगेगा ‘गुंडा एक्ट’, जानें क्या है सरकार का सख्त रुख
बिहार सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि सोशल मीडिया के जरिए हिंसा भड़काने, अफवाह फैलाने या नफरत का माहौल बनाने वालों से बेहद सख्ती से निपटा जाएगा। ऐसे असामाजिक तत्वों पर अब सिर्फ भारतीय न्याय संहिता (BNS) या आईटी एक्ट की सामान्य धाराएं ही नहीं लगेंगी, बल्कि मामला गंभीर होने पर ‘बिहार कंट्रोल ऑफ क्राइम्स एक्ट’ (जिसे आम भाषा में ‘गुंडा एक्ट’ कहा जाता है) के तहत भी कठोर कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
यह कानून आमतौर पर आदतन अपराधियों और सार्वजनिक व्यवस्था को बार-बार नुकसान पहुंचाने वाले तत्वों पर लागू किया जाता है। अगर जांच में पाया जाता है कि कोई व्यक्ति सोशल मीडिया का बार-बार इस्तेमाल करके सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने या संगठित अपराध को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है, तो पुलिस उसके खिलाफ गुंडा एक्ट के तहत केस दर्ज कर सकती है।
24 घंटे अलर्ट पर CCSU: कैसे होती है हर एक पोस्ट पर नजर?
बिहार में सोशल मीडिया पर पैनी नजर रखने का जिम्मा पुलिस की ‘साइबर क्राइम एंड सिक्योरिटी यूनिट’ (CCSU) को सौंपा गया है। यह विशेष यूनिट राज्य भर में फेसबुक, एक्स (ट्विटर), इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हाट्सएप जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स की चौबीसों घंटे 24×7 मॉनिटरिंग करती है। CCSU की मुख्य प्राथमिकताएं ये हैं:
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फेक न्यूज और भड़काऊ पोस्ट: धार्मिक या सामाजिक तनाव फैलाने वाले कंटेंट की तत्काल पहचान।
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डीपफेक और अश्लील सामग्री: महिलाओं के नाम से बने फर्जी प्रोफाइल और आपत्तिजनक वीडियो पर कार्रवाई।
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संवैधानिक संस्थाओं का अपमान: न्यायपालिका या सरकारी व्यवस्था के खिलाफ नफरत फैलाने वालों पर शिकंजा।
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आईटी प्लेटफॉर्म्स को नोटिस: आपत्तिजनक सामग्री मिलते ही सोशल मीडिया कंपनियों को तुरंत कानूनी नोटिस भेजना।
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, बीते 6 महीनों के दौरान बिहार पुलिस ने विभिन्न सोशल मीडिया कंपनियों को 692 कानूनी नोटिस जारी किए हैं, जिसके तहत आपत्तिजनक कंटेंट को ब्लॉक और डिलीट करवाया गया है।
क्या दूसरे राज्यों में भी है ऐसा सिस्टम?
बिहार देश का पहला ऐसा राज्य नहीं है जो सोशल मीडिया की कड़ी निगरानी कर रहा है। उत्तर प्रदेश में ‘सोशल मीडिया मॉनिटरिंग सेल’ बेहद सक्रियता से काम कर रहा है, जहां भड़काऊ पोस्ट पर तुरंत एक्शन लिया जाता है। इसके अलावा महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों की साइबर पुलिस भी सोशल मीडिया स्पेस पर लगातार नजर बनाए रखती है। हालांकि, बिहार पुलिस की CCSU जिस तरह 24 घंटे एक्टिव रहकर सीधे एफआईआर दर्ज कर रही है और सख्त कानूनों का इस्तेमाल कर रही है, वह देश भर में चर्चा का विषय बन गया है।













