ट्रंप की राह आसान या भारत पर बढ़ेगा दबाव? अमरीकी संसद में पास हुआ रूस-ईरान सख्त पाबंदी बिल, जानिए क्या पड़ेगा असर

वॉशिंगटन / नई दिल्ली। अमरीकी संसद के निचले सदन यानी प्रतिनिधि सभा में एक नया और बेहद कड़ा कानून ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ पास हो गया है। डेमोक्रेटिक पार्टी के कुछ सांसदों की मदद से यह बिल बेहद कड़े मुकाबले में 211 के मुकाबले 214 वोटों से पास हुआ। इससे पहले अमरीकी सीनेट भी 7 अगस्त को भारी बहुमत (86-11) से इसे अपनी हरी झंडी दे चुकी है।

इस कानून का सीधा मकसद रूस के तेल-गैस कारोबार, बड़े नेताओं और चोरी-छिपे तेल सप्लाई करने वाले ‘शैडो बेड़े’ के गुप्त जहाजों की कमर तोड़ना है। नए प्रावधानों के तहत अमरीकी राष्ट्रपति को यह असीमित अधिकार मिल जाएगा कि वे रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले किसी भी देश पर 100 प्रतिशत तक का भारी-भरकम टैरिफ लगा सकें। इसके अलावा, ईरान पर पहले से लागू आर्थिक पाबंदियों का दायरा भी और ज्यादा सख्त कर दिया गया है।

बिना नाम लिए निशाने पर भारत? समझिए क्या है इसका गणित

यद्यपि इस अमरीकी विधेयक में सीधे तौर पर भारत का नाम नहीं दर्ज किया गया है, लेकिन इसके दायरे में उन सभी मुख्य राष्ट्रों को शामिल किया गया है जो इस समय रूस से बड़े पैमाने पर ऊर्जा खरीद रहे हैं। चूंकि भारत मौजूदा समय में रूसी कच्चे तेल के सबसे बड़े खरीदारों में शामिल है, इसलिए अमरीका का यह नया दांव परोक्ष रूप से भारत को प्रभावित कर सकता है। वैश्विक बाजार विशेषज्ञों की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि अमरीका इस टैरिफ हथियार का इस्तेमाल किस तरह करता है।

140 करोड़ लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सर्वोपरि: भारत का कड़ा रुख

अमरीका की इस आर्थिक घेराबंदी के बीच भारत ने अपना रुख पूरी तरह साफ कर दिया है। भारत का स्पष्ट मानना है कि वह किसी भी दूसरे देश की एकतरफा पाबंदियों या नियमों को मानने के लिए बाध्य नहीं है। अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर कायम रहते हुए भारत ने साफ किया है कि 140 करोड़ देशवासियों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदना उसकी आर्थिक मजबूरी और प्राथमिकता दोनों है।

भारत का यह भी तर्क है कि रूसी तेल की उसकी निरंतर खरीद ने ही वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों को अनियंत्रित होने से बचाकर रखा है। फिलहाल, अमरीकी पाबंदियों और भारी टैक्स की धमकियों के बीच भारत लगातार वाशिंगटन के साथ राजनयिक स्तर पर बातचीत जारी रखे हुए है, ताकि दोनों देशों के द्विपक्षीय व्यापार, रक्षा समझौतों और हाई-टेक साझेदारी पर इसका कोई नकारात्मक असर न पड़े।

 

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