
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने बुधवार को रूस और ईरान पर नए व कड़े प्रतिबंध लगाने वाले एक बड़े विधेयक को मंजूरी दे दी है। सदन में इस विधेयक के पक्ष में 262 और विरोध में 159 सांसदों ने मतदान किया। 61 पन्नों वाले इस ऐतिहासिक विधेयक को अब अंतिम हस्ताक्षर के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति के पास भेज दिया गया है।
गौरतलब है कि यह विधेयक पिछले महीने अमेरिकी सीनेट में भी 86-11 के भारी बहुमत से पारित हो चुका है। इस कानून का नाम जुलाई में दिवंगत हुए सीनेटर के सम्मान में ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ रखा गया है, जो रूस के खिलाफ सख्त कार्रवाई के सबसे बड़े समर्थकों में से एक थे।
ऊर्जा क्षेत्र पर सीधा वार: रूस की कमाई रोकने की तैयारी
इस नए विधेयक का सबसे मुख्य निशाना रूस का ऊर्जा क्षेत्र (तेल और गैस) है। अमेरिका का मकसद रूस से ईंधन खरीदने वाले दुनिया के बड़े देशों पर आर्थिक दबाव बनाकर उसकी कमाई के स्रोतों को पूरी तरह सुखाना है, ताकि यूक्रेन के खिलाफ 2022 से चल रहे युद्ध को फंड करने की रूसी क्षमता को खत्म किया जा सके।
सात अहम बातें जो इस नए कानून में शामिल हैं
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100% तक टैरिफ का अधिकार: राष्ट्रपति को रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा खरीदने वाले किसी भी तीसरे देश के सामान पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का कानूनी अधिकार मिल गया है।
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2025 के प्रस्ताव से कम कठोर: सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के मुताबिक, यह प्रावधान 2025 के शुरुआती विधेयक (जिसमें 500% शुल्क का प्रस्ताव था) की तुलना में अधिक सीमित है।
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छूट का विशेष प्रावधान: जो देश अपनी कुल प्राकृतिक गैस का 15% से कम हिस्सा रूस से खरीदते हैं और अपनी निर्भरता घटाने के लिए कदम उठा रहे हैं, उन्हें इस टैरिफ से छूट मिल सकती है।
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चीन पर कस सकता है शिकंजा: अटलांटिक काउंसिल के अनुसार, अगर चीन रूसी तेल की खरीद जारी रखता है, तो अमेरिका राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर उसके उत्पादों पर 100% तक सीमा शुल्क लगा सकता है।
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रूस के शीर्ष अधिकारियों पर निशाना: विधेयक में रूसी सरकारी अधिकारियों, शीर्ष अरबपतियों (ऑलिगार्च), उनके परिजनों और वित्तीय संस्थानों पर भी कड़े प्रतिबंधों का प्रावधान है।
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ईरान पर अतिरिक्त सख्ती: राष्ट्रपति के अनुरोध पर ईरान के हथियार और ऊर्जा क्षेत्रों की फंडिंग रोकने के लिए प्रतिबंध लगाने की शक्तियों का दायरा और बढ़ाया गया है।
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भारत पर immediate असर नहीं: भारत पर फिलहाल 100% टैरिफ नहीं लगा है, बल्कि राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया है कि वे परिस्थितियों के अनुसार इसका प्रयोग कर सकते हैं।
भारत और चीन को लेकर क्यों गहराया तनाव?
रूस से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल और गैस खरीदने के कारण भारत और चीन का नाम इस नए कानून के संदर्भ में सबसे प्रमुखता से आ रहा है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि विधेयक पारित होने का मतलब यह कतई नहीं है कि भारत पर तुरंत 100% टैक्स लागू हो गया है। विधेयक में स्पष्ट रूप से उन सहयोगी देशों के लिए छूट (Waiver) का प्रावधान रखा गया है जो धीरे-धीरे रूस से अपनी ऊर्जा निर्भरता कम करने की दिशा में ठोस कदम उठा रहे हैं।
अमेरिकी सांसदों में बहस और तीखी प्रतिक्रियाएं
विधेयक के पारित होने पर अमेरिकी संसद में मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिली। प्रतिनिधि सभा के कुछ वरिष्ठ डेमोक्रेट सांसदों ने इस बात पर चिंता जताई कि इससे राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने की असीमित शक्तियां मिल रही हैं, जिसका दुरुपयोग हो सकता है।
हालांकि, सदन के स्पीकर माइक जॉनसन ने विधेयक का समर्थन करते हुए कहा, “मैं हमेशा से रूस पर प्रतिबंध लगाने वाले विधेयक के पक्ष में रहा हूँ। हमें सभी को एक मंच पर लाने के लिए सर्वसहमति बनानी थी और आज हमारे पास वह स्पष्ट सहमति है।” दूसरी ओर, ‘रजॉम फॉर यूक्रेन’ संगठन के डेनियल बाल्सन ने इसे ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि यह कदम तब आया है जब रूस, यूक्रेन के ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर हमले तेज कर रहा है।















