
पश्चिम बंगाल की राजनीति में अचानक आए इस अभूतपूर्व राजनीतिक घटनाक्रम ने पूरे राज्य के सियासी समीकरणों को हिलाकर रख दिया है। शुक्रवार का दिन ममता बनर्जी खेमे के लिए एक के बाद एक कई बड़े झटकों से भरा रहा। एक तरफ चुनाव आयोग के सख्त रुख ने पार्टी के वजूद और पहचान पर संकट खड़ा कर दिया, तो दूसरी तरफ नंदीग्राम उपचुनाव की जमीन पर बने नए सियासी घटनाक्रम ने पूरे माहौल को गरमा दिया है। आयोग द्वारा ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और उसके ऐतिहासिक ‘फूल-घास’ वाले चुनाव चिह्न को फ्रीज किए जाने के बाद यह कानूनी और राजनीतिक जंग अब देश की सबसे बड़ी अदालत के दरवाजे तक जा पहुंची है।
चुनाव आयोग के फैसले और विधायकों की बगावत के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका
इन ताबड़तोड़ झटकों के बीच ममता बनर्जी गुट ने बिना समय गंवाए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। चीफ जस्टिस की पीठ के सामने दो अलग-अलग याचिकाएं दायर की गई हैं, जिनमें अदालत से तत्काल हस्तक्षेप की अपील की गई है। पहली याचिका चुनाव आयोग के उस अंतरिम आदेश के खिलाफ है, जिसमें असली पार्टी के नाम और ‘दो फूल-घास’ के पारंपरिक प्रतीक के इस्तेमाल पर अंतरिम रोक लगाई गई है। ममता गुट ने आरोप लगाया है कि आयोग ने पार्टी के बहुसंख्यक कैडर और बुनियादी संगठनात्मक ढांचे को दरकिनार करते हुए बागी गुट के दावों को तरजीह दी है। वहीं दूसरी याचिका पश्चिम बंगाल विधानसभा के अध्यक्ष द्वारा 10 बागी विधायकों की अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय लेने में की जा रही देरी को लेकर दायर की गई है। याचिका में कहा गया है कि जब तक बागी विधायकों की सदस्यता पर अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक उनके आधार पर पार्टी के नाम और सिंबल का बंटवारा या उस पर रोक लगाना संवैधानिक रूप से गलत है। सुप्रीम कोर्ट इस पूरे मामले पर 21 सितंबर 2026 को सुनवाई कर सकता है।
नेता प्रतिपक्ष के पद को लेकर गहराया विवाद, 10 बागी विधायकों को कारण बताओ नोटिस
अयोग्यता की इस कानूनी लड़ाई में ममता गुट के वरिष्ठ नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट से ऋतब्रत बनर्जी समेत 10 बागी विधायकों को दल-बदल कानून के तहत अयोग्य घोषित करने की मांग की है। इस पर संज्ञान लेते हुए विधानसभा सचिवालय ने 10 विधायकों को नोटिस जारी कर एक हफ्ते के भीतर जवाब मांगा है। इन विधायकों में ऋतब्रत बनर्जी, अरूप राय, फिरहाद हकीम, संदीपन साहा, अखरुज्जमान अंसारी, शिउली साहा, सबीना यास्मिन, बिप्लब मित्रा, जावेद खान और रथिन घोष शामिल हैं। बगावत की यह जंग सिर्फ सदस्यता तक सीमित नहीं है, बल्कि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद को लेकर भी टकराव चरम पर है। ममता खेमे ने शोभनदेव चट्टोपाध्याय को इस पद के लिए अपना उम्मीदवार बनाया था, लेकिन विधानसभा अध्यक्ष ने ऋतब्रत बनर्जी को मान्यता दे दी। इस फैसले को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी, जहां अदालत ने अगस्त में तत्काल राहत देने से इनकार करते हुए ऋतब्रत को सीमित अवधि के लिए पद पर बने रहने की अनुमति दी थी।
नंदीग्राम उपचुनाव में हाई-वोल्टेज ड्रामा: नामांकन वापसी के बाद कांग्रेस प्रत्याशी की गिरफ्तारी
6 अक्टूबर को होने वाले नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव में उस समय नाटकीय मोड़ आ गया जब ममता बनर्जी गुट की प्रत्याशी संचिता प्रधान डे ने अचानक अपना नामांकन वापस ले लिया। इससे पहले वह अपने पति सत्यजीत के साथ राज्य सचिवालय नबन्ना पहुंचीं और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात की। नामांकन वापसी से ठीक पहले चुनाव आयोग ने ममता गुट को नया नाम ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ और नया चुनाव चिह्न ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ आवंटित किया था, लेकिन प्रत्याशी के हटने से पार्टी बिना उम्मीदवार के रह गई। इसके तुरंत बाद ममता बनर्जी ने INDIA ब्लॉक को मजबूती देने का हवाला देते हुए कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को समर्थन देने का ऐलान किया। हालांकि, इस फैसले के कुछ ही घंटों के भीतर पश्चिम बंगाल पुलिस ने मिलन प्रधान को वर्ष 2007 के नंदीग्राम भूमि आंदोलन से जुड़े एक पुराने हत्या के मामले में गिरफ्तार कर लिया।
राहुल गांधी का भाजपा पर करारा हमला, भाजपा ने बताया बौखलाहट
कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान की अचानक हुई इस गिरफ्तारी पर देश का सियासी पारा चढ़ गया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर पोस्ट कर बीजेपी पर सीधा हमला बोला और इसे लोकतंत्र की हत्या करार दिया। राहुल गांधी ने कहा कि यह गिरफ्तारी कोई संयोग नहीं बल्कि राजनीतिक प्रतिशोध है, क्योंकि भाजपा चुनाव लड़ने के बजाय मुकाबला खत्म करने की साजिश रचती है। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी ने इन आरोपों को विपक्ष की बौखलाहट बताते हुए खारिज कर दिया। भाजपा प्रवक्ताओं ने कहा कि पुलिस केवल अपनी कानूनी प्रक्रिया का पालन कर रही है और चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है, जो नियमों के आधार पर अपने फैसले लेती है।















