
नई दिल्ली/हैदराबाद। देशभर में मतदाता सूची में कथित गड़बड़ी और ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) प्रक्रिया को लेकर सियासी संग्राम छिड़ गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्षी दलों और छात्र संगठनों ने सड़क से लेकर संसद के बाहर तक मोर्चा खोल दिया है। इस बीच, वोटर लिस्ट में हो रही गड़बड़ियों और SIR के फैसलों को चुनौती देने वाली याचिका पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई होनी है।
सुप्रीम कोर्ट के इस संभावित फैसले से पहले शीर्ष अदालत के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने वोटिंग अधिकार पर एक बड़ा और कड़ा बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि देश के नागरिकों को मताधिकार से वंचित करने वाली कोई भी प्रक्रिया पूरी तरह से मनमानी है और यह संवैधानिक व्यवस्था को नकारने जैसी है।
‘संविधान में दो तरह के नागरिकों के लिए कोई जगह नहीं’ हैदराबाद की NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में 19वीं NALSAR-जस्टिस बीआर साहनी मेमोरियल मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन समारोह को संबोधित करते हुए जस्टिस भुइयां ने लोकतांत्रिक अधिकारों पर अपने विचार रखे। किसी का नाम लिए बिना उन्होंने कहा, “अगर किसी प्रक्रिया का परिणाम लाखों-करोड़ों भारतीय नागरिकों को उनके वोट देने के अधिकार से बेदखल करना है, जिससे वे अपने ही मुल्क में सेकंड क्लास नागरिक बन जाएं, तो ऐसी व्यवस्था को सिर्फ और सिर्फ तानाशाही या मनमाना ही कहा जाएगा।”
जस्टिस भुइयां ने आगे कहा कि भारतीय संविधान कभी भी दो श्रेणियों के नागरिकों—वोटिंग अधिकार वाले और बिना वोटिंग अधिकार वाले—की इजाजत नहीं देता। उन्होंने सख्त रुख अपनाते हुए कहा, “नागरिकों को वोटिंग राइट्स से पूरी तरह अलग करना संविधान के अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार) और अनुच्छेद 326 का सीधा उल्लंघन है। देश में कोई भी अथॉरिटी, संस्था या कोर्ट संविधान से ऊपर नहीं है और इस तरह के कदम को कभी सही नहीं ठहराया जा सकता।”
‘वोट का अधिकार छीनना शरीर से आत्मा निकालने जैसा’ जस्टिस भुइयां ने मतदाता सूची से नाम हटाए जाने की प्रक्रिया की कानूनी सीमा तय करते हुए कहा कि केवल किसी मृतक वोटर के मामले को छोड़कर, वोटर लिस्ट में दर्ज किसी भी जीवित नागरिक का नाम बिना नोटिस दिए और बिना सुनवाई का मौका दिए नहीं हटाया जा सकता। उन्होंने कहा, “किसी भारतीय की पहचान से उसके वोट देने का अधिकार छीनना ठीक वैसा ही है जैसे किसी जीवित शरीर से उसकी आत्मा निकाल दी जाए।”
उन्होंने मताधिकार की तुलना देश के स्वतंत्रता संग्राम से करते हुए कहा कि एक नागरिक का वोट डालने का अधिकार संविधान के ‘बेसिक स्ट्रक्चर’ (मूल ढांचे) का प्रमुख हिस्सा है। यह अधिकार हमारे पूर्वजों द्वारा विदेशी हुकूमत के खिलाफ लड़ी गई लंबी लड़ाई और बलिदानों की देन है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि चाहे कोई देश का बहुत बड़ा अरबपति हो या फिर सड़क पर रिक्शा चलाने वाला आम इंसान, दोनों के वोट की कीमत लोकतंत्र में बिल्कुल बराबर है।
सड़कों पर उतरा विपक्ष, जंतर-मंतर से लेकर इंडिया गेट तक हंगामा दूसरी ओर, SIR प्रक्रिया में गड़बड़ियों को लेकर दिल्ली से लेकर मुंबई तक सियासी पारा चढ़ा हुआ है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर वामपंथी छात्र संगठनों और विपक्षी दलों ने विशाल प्रदर्शन किया। ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) के कार्यकर्ताओं ने अशोक रोड से जंतर-मंतर तक मार्च निकाला और चुनाव आयोग के खिलाफ जोरदार नारेबाजी की। प्रदर्शन के दौरान एआईएसए अध्यक्ष नेहा बोरा को पुलिस ने हिरासत में लिया, जिन्हें बाद में नरेला थाने से रिहा किया गया।
आम आदमी पार्टी (AAP) के कार्यकर्ताओं ने भी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर इंडिया गेट की ओर रुख किया। पुलिस ने प्रदर्शन कर रहे ‘आप’ के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज और विधायक संजीव झा समेत करीब 25 कार्यकर्ताओं को हिरासत में ले लिया। सौरभ भारद्वाज ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पुलिस कार्रवाई की कड़ी निंदा की, वहीं संजीव झा ने कहा कि लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ी चिंताओं को पुलिसिया बल या दबाव से दबाया नहीं जा सकता।
युथ कांग्रेस का मशाल जुलूस, मुंबई में भी गर्जना मोर्चा विपक्ष का यह आंदोलन केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है। इंडियन यूथ कांग्रेस ने दिल्ली में अपने केंद्रीय कार्यालय से जंतर-मंतर तक मार्च निकालने का प्रयास किया, जिसे पुलिस ने बैरिकेड्स लगाकर रोक दिया। इसके बाद यूथ कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने मशाल जुलूस और कैंडल मार्च निकालकर अपना विरोध दर्ज कराया। संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदयभानु चिब ने साफ किया कि जब तक चुनाव आयोग पारदर्शी व्यवस्था नहीं बनाता और ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देते, तब तक यह लड़ाई रुकने वाली नहीं है।
उधर, मुंबई में भी माहौल गर्म दिखा, जहां शिवसेना (यूबीटी) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के नेताओं ने ‘गर्जना मोर्चा’ का आयोजन कर चुनाव आयोग की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए और मुख्य चुनाव आयुक्त से तुरंत पद छोड़ने की मांग की।













