देवी का स्वरूप परम कल्याणकारी : नवरात्रि 2026 के तीसरे दिन शक्तिस्वरूप मां चंद्रघंटा की होगी अराधना : राजीव आचार्य

राजीव आचार्य
ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुशास्त्री

शारदीय नवरात्रि 2026 के तीसरे दिन मंगलवार को नवदुर्गा के तृतीय स्वरूप देवी चन्द्रघंटा की उपासना की जाएगी । माँ दुर्गा का यह स्वरूप परम कल्याणकारी एवं जीवन में सुख-शांति प्रदान करने वाला माना जाता है। देवी की इस छवि का वर्णन करते हुए कहा गया है –

पिण्डजप्रवरारुढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता |
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता ||

अर्थात जो सिंहवाहिनी हैं, अस्त्र-शस्त्र से सज्जित हैं एवं भयंकर क्रोध में हैं, जो चन्द्रघंटा के नाम से प्रसिद्ध हैं, उनकी मुझ पर असीम कृपा है। देवी का वर्ण स्वर्ण के समान है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र शोभायमान है, इसलिए देवी का यह शक्ति स्वरूप चन्द्रघंटा के नाम से प्रसिद्ध हैं। दसभुजी देवी खड्ग, बाण, त्रिशूल, गदा जैसे अस्त्र-शस्त्रों के साथ कमंडल, जपमाला, कमल आदि से सुसज्जित हैं। वे घंटे की ध्वनि समान गर्जना करती हैं। दुर्गा सप्तशती में वर्णन है कि देवी चन्द्रघंटा के घंटे से उत्पन्न ध्वनि राक्षसों को भयभीत कर देती है, जिससे वे अशक्त हो जाते हैं ।

देवी की इस छवि के विश्लेषण से स्पष्ट है कि अस्त्र-शस्त्र जैसे प्रतीक उन्हें पाप विनाशनी एवं दुष्टों का नाश करने वाली शक्ति के रूप में व्यक्त करते हैं तो दूसरी तरफ कमल-पुष्प, जपमाला, अभय मुद्रा एवं वरमुद्रा जैसे प्रतीक उनकी सौम्यता को प्रदर्शित करते हैं। अर्थात, युद्ध के लिए तत्पर देवी की यह मुद्रा दुष्टों के संहार का एवं भक्तों के कल्याण का सूचक है।

पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार तीनों लोकों में असुरों का आतंक बढ़ जाने के पश्चात देवी दुर्गा ब्रह्मा-विष्णु-महेश की ऊर्जा से देवी चन्द्रघंटा उत्पन्न हुईं। पौराणिक कथा के अनुसार असुरों का नायक महिषासुर के कारण तीनों लोकों में हाहाकार मचा हुआ था। उसकी कुदृष्टि देवराज इंद्र के सिंहासन पर थी, जिसके कारण समस्त देवगण भयभीत थे। सभी देवता चिंतित होकर ब्रह्मा-विष्णु एवं महेश के पास पहुँचे। देवताओं के मुख से महिषासुर के अत्याचार के बारे में सुनकर तीनों अत्यंत क्रोधित हुए। उसी क्षण उनके मुख से निकली ऊर्जा से देवी चन्द्रघंटा उत्पन्न हुईं। इस अर्थ में देवी चन्द्रघंटा सृष्टि के तीन आधार ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश तीनों के मिश्रित ऊर्जा की शक्ति पुंज हैं। देवी चन्द्रघंटा को भगवान् विष्णु ने चक्र, शिव ने त्रिशूल एवं ब्रह्माजी ने कमण्डल प्रदान किया।

इसके अलावा अन्य देवताओं ने भी उन्हें कई अस्त्र-शस्त्र प्रदान किये। क्रोध उन्मत्त देवी महिषासुर के नाश के लिए युद्ध के लिये उद्धत हुईं।इस सन्दर्भ में एक रोचक दन्तकथा भी प्रचलित है, जिसके अनुसार विवाह के बाद शिव तपस्या में लीन हो गये, पार्वतीजी एक गुफा में रहने लगीं, जहां एक रात उन पर जतुकासुर नामक एक असुर ने आक्रमण किया। वे शिव की शरण में गयी, उन्होंने पार्वती जी के अन्तःकरण को जागृतकर उन्हें बोध कराया कि वे स्वयं शक्ति हैं। पार्वतीजी ने चन्द्रदेव से सहायता मांगी, वे उनके मस्तक पर अर्धचन्द्र के रूप में विराजमान हो गए। रात्रि की कालिमा प्रकाश से भर उठा। अब वे अपने शत्रु को साफ़-साफ़ देख पा रही थीं। उन्होंने जतुकासुर के मस्तक पर घंटे से प्रहार किया। इस दन्तकथा में भेड़िये पर सवार, हाथ में चाकू लिए और मस्तक पर अर्धचन्द्र धारण किये देवी को चन्द्रघंटा कहा गया है।

यह उल्लेखनीय है कि देवी चन्द्रघंटा का स्वरूप ‘युद्ध के लिए उद्धत देवी’ का है। इसलिए इनकी आराधना से तत्काल समस्त कष्टों का निवारण हो जाता है। देवी सिंहवाहिनी है इसलिए इनका साधक सिंह के समान निर्भय रहता है। देवी चन्द्रघंटा के उपासक निर्भीक एवं आत्मविश्वास से परिपूर्ण होने के अतिरिक्त सौम्य एवं विनम्र होता है। साधक को न केवल भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा में भी वृद्धि होती है।

मान्यता है कि देवी को पीला रंग अत्यंत प्रिय है, इसलिए इन्हें पीला वस्त्र, पीले पुष्प एवं पीले भोग अर्पित करना चाहिए।
नवरात्रि के तीसरे दिन योग एवं तंत्र मार्गियों के लिए भी देवी चन्द्रघंटा की उपासना का अत्यधिक महत्व है। इस दिन साधक का चित्त ‘मणिपुर चक्र’ में स्थित होता है। योग साधना में यह शरीर का तृतीय मुख्य ऊर्जा केंद्र है। यह नाभि के पीछे स्थित होता है। इसे अग्नि एवं सूर्य चक्र भी कहा जाता है। मणिपुर चक्र जागृत होने से साधक आत्मविश्वास से भर उठता है एवं उसकी निर्णय लेने की शक्ति और इच्छा शक्ति में अपार वृद्धि होती है।

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