क्या सिर्फ पटाखे और पराली हैं दिल्ली के जहरीले धुंध के जिम्मेदार? सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से खुली पोल, जानिए असल कारण

सर्दियों की शुरुआत के साथ ही दिल्ली-एनसीआर की हवा में फिर से जहर घुलने लगा है. आंखों में जलन, सांस लेने में तकलीफ और धुंध की मोटी परत हर दिल्लीवासी की नियति बन चुकी है. हर साल दीवाली के आते ही पटाखों और पड़ोसी राज्यों में पराली जलाने को प्रदूषण का मुख्य खलनायक घोषित कर दिया जाता है. लेकिन क्या वाकई दिल्ली के ‘गैस चैंबर’ बनने के पीछे सिर्फ यही दो वजहें हैं?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी और केंद्र सरकार द्वारा संसद में पेश आंकड़ों ने इस बहस को एक नई दिशा दी है. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से माना है कि केवल पटाखों को दिल्ली की खराब हवा का जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि साल 2024 में पूर्ण प्रतिबंध के बावजूद वायु गुणवत्ता में कोई ठोस सुधार नहीं देखा गया था.

सुप्रीम कोर्ट का रुख और ग्रीन पटाखों को सशर्त मंजूरी

2 नवंबर 2026 को आई रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने कहा कि पटाखों पर पूरी तरह रोक लगाना तात्कालिक उपाय लग सकता है, लेकिन ऐसा कोई पर्याप्त डेटा मौजूद नहीं है जो साबित करे कि बैन लगाने से प्रदूषण का संकट समाप्त हो जाएगा.

कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वच्छ पर्यावरण और जीवन के अधिकार का हवाला देते हुए प्रशासनिक निगरानी पर सवाल उठाए. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने 7 और 8 नवंबर 2026 को तय शर्तों के साथ केवल लाइसेंस प्राप्त ‘ग्रीन पटाखे’ जलाने की अनुमति दी है, जिसके बाद 9 नवंबर से पुनः वर्षभर के लिए प्रतिबंध लागू हो जाएगा. मामले की अगली सुनवाई 16 दिसंबर 2026 को होगी.

संसद में पेश आंकड़े: दिल्ली को गैस चैंबर बना रहे ये 5 बड़े कारण

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा राज्यसभा में पेश CAQM (कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट) की रिपोर्ट के अनुसार, सर्दियों में दिल्ली के PM2.5 प्रदूषण में विभिन्न स्रोतों का योगदान इस प्रकार है:

  • वाहनों का धुआं (19% से 24%): दिल्ली की सड़कों पर दौड़तीं लाखों गाड़ियां, पुराना ईंधन और लंबे ट्रैफिक जाम के दौरान लगातार जलता पेट्रोल-डीजल हवा में जानलेवा कण छोड़ते हैं.

  • हवा में बनने वाले द्वितीयक सूक्ष्म कण (24% से 28%): विभिन्न हानिकारक गैसों के आपस में मिलने और रासायनिक प्रतिक्रियाओं से बनने वाले सूक्ष्म कण सर्दियों में सबसे बड़ा योगदान देते हैं.

  • कूड़ा, लकड़ी और पराली जलाना (17% से 23%): सर्दियों में खुले में कचरा जलाना, लैंडफिल साइट्स की आग, घरेलू स्तर पर बायोमास ईंधन और खेतों में पराली जलाना हवा को अत्यंत जहरीला बना देता है.

  • सड़क और निर्माण कार्यों की धूल (10% से 18%): निर्माण गतिविधियों, खुदाई और सड़कों पर उड़ने वाली मिट्टी के कण धुंध के साथ मिलकर हवा को भारी बनाते हैं.

  • उद्योग और बिजली संयंत्र (8% से 10%): दिल्ली-एनसीआर में स्थित फैक्ट्रियों और थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाला औद्योगिक धुआं.

सर्दियों में क्यों फंस जाता है प्रदूषण? ‘तापमान उलटाव’ का वैज्ञानिक कारण

सर्दियों में प्रदूषण ज्यादा महसूस होने के पीछे मौसम और भूगोल का बड़ा हाथ है. ठंड के दिनों में हवा की रफ्तार काफी धीमी हो जाती है, जिससे प्रदूषक कण एक ही स्थान पर ठहर जाते हैं. इसके साथ ही ‘तापमान उलटाव’ (Temperature Inversion) की स्थिति बनती है, जहां ऊपरी गर्म हवा की परत नीचे मौजूद ठंडी हवा को ऊपर उठने से रोक देती है. इसके परिणामस्वरूप सारा धुआं और जहरीले कण जमीन की सतह के पास ही कैद होकर रह जाते हैं.

वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए सरकारी प्रयास और CAQM के आंकड़े

प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण के लिए गठित आयोग (CAQM) अब तक 101 वैधानिक निर्देश और 17 परामर्श जारी कर चुका है. सरकार के मुताबिक इन प्रयासों के सकारात्मक परिणाम भी दिखे हैं:

  • साफ हवा वाले दिन बढ़े: दिल्ली में AQI 200 से कम (संतोषजनक/मध्यम) रहने वाले दिनों की संख्या वर्ष 2016 के 110 दिनों से बढ़कर वर्ष 2025 में 200 दिन हो गई है.

  • PM10 के स्तर में गिरावट: PM10 का वार्षिक औसत स्तर 2016 के 290 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से घटकर 2025 में 197 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर पर आ गया है.

 

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