आपराधिक केस में बरी होने पर किसी कर्मचारी को सेवा में बहाल नहीं किया जा सकता : हाईकोर्ट

प्रयागराज । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक आदेश में कहा है कि केवल आपराधिक मामले में बरी होने के आधार पर किसी सरकारी कर्मचारी को सेवा में बहाल नहीं किया जा सकता। विभागीय जांच में आरोप सिद्ध होते हैं तो ऐसी कार्रवाई बरकरार रह सकती है, भले ही आपराधिक मुकदमे में अभियुक्त को राहत मिल गई हो।

यह आदेश न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता ने पुलिस कांस्टेबल कुंवर पाल सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मुकदमा और विभागीय कार्यवाही अलग-अलग दायरे में चलती हैं और दोनों के मानक भी भिन्न होते हैं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि दोनों कार्यवाही में आरोप, साक्ष्य व गवाह समान हों और आपराधिक न्यायालय ने सम्मानपूर्वक बरी किया हो, तो स्थिति अलग हो सकती है। लेकिन बरी होना केवल संदेह का लाभ या गवाहों के मुकर जाने के कारण हुआ हो तो विभागीय कार्रवाई पर उसका प्रभाव नहीं पड़ता।

मामले के तथ्यों के अनुसार याची फिरोजाबाद जिले में तैनात था तो उसी दौरान उसे जेल से एक बंदी को अदालत में पेश करने की जिम्मेदारी मिली। ड्यूटी पर अत्यधिक शराब का सेवन करने के कारण उसकी सरकारी राइफल से गोली चल गई जिसमें दो लोग घायल हो गए। इसके बाद याची के खिलाफ आईपीसी की धारा 307 में एफआईआर दर्ज की गई। साथ ही याची के विरुद्ध विभागीय जांच भी शुरू की गई। मेडिकल जांच से साबित हुआ कि घटना के वक्त याची शराब के नशे में था।

इस मामले में कोर्ट ने पाया कि आपराधिक मुकदमे में मुख्य गवाह मुकर गए थे। इस कारण याची को बरी किया गया। विभागीय जांच में चिकित्सीय परीक्षण सहित पर्याप्त साक्ष्य थे, जिससे यह साबित हुआ कि घटना के समय याची ड्यूटी पर नशे की हालत में था और उसकी लापरवाही से गोली चली।

कोर्ट ने कहा कि यह पूर्णतः निर्दोष साबित होने का मामला नहीं है। विभागीय जांच में प्रस्तुत साक्ष्य अधिक ठोस व व्यापक थे जबकि आपराधिक मुकदमे में अभियोजन पक्ष कमजोर रहा। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए अनुशासनात्मक प्राधिकारी, अपीलीय प्राधिकारी और पुनरीक्षण प्राधिकारी के आदेशों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

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