
भाजपा के अंदर इस बार हिमाचल विधानसभा चुनाव में टिकटों के ऐलान से पहले नई-नई चीजें देखने को मिल रही है। राज्य में 5 साल से सरकार चला रही BJP में कैंडिडेट्स को लेकर इतनी जबरदस्त उलझन है कि पार्टी हाईकमान ऐसा कुछ करवाने पर मजबूर हो गया जो 40 साल में कभी नहीं हुआ। पार्टी ने राज्य की सभी 68 सीटों पर रविवार को अचानक ‘गुप्त मतदान’ कराया।
BJP हाईकमान ने इसके लिए दिल्ली से हेलिकॉप्टर में मतपेटियां भेजी और वोटिंग के तुरंत बाद वापस दिल्ली मंगवा ली। वोटिंग में पार्टी के कार्यकारिणी सदस्यों और फ्रंटल संगठनों के चुनिंदा पदाधिकारियों से उम्मीदवारों को लेकर उनकी 3-3 च्वाइस पूछी गई।
हिमाचल विधानसभा चुनाव के नॉमिनेशन शुरू होने से एक दिन पहले मंडल स्तर पर कराई गई गुप्त मतदान की इस पूरी प्रक्रिया के पीछे 5 प्रमुख वजह रहीं। आइये इन्हें सिलसिलेवार ढंग से जानते हैं।
पहली वजह :- अलग-अलग सर्वे रिपोर्ट से कन्फ्यूजन
भाजपा हाईकमान ने हिमाचल में ‘मिशन रिपीट’ का टारगेट रखा है। यह टारगेट रखने से पहले प्रदेश में अलग-अलग लेवल के तीन सर्वे कराए गए। इनमें से पहला सर्वे एक प्राइवेट फर्म से कराया गया। दूसरा सर्वे पार्टी ने अंदरूनी लेवल पर खुद किया। तीसरे सर्वे के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की मदद ली गई।
RSS के स्वयंसेवकों ने हिमाचल के हर विधानसभा क्षेत्र में ग्राउंड लेवल पर जाकर वर्किंग की। इस सर्वे की रिपोर्ट एक हफ्ते पहले ही BJP हाईकमान के पास पहुंची।
पार्टी की ओर से कराए गए इन तीनों सर्वे में अलग-अलग रिपोर्ट आने से कई तरह के कन्फ्यूजन खड़े हो गए। ऐसे में आखिरी मौके पर पार्टी के कार्यकारिणी सदस्यों और फ्रंटल संगठनों के चुनिंदा पदाधिकारियों से उम्मीदवारों को लेकर उनकी 3-3 च्वाइस पूछने का फैसला लिया गया।
दूसरी वजह : सिटिंग MLA-मंत्रियों का निगेटिव फीडबैक
भाजपा हाईकमान के पास अलग-अलग लेवल से जो फीडबैक पहुंचा है, उसमें लोअर हिमाचल के 2 दर्जन से ज्यादा विधायकों और 4 मंत्रियों की रिपोर्ट निगेटिव है।
यह फीडबैक विधानसभा लेवल का है और इसके मुताबिक दोबारा टिकट दिए जाने की सूरत में इन नेताओं के जीतने के चांस कम है।
विधायकों-मंत्रियों के इस निगेटिव फीडबैक के बाद ही केंद्रीय नेतृत्व ने संगठनात्मक लेवल से यह चेक कराने का फैसला लिया कि ग्राउंड लेवल पर हालात काबू में हैं या नहीं?
तीसरी वजह : डेढ़ दर्जन MLA की जीत का मार्जिन मामूली
वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में लोअर हिमाचल से जीतने वाले डेढ़ दर्जन MLA ऐसे हैं जिनकी जीत का मार्जिन 500 से लेकर 2000 वोटों के बीच था। 5 साल की एंटी इनकंबेंसी के चलते इन सीटों पर आंख मूंदकर उन्हीं चेहरों को टिकट देने का ‘चांस’ लेना समझदारी नहीं होगा।
इन विधायकों के मामूली ‘विनिंग मार्जिन’ और ‘मिशन रिपीट’ के चलते पार्टी नेतृत्व एक्स्ट्रा सावधानी बरत रहा है।
चौथी वजह : दलबदलुओं को लेकर नाराजगी
हिमाचल का सियासी ‘रिवाज’ बदलने निकले BJP हाईकमान ने पिछले कुछ महीनों में कांग्रेस में काफी तोड़फोड़ की। दो कांग्रेसी MLA के अलावा दो निर्दलीय विधायकों को भी पार्टी में शामिल कराया गया। कांग्रेस से कुछ दूसरे नेता भी आए।
इनमें से कुछ पार्टी के मौजूदा सिस्टम से नाराज हैं और किसी भी समय BJP को ‘टाटा’ बोल सकते हैं। ऐसे में इन्हें जिस सोच और मंशा के साथ लाया गया था, वह शायद ही पूरी हो।
दूसरी ओर इन दलबदलुओं के आने से संबंधित हलके में भाजपा के पुराने वर्कर भी खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। रविवार को कराए गए ‘गुप्त मतदान’ में कई सीटों पर भाजपा के पुराने वर्करों ने दोटुक फीडबैक दिया कि दलबदलुओं को टिकट नहीं दिए जाने चाहिए।
5वीं वजह : धूमल फैक्टर
लोअर और अपर हिमाचल में ‘धूमल फैक्टर’ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हिमाचल में 5 साल से पूर्व CM प्रेमकुमार धूमल के समर्थक खुड्डेलाइन लगे हैं।
हिमाचल में हाल में की गई अपनी रैलियों के दौरान PM नरेंद्र मोदी ने तो धूमल का नाम लेकर उनके साथ गुजरे समय को खुलकर याद किया लेकिन हिमाचल भाजपा ने बीते 5 बरसों में धूमल की खास पूछ-परख नहीं की।
भाजपा में मंडल स्तर पर देखा जाए तो कई मंडलों में धूमल समर्थकों का खासा दबदबा है। इसलिए केंद्रीय नेतृत्व हिमाचल BJP के मौजूदा हालात में चुनाव से ठीक पहले धूमल फैक्टर को इग्नोर नहीं करना चाहती।]
पार्टी नेताओं ने भी पहली बार देखी ऐसी एक्सरसाइज
BJP हाईकमान की ओर से कराए गए गुप्त मतदान और इसके लिए अपनाई गई प्रक्रिया से खुद पार्टी के ज्यादातर नेता भी भौचक्के हैं। इमरजेंसी कॉल करके बुलावा मिलने और हेलिकॉप्टर में मतपेटियां आते-जाते देखकर उन्हें भी ज्यादा कुछ समझ नहीं आ रहा।
चूंकि हिमाचल में पिछले 40 साल में ऐसा कभी नहीं हुआ, इसलिए उनकी हैरानगी स्वाभाविक भी है।
हिमाचल के पड़ोसाी राज्यों हरियाणा और उत्तराखंड में BJP सरकार रिपीट करने में सफल रही है। हालांकि हिमाचल की परिस्थितियां अलग हैं इसीलिए हाईकमान यहां के मतदाताओं और पार्टी के ढांचे को अलग ढंग से समझ रहा है।
ग्राम-बूथ लेवल तक होनी चाहिए थी एक्सरसाइज
BJP हाईकमान ने हिमाचल में अपने संभावित उम्मीदवारों के बारे में फीडबैक लेने के लिए जो एक्सरसाइज की, उसे लेकर पार्टी के अंदर कई सवाल पूछे जा रहे हैं। पार्टी कार्यकर्ताओं का कहना है कि ग्राम केंद्र और बूथ केंद्रों के अध्यक्ष भाजपा में रीढ़ की हड्डी कहलाते हैं। यदि इस एक्सरसाइज में वोटिंग उनके लेवल पर कराई जाती तो हाईकमान को ‘रियल फीडबैक’ मिलने के चांस कई गुना बढ़ जाते।
वर्करों ने कहा कि रविवार को मंडल स्तर पर सिलेक्टेड पदाधिकारियों से आनन-फानन में जो राय जुटाई गई, वह धरातल के हालात से कितनी मैच करती है? ये कहना जरा मुश्किल है।
उत्तराखंड में हो चुका इसी तरह का प्रयोग
उत्तराखंड में इसी साल हुए विधानसभा चुनाव से पहले BJP हाईकमान ने प्रत्याशियों के बारे में ग्राउंड लेवल से फीडबैक लेने के लिए इसी तरह की एक्सरसाइज करवाई थी। वहां काफी हद तक यह सफल भी रही।
उत्तराखंड और हिमाचल के मामले में फर्क सिर्फ इतना है कि उत्तराखंड में ये एक्सरसाइज विधानसभा चुनाव के ऐलान से काफी दिन पहले करवा ली गई थी। हिमाचल के मामले में यह एक्सरसाइज नॉमिनेशन शुरू होने से ठीक एक दिन पहले कराई गई।
3467 पदाधिकारियों ने की वोटिंग
चारों संसदीय क्षेत्रों में कराई गई इस वोटिंग में पार्टी के 3467 पदाधिकारियों ने अपना वोट दिया। जिला मंडल, प्रदेश मंडल, विभिन्न मोर्चों के अध्यक्ष, नगर निगम/नगर निकायों के अध्यक्ष और बोर्डों/निगमों के अध्यक्ष-उपाध्यक्ष ने पार्टी कैंडिडेट्स को लेकर अपनी 3-3 च्वाइस बताई।
काउंटिंग के बाद रिपोर्ट कंपाइल हो चुकी है। इस पर सोमवार को दिल्ली में प्रस्तावित BJP की इलेक्शन कमेटी (EC) की बैठक में चर्चा होगी। मतदान के दौरान विधानसभा वाइज कौन-कौन से नाम टॉप पर आए, इसे गुप्त रखा गया है। सोमवार शाम को ही नई दिल्ली में BJP के पार्लियामेंट्री बोर्ड की बैठक भी प्रस्तावित है। ऐसे में मुमकिन है कि 18 अक्टूबर को BJP उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी हो जाए।
अब देखना है कि पदाधिकारियों ने अपनी समझ के हिसाब से विधानसभा सीटवाइज जिन 3 चेहरों को टिकट के लिए रेटिंग दी है, वही उम्मीदवार बनाए जाते हैं या हाईकमान उनसे अलग जाकर कुछ और फैक्टर्स को भी टिकट आवंटन में अप्लाई करता है। हां, इतना तय है कि भाजपा के वर्कर इस समय ऊहापोह की स्थिति में हैं और उम्मीद यही है कि शायद जल्दी ही उन्हें इससे निकलने का मौका मिल जाएगा।













